नेक विचार पर नाखुशी: भारतीयों का डीएनए एक से तात्पर्य लोगों में जाति-मजहब की भिन्नता के बावजूद, सब देश की संतान हैं

उन्मादी भीड़ की हिंसा में शामिल लोग हिंदुत्व के विरोधी एवं आततायी हैं और उन्हें किसी भी तरीके से राष्ट्रवादी नहीं कहा जा सकता। कुछ लोगों की दिलचस्पी इसमें है हिंदू-मुस्लिम के बीच की दूरी खत्म न हो।

Bhupendra SinghTue, 06 Jul 2021 03:40 AM (IST)
सीधी-सच्ची बात पर भी सस्ती राजनीति की जा सकती

अपने देश में किस तरह किसी सीधी-सच्ची बात पर भी सस्ती राजनीति की जा सकती है, इसका उदाहरण है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस कथन पर आपत्ति और असहमति भरी प्रतिक्रिया कि सभी भारतीयों का डीएनए एक है। इस कथन पर मायावती और असदुद्दीन ओवैसी से लेकर दिग्विजय सिंह ने जैसी प्रतिक्रिया दी, उससे विरोध के लिए विरोध वाली मानसिकता का ही परिचय मिला। इनमें से किसी ने भी यह समझने की कोशिश नहीं की कि मोहन भागवत अपने इस कथन के जरिये सभी देशवासियों में एकता की भावना का संचार करने के साथ यह रेखांकित करना चाह रहे थे कि भारत के लोगों में जाति, मजहब, पूजा-पद्धति की कितनी भी भिन्नता हो, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि वे सब इस देश की संतान हैं और सबके पूर्वज एक हैं। इस विचार में ऐसा कुछ भी नहीं कि उस पर आपत्ति जताई जाए। बावजूद इसके किसी न किसी बहाने आपत्ति जताई गई और विमर्श को खास दिशा में मोड़ने की कोशिश की गई। इसका मकसद लोगों को गुमराह करना और अपने वोट बैंक को साधने के अलावा और कुछ नहीं नजर आता।

यह देखना दुखद है कि जब मोहन भागवत हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दे रहे हैं, तब कुछ नेता इसके लिए अतिरिक्त कोशिश कर रहे हैं कि हमारा समाज एकजुटता-सद्भावना की ऐसी बातों पर ध्यान न दे। इस कोशिश से यही प्रकट हुआ कि कुछ लोगों की दिलचस्पी इसमें है हिंदू-मुस्लिम के बीच की दूरी खत्म न हो। इस संदर्भ में संघ प्रमुख ने यह सही कहा कि हिंदू-मुस्लिम एका की बातें इस अर्थ में भ्रामक हैं, क्योंकि वे तो पहले से ही एकजुट हैं और उन्हें अलग-अलग देखना सही नहीं। कायदे से इसका स्वागत करते हुए अपने-अपने स्तर पर ऐसी कोशिश की जानी चाहिए कि भारतीय समाज एकजुट हो और उसके बीच जो भी वैमनस्य है, वह खत्म हो। नि:संदेह कुछ लोग ऐसा नहीं होने देना चाहते और इसीलिए किसी ने संघ की कथनी-करनी में अंतर का उल्लेख किया तो किसी ने भीड़ की हिंसा का जिक्र। इतना ही नहीं, भीड़ की हिंसा के लिए संघ को कठघरे में खड़ा करने की भी कोशिश की गई। ऐसा तब किया गया, जब संघ प्रमुख गाय के नाम पर होने वाली भीड़ की हिंसा का विरोध करते रहे हैं। गत दिवस भी उन्होंने साफ-साफ कहा कि उन्मादी भीड़ की हिंसा में शामिल लोग हिंदुत्व के विरोधी एवं आततायी हैं और उन्हें किसी भी तरीके से राष्ट्रवादी नहीं कहा जा सकता। ऐसी दो टूक बात पर भी मीन-मेख निकालने वालों के बारे में यही कहा जा सकता है कि वे घोर नकारात्मकता में आकंठ डूबे हुए हैं।

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