कश्मीर में हिंदुओं और सिखों को निशाना बनाए जाने का सिलसिला तेज, बनानी होगी नई रणनीति

आतंकियों की तरह उनके खुले-छिपे इन समर्थकों तक यह संदेश जाना ही चाहिए कि वे बच नहीं सकते। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद निरोधक रणनीति पर नए सिरे से विचार इसलिए भी होना चाहिए क्योंकि घाटी में हिंदुओं और सिखों को निशाना बनाए जाने का सिलसिला तेज हो गया है।

TilakrajTue, 12 Oct 2021 10:13 AM (IST)
पुंछ में सेना के जवानों को निशाना बनाने वाले आतंकी सीमा पार से घुसपैठ कर आए थे

जम्मू-कश्मीर के पुंछ में आतंकियों के साथ मुठभेड़ में सेना के सूबेदार सहित पांच जवानों के बलिदान के बाद यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि सुरक्षा बल जरूरी सबक सीखने में देर न करें। न केवल उन कारणों की तह तक जाना होगा, जिनके चलते आतंकी सुरक्षा बलों को इतना बड़ा नुकसान पहुंचाने में समर्थ हो गए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान जवानों को कम से कम जोखिम उठाना पड़े। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि पुंछ सरीखी घटनाएं जहां सुरक्षा बलों के मनोबल को प्रभावित करती हैं, वहीं आतंकियों और उनके समर्थकों के दुस्साहस को बढ़ाती हैं।

नि:संदेह आतंकियों की खोज में चलाए जाने वाले अभियानों के दौरान जोखिम रहता ही है, लेकिन आवश्यकता इसकी है कि उसे कम करने के उपायों को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की जाए। इसके लिए जरूरी हो तो आतंक रोधी रणनीति बदलने के साथ ही उच्च तकनीक का उपयोग बढ़ाने का काम किया जाना चाहिए। आज तो हर तरह की तकनीक उपलब्ध भी है। यह सही है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद हमारे जवान आतंकियों का चुन-चुनकर सफाया करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और उनके इस जच्बे में कभी कमी नहीं आने वाली, लेकिन ऐसे अभियानों के दौरान जोश के साथ संयम का भी परिचय देना होगा। आतंकियों की तलाश में छेड़े जाने वाले अभियानों के दौरान तो ऐसा खास तौर पर करना होगा, क्योंकि बच निकलने की ताक में आतंकी ही रहते हैं।

माना जा रहा है कि पुंछ में सेना के जवानों को निशाना बनाने वाले आतंकी सीमा पार से घुसपैठ कर आए थे और वहां के जंगल में छिपे थे। इसका मतलब है कि वे भारतीय सीमा में घुसपैठ करने और फिर शरण लेने में सक्षम हैं। स्पष्ट है कि सीमा पर और सीमा के अंदर आतंकियों के खिलाफ अभियान तेज करने के साथ ही इसकी भी आवश्यकता बढ़ गई है कि उनकी मदद करने वालों को भी निशाने पर लिया जाए। ऐसे तत्व कहीं बड़ा खतरा हैं, क्योंकि वे आतंकियों की मदद करने के साथ ही माहौल में जहर घोलने का भी काम करते हैं। वास्तव में ऐसे ही तत्व आतंक को खाद-पानी दे रहे हैं।

आतंकियों की तरह उनके खुले-छिपे इन समर्थकों तक यह संदेश जाना ही चाहिए कि वे बच नहीं सकते। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद निरोधक रणनीति पर नए सिरे से विचार इसलिए भी होना चाहिए, क्योंकि घाटी में हिंदुओं और सिखों को निशाना बनाए जाने का सिलसिला तेज हो गया है और इसके चलते उनके पलायन का खतरा पैदा हो गया है। इस खतरे को हर हाल में दूर किया जाना चाहिए।

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