गांवों की सुधि लें: गांवों में कमजोर स्वास्थ्य ढांचा, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों के अभाव में दिशानिर्देश पर्याप्त नहीं

सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों को रैपिड एंटीजन टेस्टिंग के लिए प्रशिक्षित किया जाए।

ग्रामीण इलाकों में टीकों को लेकर हिचक है जो अज्ञानता अंधविश्वास और अफवाहों से उपजी है। बेहतर हो कि राज्य सरकारें गांवों में टीकाकरण को लेकर नए सिरे से जागरूकता अभियान चलाएं और टीका विरोधी तत्वों को हतोत्साहित करें।

Bhupendra SinghMon, 17 May 2021 02:10 AM (IST)

केंद्र सरकार ने गांवों में कोरोना संक्रमण रोकने के लिए जो दिशानिर्देश जारी किए, केवल वही पर्याप्त नहीं। उसे यह देखना होगा कि राज्य सरकारें और उनका प्रशासन इन दिशानिर्देशों के अनुरूप काम कर पा रहा है या नहीं? संसाधनों के अभाव का सामना करने वाले ग्रामीण इलाकों में कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए राज्यों को बहुत तेजी से बहुत कुछ करने की जरूरत है। गांवों में केवल स्वास्थ्य ढांचा ही कमजोर नहीं है, बल्कि प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मचारियों का भी अभाव है। कायदे से बीते एक वर्ष में इन कर्मचारियों को कोरोना संक्रमण से जूझने के लिए प्रशिक्षित कर दिया जाना चाहिए था, लेकिन लगता है कि ऐसा नहीं किया गया और इसीलिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को यह कहना पड़ा कि सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों को रैपिड एंटीजन टेस्टिंग के लिए प्रशिक्षित किया जाए। यह काम युद्धस्तर पर तत्काल प्रभाव से करना होगा, क्योंकि समय कम है। गांवों में कोरोना संक्रमण न केवल पहुंच चुका है, बल्कि कहर भी ढा रहा है। देश के कुछ ग्रामीण इलाके तो ऐसे हैं, जहां संक्रमण का असर शहरों से अधिक दिख रहा है।

यह ठीक है कि केंद्र सरकार लगातार उच्च संक्रमण वाले क्षेत्रों में घर-घर टेस्टिंग पर जोर दे रही है, लेकिन समस्या यह है कि पर्याप्त टेस्टिंग किट उपलब्ध नहीं हैं। कम से कम अब तो टेस्टिंग किट के अभाव को प्राथमिकता के आधार पर दूर किया जाना चाहिए। यह एक कठिन काम है, लेकिन उसे करना ही होगा, क्योंकि इसी के जरिये गांवों को कोरोना के कहर से बचाया जा सकता है। राज्य सरकारों के लिए यह भी आवश्यक है कि वे गांवों के उपेक्षित और अपर्याप्त स्वास्थ्य ढांचे को सक्षम बनाने के लिए कमर कसें। ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में जो प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, उनकी दशा अच्छी नहीं। ऐसे तमाम केंद्र किराये के भवनों में तो चलते ही हैं, उनमें काम करने वाले भी संविदा कर्मचारी होते हैं। इस स्थिति के लिए राज्य सरकारें खुद के अलावा अन्य किसी को दोष नहीं दे सकतीं। उन्हेंं यह पता ही होगा कि लोक स्वास्थ्य उनके ही अधिकार क्षेत्र वाला विषय है। इस पर अब बहुत अधिक ध्यान देने की जरूरत है। राज्यों को इसके लिए भी सक्रिय होना होगा कि टीकाकरण की गति बढ़े, क्योंकि यह देखने में आ रहा है कि टीकों की उपलब्धता के बाद भी ग्रामीण इलाकों में अपेक्षित संख्या में टीके नहीं लग पा रहे हैं। इसका कारण टीकों को लेकर हिचक है, जो अज्ञानता, अंधविश्वास और अफवाहों से उपजी है। बेहतर हो कि राज्य सरकारें गांवों में टीकाकरण को लेकर नए सिरे से जागरूकता अभियान चलाएं और टीका विरोधी तत्वों को हतोत्साहित करें।

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