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सरकार की सुने बिना सुप्रीम कोर्ट ने सीएए पर रोक लगाने से किया इन्कार, जल्द होगा निपटारा

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन कानून पर रोक लगाने से इन्कार कर उन लोगों को निराश करने का ही काम किया जो पता नहीं कैसे यह मान कर चल रहे थे कि शीर्ष अदालत को आनन-फानन में इस कानून पर रोक लगा देनी चाहिए। नि:संदेह यह एक मुगालता ही अधिक था, क्योंकि सरकार के पक्ष को सुने बिना संसद से पारित और साथ ही अधिसूचित कानून पर रोक लगाना न्यायसंगत नहीं। यदि सुप्रीम कोर्ट नागरिकता संशोधन कानून पर विचार नहीं कर सका तो इसके लिए इस कानून के विरोधी ही अधिक जिम्मेदार हैं। पहले इस कानून को चुनौती देने के लिए करीब साठ याचिकाएं दायर की गई थीं, लेकिन बाद में पता नहीं क्या सोचकर तमाम और याचिकाएं दाखिल कर दी गईं। अब उनकी संख्या 140 से अधिक हो गई है।

सरकार ने पहले दायर याचिकाओं के जवाब तो तैयार कर लिए थे, लेकिन उसे नहीं पता कि नई याचिकाओं में क्या मांग की गई है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को मजबूरी में उसे इन याचिकाओं का जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय और देना पड़ा। क्या जल्द फैसले की उम्मीद लगाने वाले यह समझेंगे कि याचिकाओं का ढेर लगाकर उन्होंने अपनी ही उम्मीदों पर पानी फेरने का काम किया? आखिर किसी एक मसले पर इतनी अधिक याचिकाएं दायर करने की क्या जरूरत थी?

शायद विपक्षी दल नागरिकता कानून के खिलाफ याचिकाएं दाखिल करने की भी होड़ में शामिल हैं। सच जो भी हो, सुप्रीम कोर्ट को समय और संसाधन बर्बाद करने वाली इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए कुछ करना चाहिए। इसी के साथ उसे इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि इस कानून की वैधानिकता का निपटारा जल्द से जल्द करने की जरूरत है। वह इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि इस कानून के विरोधियों ने धरना-प्रदर्शन का एक उद्योग खड़ा कर दिया है। दुष्प्रचार के जरिये लोगों को न केवल सड़कों पर उतारा जा रहा है, बल्कि उन्हें यह नया पाठ भी पढ़ाया जा रहा है कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर भी उनके खिलाफ है।

इस सुनियोजित दुष्प्रचार से उपजे भ्रम और भय के माहौल को समाप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकता संशोधन कानून पर यथाशीघ्र दूध का दूध और पानी का पानी हो। यह तभी हो सकता है कि जब सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला जल्द सुनाने की व्यवस्था करे। उसे ऐसा इसलिए भी करना चाहिए, क्योंकि राज्य सरकारें विधानसभाओं में नागरिकता कानून विरोधी प्रस्ताव यह जानते हुए भी पारित कर रही हैं कि संसद से स्वीकृत कानून को लागू करने से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसी संवैधानिक अराजकता पर लगाम लगाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट को जल्द फैसला सुनाना चाहिए।

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