सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: दिल्ली दंगों के केस में तीनों आरोपितों की जमानत को हाई कोर्ट के फैसले को नजीर न माना जाए

अक्सर अतिवादी कृत्य चरमपंथी तत्वों की ओर से ही किए जाते हैं। यदि ऐसे कृत्यों को विरोध प्रदर्शन का हिस्सा मान लिया जाएगा तो आंतरिक सुरक्षा के लिए उत्पन्न हो रहे खतरों का मुकाबला करना एवं आतंकी गतिविधियों से निपटना और कठिन हो जाएगा।

Bhupendra SinghSat, 19 Jun 2021 01:30 AM (IST)
विरोध के बहाने अतिवाद का परिचय देना एक विश्वव्यापी समस्या है।

यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप किया, जिसमें दिल्ली दंगों के तीन आरोपितों को जमानत देते हुए यह कहा गया था कि सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकी गतिविधि और विरोध प्रदर्शन के बीच फर्क नहीं किया। यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों आरोपितों को जमानत दिए जाने के फैसले पर रोक नहीं लगाई, लेकिन उसने यह भी कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को नजीर न माना जाए और न ही आतंकवाद निरोधक कानून की अनदेखी की जाए। इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले में कुछ विसंगति दिख रही है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले और उससे संबंधित टिप्पणियों से तो ऐसी प्रतीति हो रही थी कि तीनों आरोपितों को महज विरोध प्रदर्शन के लिए गिरफ्तार किया गया, न कि दिल्ली के उन भीषण दंगों को भड़काने के लिए, जिनमें 50 से अधिक लोग मारे गए थे। दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला यह भी आभास करा रहा था, मानों उसने आरोपितों को क्लीनचिट दे दी हो। उसके फैसले में यह कहा गया था कि विरोध प्रदर्शन के दौरान उत्तेजक भाषण, चक्का जाम जैसे कृत्य असामान्य नहीं कहे जा सकते। नि:संदेह यह सब विरोध प्रदर्शन का हिस्सा है, लेकिन क्या किसी सड़क पर कब्जा कर लाखों लोगों के आवागमन को बाधित करना भी सामान्य कृत्य माना जाएगा? इसी तरह क्या लोगों को हिंसा के लिए भड़काने को भी विरोध प्रदर्शन का हिस्सा मान लिया जाएगा? यदि ऐसा माना जाएगा तो फिर धरना-प्रदर्शन के नाम पर अराजकता फैलाने वालों को ही बल मिलेगा।

इस पर हैरानी नहीं कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से दिल्ली पुलिस ने न केवल असहमति जताई, बल्कि सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए यह दलील भी दी कि उच्च न्यायालय को जमानत पर फैसला देना था, लेकिन उसने आरोपितों को बाइज्जत बरी करने जैसा काम किया। यह भी उल्लेखनीय है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने इसी दौरान आतंकवाद निरोधक कानून की व्याख्या भी कर डाली थी। दिल्ली पुलिस के अनुसार इसकी आवश्यकता नहीं थी। पता नहीं सुप्रीम कोर्ट किस नतीजे पर पहुंचेगा, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि विरोध के बहाने अतिवाद का परिचय देना एक विश्वव्यापी समस्या है। इसी कारण अमेरिका ने घरेलू चरमपंथ से निपटने के तौर-तरीकों की समीक्षा कर एक नई रणनीति बनाई है। यह ध्यान रहे कि अक्सर अतिवादी कृत्य चरमपंथी तत्वों की ओर से ही किए जाते हैं। यदि ऐसे कृत्यों को विरोध प्रदर्शन का हिस्सा मान लिया जाएगा तो आंतरिक सुरक्षा के लिए उत्पन्न हो रहे खतरों का मुकाबला करना एवं आतंकी गतिविधियों से निपटना और कठिन हो जाएगा।

रोमांचक गेम्स खेलें और जीतें
एक लाख रुपए तक कैश अभी खेलें

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.