कृषि कानूनों की वापसी ने फिर साबित किया, लोकतंत्र में सही फैसले लेना और लागू करना बेहद मुश्किल

लोकतंत्र में लोगों की इच्छाओं का सम्मान होना चाहिए लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि जोर-जबरदस्ती को जनाकांक्षाओं का नाम दे दिया जाए। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि किसानों और खासकर छोटे किसानों का भला करने वाले कृषि कानून सस्ती राजनीति की भेंट चढ़ गए।

TilakrajSat, 20 Nov 2021 11:05 AM (IST)
यह शुभ संकेत नहीं कि संसद से पारित कानून सड़क पर उतरे लोगों की जिद से वापस होने जा रहे

तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री ने जिस तरह यह कहा कि शायद हमारी तपस्या में कुछ कमी रह गई होगी, जिसके कारण दीये के प्रकाश जैसा सत्य हम कुछ किसानों को समझा नहीं पाए, उससे यही स्पष्ट होता है कि यह मजबूरी में लिया गया फैसला है। इस फैसले ने फिर यह साबित किया कि लोकतंत्र में सही फैसले लेना और लागू करना कितना मुश्किल होता है।

इससे अधिक दुर्भाग्य की बात और कोई नहीं कि जो फैसला किसानों के हित में था और जिससे उनकी तमाम समस्याएं दूर हो सकती थीं, उसे संकीर्ण राजनीतिक कारणों से उन दलों ने भी किसान विरोधी करार दिया, जो एक समय वैसे ही कृषि कानूनों की पैरवी कर रहे थे, जैसे मोदी सरकार ने बनाए। यह शुभ संकेत नहीं कि संसद से पारित कानून सड़क पर उतरे लोगों की जिद से वापस होने जा रहे हैं। यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि भविष्य में ऐसा न हो, अन्यथा उन तत्वों का दुस्साहस ही बढ़ेगा, जो मनमानी मांगें लेकर सड़क पर आ जाते हैं।

लोकतंत्र में लोगों की इच्छाओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि जोर-जबरदस्ती को जनाकांक्षाओं का नाम दे दिया जाए। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि किसानों और खासकर छोटे किसानों का भला करने वाले कृषि कानून सस्ती राजनीति की भेंट चढ़ गए। इन कानूनों की वापसी किसानों की जीत नहीं, एक तरह से उनकी हार है, क्योंकि वे जहां जिस हाल में थे, वहीं खड़े दिखने लगे हैं। अब इसमें संदेह है कि किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य को तय समय में हासिल किया जा सकेगा।

कृषि कानूनों की वापसी के अप्रत्याशित फैसले को भले ही आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा हो, लेकिन लगता यही है कि इसके मूल में उन तत्वों की सक्रियता भी एक बड़ा कारण रही, जो कृषि कानून विरोधी आंदोलन में सक्रिय होकर कानून एवं व्यवस्था के लिए चुनौती बन रहे थे। लाल किले में हुए उपद्रव से लेकर दिल्ली-हरियाणा सीमा पर मजदूर लखबीर सिंह की हत्या तक की घटनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह किसी से छिपा नहीं कि किसान नेताओं ने इन घटनाओं में लिप्त तत्वों की किस तरह या तो अनदेखी की या फिर दबे-छिपे स्वरों में उनका बचाव किया।

यह भी खेद की बात रही कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी निराश किया। अब जब सरकार यह मान रही है कि वह कुछ किसानों को सही बात समझा नहीं पाई, तब फिर उसे उन कारणों पर गौर करना होगा, जिनके चलते ऐसी नौबत आई। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि उसे सुधारों का सिलसिला कायम रखना है।

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