पेट्रोल और डीजल के बढ़ते मूल्य से गरमाई देश की राजनीति, विपक्ष ने किया भारत बंद का ऐलान

पेट्रोल और डीजल के बढ़ते मूल्य एक बार फिर राजनीतिक मसला बन गए हैं तो यह स्वाभाविक ही है। चूंकि पेट्रोल और डीजल के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं और केंद्र सरकार कोई कदम उठाती नहीं दिख रही इसलिए विपक्ष का हमलावर होना समझ आता है, लेकिन अच्छा हो कि विपक्षी दल और खासकर कांग्रेस यह स्पष्ट करे कि इस पर भारत बंद बुलाने से उसे या फिर आम जनता को क्या हासिल होने वाला है? आखिर ऐसा भी नहीं कि लोगों को इसकी जानकारी न हो कि पेट्रोल एवं डीजल के मूल्य किस तरह बढ़ते ही चले जा रहे हैं।

भारत बंद बुलाने के लिए ऐसे आरोप उछालना सस्ती राजनीति के अलावा और कुछ नहीं कि सरकार लोगों को लूटने में लगी हुई है। क्या जब संप्रग सरकार के समय एक बार पेट्रोल के दाम 70 रुपये प्रति लीटर से अधिक हो गए थे तब ऐसा ही किया जा रहा था? भारत बंद के लिए तैयार कांग्रेस और अन्य दल इस पर प्रकाश डाल सकें तो बेहतर कि सरकार को आम जनता को राहत देने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?

यदि विपक्षी दल यह चाह रहे हैं कि केंद्र सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर लगाए जाने वाले करों में कमी करे तो फिर राज्य सरकारों को भी इसमें भागीदार बनना होगा। क्या वे इसके लिए तैयार हैं? यदि हां तो फिर क्या कारण है कि अभी तक विपक्ष शासित किसी भी राज्य और यहां तक कि कर्नाटक अथवा पंजाब ने पेट्रोल और डीजल पर वैट की दरें घटाने का काम नहीं किया है? आखिर वे पेट्रोल और डीजल पर वैट की दरें घटाकर जनता को राहत देने के साथ ही केंद्र सरकार के समक्ष कोई नजीर पेश क्यों नहीं कर रहे हैं?

एक और भारत बंद का चाहे जो असर हो, मोदी सरकार यह कहकर कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकती कि पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में वृद्धि अंतरराष्ट्रीय कारणों से हो रही है। यह सही है कि कच्चे तेल के मूल्यों में वृद्धि ईरान, वेनेजुएला और तुर्की के संकटग्रस्त होने के कारण हो रही है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि भारत सरकार पेट्रोल एवं डीजल के मूल्य बढ़ते हुए देखती रहे। उसे यह आभास होना चाहिए कि महंगा पेट्रोल और डीजल आम जनता को परेशानी में डालने के साथ ही महंगाई के सिर उठाने का जरिया बन रहा है।

सरकार की ओर से किसी समस्या के कारणों को रेखांकित करना भर पर्याप्त नहीं और ऐसे बयानों का तो कोई मतलब ही नहीं कि भारत जैसा बड़ा देश बिना सोचे-समझे एक झटके में कोई कदम नहीं उठा सकता। अगर सरकार पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने के उपाय कर रही है तो यह अच्छी बात है, लेकिन उसे यह पता होना चाहिए कि ऐसे उपाय रातों-रात अमल में नहीं लाए जा सकते। माना कि डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत ने सरकार के विकल्प सीमित कर दिए हैं, लेकिन वह इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि अगर पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि का सिलसिला थमा नहीं तो महंगाई बेलगाम हो सकती है और चुनावी माहौल में यह उसके लिए कहीं बड़ा संकट होगा।

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