सही साबित हुई आशंका: विपक्ष के हंगामे से संसद की कार्यवाही हुई स्थगित और पीएम नहीं करा सके नए मंत्रियों का परिचय

विपक्ष के लिए यह तय करना आवश्यक है कि वह अपने मसलों पर संसद में चर्चा करना चाहता या फिर हंगामा? यदि हंगामा होगा तो संसद में सरकार के जरूरी कामों में अड़ंगा लगेगा और ऐसा होने का मतलब है देश का नुकसान किया जाना। क्या विपक्ष यही चाहता है?

Bhupendra SinghTue, 20 Jul 2021 03:31 AM (IST)
चुनिंदा लोगों के मोबाइल फोन की जानकारी हासिल की गई

जैसी आशंका थी, वैसा ही हुआ। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत हंगामे से हुई और हंगामा भी ऐसा कि दोनों सदनों की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। इसका अंदेशा पहले से था कि विपक्ष हंगामा करेगा, लेकिन यह आभास नहीं था कि वह प्रधानमंत्री को अपने नए मंत्रियों का परिचय कराने का भी अवसर नहीं देगा। विपक्ष की ओर से उठाए गए मुद्दों की महत्ता से इन्कार नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों को सदन से परिचित कराने का अवसर दिया जाना चाहिए था, क्योंकि यह एक परंपरा है और संसद को अपनी परंपराओं के पालन के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहिए। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। यदि इस परंपरा के निर्वहन के बाद विपक्ष अपनी बात कहता तो कोई देर या अंधेर होने वाली नहीं थी। विपक्ष ने हंगामा करने के लिए महंगाई, किसान आंदोलन आदि के अलावा जासूसी प्रकरण का भी सहारा लिया। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि यह मसला खासतौर पर विपक्ष को हंगामा करने के लिए उपलब्ध कराया गया। इसकी सुगबुगाहट दो-तीन दिनों से जारी थी कि संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही मीडिया के एक हिस्से में ऐसा कुछ आएगा, जिससे विपक्ष को हंगामा करने में आसानी होगी। अंतत: ऐसा ही हुआ। इस आशय की खबरें आईं कि एनएसओ नामक एक इजरायली कंपनी के पेगासस स्पाईवेयर के जरिये कुछ चुनिंदा लोगों की जासूसी की कोशिश की गई।

हालांकि खबरें यही कहती हैं कि पेगासस के जरिये जासूसी करने की कोशिश की गई और यह स्पष्ट नहीं कि इसमें सफलता मिली या नहीं, लेकिन विपक्ष अपनी सुविधा के लिए इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि चुनिंदा लोगों के मोबाइल फोन की जानकारी हासिल की गई अथवा उनकी बातें गोपनीय रूप से सुनी गईं। बेहतर हो कि इस मामले को उछालने वाले पहले इस बारे में सुनिश्चित हो लें कि जासूसी की गई या नहीं? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सरकार के साथ संबंधित इजरायली कंपनी ने भी इससे इन्कार किया है कि पेगासस के जरिये भारत समेत अन्य देशों के खास लोगों की जासूसी की गई। यह मामला कुछ इसी रूप में पहले भी सामने आ चुका है और तब भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका था। कहीं इस मामले को सिर्फ सनसनी पैदा करने के लिए ही तो नए सिरे से नहीं उछाला गया? वस्तुस्थिति जो भी हो, विपक्ष के लिए यह तय करना आवश्यक है कि वह अपने मसलों पर संसद में चर्चा करना चाहता है या फिर हंगामा? नि:संदेह यदि हंगामा होगा तो संसद में सरकार के जरूरी कामों में अड़ंगा लगेगा और ऐसा होने का मतलब है देश का जानबूझकर नुकसान किया जाना। क्या विपक्ष यही चाहता है?

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