हुड़दंग के आरोप में निलंबित सांसदों का धरना, संसद में विपक्ष के रवैए पर उठा सवाल

हुड़दंग के आरोप में निलंबित सांसदों के धरने पर बैठे रहने की जिद के बाद भी राज्यसभा में कामकाज चल निकलना यही बताता है कि ये सांसद एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। विपक्षी दल इन सांसदों का साथ देकर न केवल अपना नुकसान कर रहे हैं।

Pooja SinghSat, 04 Dec 2021 09:45 AM (IST)
हुड़दंग के आरोप में निलंबित सांसदों का धरना, संसद में विपक्ष के रवैए पर उठा सवाल

हुड़दंग के आरोप में निलंबित सांसदों के धरने पर बैठे रहने की जिद के बाद भी राज्यसभा में कामकाज चल निकलना यही बताता है कि ये सांसद एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। विपक्षी दल इन सांसदों का साथ देकर न केवल अपना नुकसान कर रहे हैं, बल्कि सदन में अपनी बात कहने के अपने अधिकार का खुद ही हनन कर रहे हैं। आखिर जब यह साबित हो चुकी है कि इन सांसदों ने राज्यसभा में हुड़दंग मचाकर संसद की गरिमा को आघात पहुंचाया, तब फिर समझदारी इसी में है कि वे अपनी गलती मानकर आगे बढ़ें। यदि वे माफी मांगने के लिए तैयार नहीं तो कम से कम अपने अशोभनीय आचरण के लिए खेद तो प्रकट ही कर सकते हैं।

निलंबित सांसदों की पैरवी कर रहे विपक्षी दलों को जितनी जल्दी यह समझ आए, उतना ही बेहतर कि वे न केवल संसद की मर्यादा भंग करने वाली शर्मनाक हरकत का बचाव कर रहे हैं, बल्कि यह भी जाहिर कर रहे हैं कि राष्ट्रीय मसलों पर चर्चा में उनकी दिलचस्पी नहीं। वास्तव में यह रवैया एक बड़ी बीमारी का लक्षण है। एक अर्से से विपक्ष ने हर मसले पर सरकार का विरोध करने की ठान रखी है। इसके चलते अब वह सरकार के शासन करने के अधिकार पर ही आघात करने लगा है। कोई भी विधेयक हो, आम तौर पर विपक्ष की यही दलील होती है कि वह उसे स्वीकार नहीं।

ऐसा लगता है कि विपक्ष यह भूल ही गया है कि उसका काम केवल विरोध करना ही नहीं, बल्कि सुझाव देना भी होता है। वह इसके लिए शायद ही कभी कोशिश करता हो कि उसके सुझाव सरकारी फैसलों और विधेयकों का हिस्सा बनें। वह इसी कोशिश में रहता है कि न तो कोई विधेयक पारित हो और न ही सरकार कोई फैसला ले। यह सही है कि संसद चलाना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन आखिर विपक्ष के अड़ियल और असहयोग भरे रवैये के रहते कोई भी सरकार सदन और यहां तक कि शासन कैसे चला सकती है? एक बड़ी समस्या यह भी है कि विपक्ष तर्क के जवाब में कुतर्क पेश करने लगा है। इतना ही नहीं, वह कुतर्क के साथ दुष्प्रचार का भी सहारा लेता है।

कृषि कानूनों के मामले में उसने ठीक यही किया। ऐसा करके उसने देश के 86 प्रतिशत छोटे और मझोले किसानों के हितों की बलि ही ली। इन कानूनों की वापसी विपक्ष की जीत नहीं, उन किसानों की हार है, जिनका वह हितैषी होने का दावा करता है। यह अच्छा हुआ कि राज्यसभा सभापति निलंबित सांसदों को बहाल करने की विपक्ष की बेजा मांग के आगे नहीं झुके। इन सांसदों के व्यवहार की अनदेखी करने का मतलब होगा, संसद में हुड़दंग को बढ़ावा देना।

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