किसानों के फर्जी हितैषी: कृषि कानूनों को लेकर कांग्रेस के उकसावे में महाराष्ट्र सरकार की मौकापरस्त राजनीति

किसानों को राहत देने वाले कृषि कानूनों को लेकर मौकापरस्त राजनीति।
Publish Date:Mon, 28 Sep 2020 11:06 PM (IST) Author: Bhupendra Singh

किसानों को राहत देने वाले कृषि कानूनों को लेकर किस तरह सस्ती एवं मौकापरस्त राजनीति हो रही है, इसका शर्मनाक उदाहरण है महाराष्ट्र सरकार द्वारा इन कानूनों के विरोध में उतर आना। यह वह सरकार है, जिसने इन प्रस्तावित कानूनों के संदर्भ में जारी अध्यादेशों को सबसे पहले लागू किया था। अब अचानक वह इन कानूनों के विरोध में आ खड़ी हुई है। क्या इन अध्यादेशों को अधिसूचित करते समय उसे नहीं पता था कि वह क्या करने जा रही है या फिर वह कांग्रेस के उकसावे में आकर खुद की फजीहत कराना पसंद कर रही है? महाराष्ट्र में जब इन अध्यादेशों को अधिसूचित किया गया था, तब सरकार में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने कहा था कि इससे किसानों को मदद मिलेगी। अब वे इसके ठीक उलट राग अलाप रहे हैं। कुछ ऐसा ही काम शिरोमणि अकाली दल के नेता कर रहे हैं।

अध्यादेश जारी होते समय तो उनकी तारीफ की जा रही थी, लेकिन जब वे विधेयक के रूप में संसद से पारित हो गए तो उनमें खराबी नजर आने लगी। क्या अकाली नेता यह मानकर चल रहे थे कि सरकार इन अध्यादेशों को कानून का रूप देने से इन्कार कर देगी? ये अध्यादेश जारी होते समय कांग्रेस ने भी उनका विरोध करना जरूरी नहीं समझा था। साफ है कि किसानों के हितैषी बनने का दावा करने वाले दल और खासकर कांग्रेस जानबूझकर उनके हितों की अनदेखी कर रही है।

किसानों को अपने फर्जी हितैषियों से सावधान रहना होगा, क्योंकि वास्तव में वे उनके नहीं, बल्कि आढ़तियों और बिचौलियों के स्वार्थ साधने में लगे हुए हैं। किसान हित की आड़ लेकर नए कृषि कानूनों के विरोध में सड़कों पर उतर रहे राजनीतिक दल किस तरह किसानों को बदनाम करने पर तुले हैं, इसका पता दिल्ली में इंडिया गेट के समीप कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की ओर से एक ट्रैक्टर को आग के हवाले किए जाने से चलता है। यह बहुत ही गंदी हरकत है। क्या कोई किसान अपनी आजीविका के साधन को इस तरह जला सकता है? ऐसी धृष्टता तो वही कर सकता है, जिसे किसानों की संवेदनाओं से कोई लेना-देना न हो।

ट्रैक्टर जलाने वाले न तो किसान हो सकते हैं और न ही उनके हितैषी। किसानों को कांग्रेस के बहकावे में आने के बजाय उसके नेताओं से पूछना चाहिए कि यदि नए कृषि कानून इतने ही खराब हैं तो फिर उसने पिछले लोकसभा चुनाव के मौके पर जारी अपने घोषणा पत्र में वैसी व्यवस्था बनाने का वायदा क्यों किया था, जैसी इन कानूनों में की गई है? बेहतर हो कि किसान यह देखें कि वे मौकापरस्त राजनीतिक दलों के हाथ बदनाम न होने पाएं।

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