एमएसपी पर कानून बनने से नहीं होने वाला किसानों की समस्‍याओं का समाधान

इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि किसान फसल चक्र में परिवर्तन के लिए तैयार नहीं। वे जरूरत से ज्यादा गेहूं और धान की पैदावार कर रहे हैं। देश के पास इतना अधिक चावल है जो पूरी दुनिया को खिलाने के लिए पर्याप्त है।

TilakrajMon, 22 Nov 2021 09:20 AM (IST)
सरकार पहले ही अनाज खरीद में अपनी सामर्थ्‍य से अधिक सब्सिडी दे रही

किसान संगठनों की यह मांग मानने में हर्ज नहीं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को लेकर गठित होने वाली समिति में उनकी भी भागीदारी हो, लेकिन यदि वे यह जिद पकड़ेंगे कि एमएसपी पर गारंटी कानून बने तो इसे पूरा करना संभव नहीं। नि:संदेह यह कहने-सुनने में अच्छा लगता है कि कृषि उपज की खरीद एमएसपी कानून के तहत हो, लेकिन इसे कोई सरकार चाहकर भी अमल में नहीं ला सकती। कोई भी सरकार हो, वह न तो किसानों की पूरी उपज खरीद सकती है और न ही एमएसपी खरीद का गारंटी कानून बनाकर निजी व्यापारियों को इसके लिए मजबूर कर सकती है कि वे तय दाम पर ही कृषि उपज खरीदें। निजी व्यापारी ऐसा करके घाटा उठाने के बजाय अनाज का आयात करना पसंद करेंगे।

वैसे भी दुनिया के अन्य देशों में अन्न के दाम लगातार कम हो रहे हैं। साफ है कि एमएसपी पर जैसे कानून की मांग की जा रही है, उससे किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला। कानून बन भी जाए तो सरकार पूरा अनाज खरीद पाने में सक्षम नहीं होगी और निजी व्यापारी उसे खरीदने के लिए आगे नहीं आएंगे। अंतत: नुकसान किसानों का ही होगा।

इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि किसान फसल चक्र में परिवर्तन के लिए तैयार नहीं। वे जरूरत से ज्यादा गेहूं और धान की पैदावार कर रहे हैं। देश के पास इतना अधिक चावल है, जो पूरी दुनिया को खिलाने के लिए पर्याप्त है। एमएसपी पर गारंटी कानून बनाने की मांग कर रहे किसान नेताओं को यह भी समझना होगा कि सरकार पहले से ही जरूरत से ज्यादा अनाज की खरीदारी करने को मजबूर है। जब सरकारी खरीद से अनाज के गोदाम भरे पड़े हों, तब सरकार के लिए बिना जरूरत अन्न की खरीदारी संभव नहीं। यदि वह बेहिसाब अनाज खरीदने के लिए विवश हो जाएगी, तो फिर उसके पास न तो अन्य किसी सब्सिडी के लिए पैसा बचेगा और न ही विकास के कामों के लिए।

सरकार पहले ही अनाज खरीद में अपनी सामर्थ्‍य से अधिक सब्सिडी दे रही है। जब अन्न खरीद की मौजूदा सब्सिडी पर ही विश्व व्यापार संगठन को आपत्ति है, तब फिर यदि किसी मजबूरी में उसे बढ़ा भी दिया जाए, तो अनाज का निर्यात करना मुश्किल हो जाएगा। किसान नेता पहले ही अपनी जिद से 86 प्रतिशत किसानों के हितों की बलि ले चुके हैं। अब उन्हें जमीनी हकीकत को समझकर विवेकपूर्ण फैसला करना होगा। वे न तो बाजार के नियमों की अनदेखी कर सकते हैं और न ही इस तथ्य की कि किसी भी उत्पाद के अच्छे दाम तभी मिलते हैं, जब बाजार में उसकी मांग होती है।

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