दिशाहीन कांग्रेस: गुटबाजी और बेमेल गठबंधन के चलते राज्यों के चुनावों में कांग्रेस को चुकानी पड़ी कीमत, चव्हाण समिति ने किया खुलासा

असंतोष का एक बड़ा कारण यह है कि राहुल गांधी अध्यक्ष न होते हुए भी पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं। उनकी समस्त राजनीति ट्विटर पर आधारित है। ट्विटर के जरिये खबरों में तो बने रहा जा सकता है लेकिन पार्टी को कोई दिशा नहीं दी जा सकती।

Bhupendra SinghWed, 02 Jun 2021 09:16 PM (IST)
क्या नए अध्यक्ष के चुनाव में भी पार्टी की गुटबाजी आड़े आ रही है?

हाल में हुए पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस ने अपनी पराजय के कारणों पर गौर करने के बाद यह पाया कि गुटबाजी और गठबंधन उस पर भारी पड़े। यह निष्कर्ष उस अशोक चव्हाण समिति का है, जिसका गठन यह पता लगाने के लिए किया गया था कि कांग्रेस को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में पराजय का सामना क्यों करना पड़ा? देखना है कि इस समिति की रपट को सार्वजनिक किया जाता है या नहीं, क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में पराजय के कारण जानने के लिए गठित एके एंटनी समिति की रपट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई और यह किसी को पता नहीं कि 2019 के लोकसभा चुनावों में हार की वजह जानने की कोई कोशिश की गई या नहीं? जो भी हो, यह लगता नहीं कि कांग्रेस हार के कारणों पर ईमानदारी से मंथन करने के लिए तैयार है, क्योंकि यदि पार्टी में गुटबाजी थी तो फिर उसे दूर क्यों नहीं किया जा सका? क्या कांग्रेस नेतृत्व यानी गांधी परिवार इतना सक्षम नहीं कि वह अपने नेताओं की गुटबाजी दूर न कर सके? सवाल यह भी है कि आखिर कांग्रेस दो साल बाद भी नेतृत्व का मसला क्यों नहीं सुलझा पाई है? क्या कारण है कि सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बने हुए अर्सा बीत गया है और फिर भी पार्टी नए अध्यक्ष का चुनाव कराने की जरूरत नहीं समझ रही है? क्या नए अध्यक्ष के चुनाव में भी पार्टी की गुटबाजी आड़े आ रही है?

कांग्रेस नए अध्यक्ष का चुनाव करने में जिस तरह नाकाम हो रही है, उससे तो नेतृत्व की नाकामी ही रेखांकित हो रही है। यह एक तथ्य है कि किसी भी पार्टी में गुटबाजी पनपती है तो नेतृत्व की नाकामी के कारण ही। पहले तो कांग्रेस में गुटबाजी राज्यों के स्तर पर ही थी, लेकिन अब तो वह केंद्रीय स्तर पर भी उभर आई है। यदि असंतुष्ट कहे जाने वाले 23 नेताओं का समूह अस्तित्व में है तो नेतृत्व की कमजोरी के कारण ही। यह भी किसी से छिपा नहीं कि इस समूह के असंतोष का एक बड़ा कारण यह है कि राहुल गांधी अध्यक्ष न होते हुए भी पर्दे के पीछे से उसी तरह काम कर रहे हैं। उनकी समस्त राजनीति ट्विटर पर आधारित है। ट्विटर के जरिये खबरों में तो बने रहा जा सकता है, लेकिन पार्टी को कोई दिशा नहीं दी जा सकती। इसी तरह वैसे बेमेल गठबंधन करके भी पार्टी को दिशा नहीं दी जा सकती, जैसे कांग्रेस ने असम, बंगाल आदि में किए। क्या ये गठबंधन कांग्रेस नेतृत्व की मर्जी के बगैर हो गए? यदि नहीं तो फिर उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

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