सामुदायिक रसोई का विचार कितना भी आकर्षक दिखता हो, उस पर अमल आसान नहीं

आखिर जब यह योजना पहले से चल रही है तब फिर उसे ही आगे बढ़ाने की पहल क्यों नहीं की जाती? जब अन्न के भंडार भरे हुए हैं तब ऐसी किसी योजना के जरिये भुखमरी की समस्या से निपटना कठिन नहीं होना चाहिए।

TilakrajWed, 17 Nov 2021 08:51 AM (IST)
भुखमरी से जूझ रहे लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे में लाने का काम क्यों नहीं किया जा सकता

भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए सामुदायिक रसोई स्थापित करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को केवल फटकार ही नहीं लगाई, बल्कि यह भी कहा कि उसे संदेह है कि वह ऐसी योजना लागू करने का इरादा नहीं रखती। कहना कठिन है कि सच क्या है, लेकिन केवल केंद्र सरकार को फटकार लगाने से बात बनने वाली नहीं है। देश भर में सामुदायिक रसोई स्थापित करने जैसा बड़ा काम राज्यों के सक्रिय सहयोग के बिना संभव नहीं। ऐसी किसी योजना में केंद्र राज्यों का सहयोग कर सकता है और वह उसे करना भी चाहिए, लेकिन जब तक राज्य सरकारें और उनकी विभिन्न एजेंसियां आगे नहीं आतीं, तब तक बात बनने वाली नहीं है।

वास्तव में राज्य सरकारों का तंत्र ही यह बेहतर तरीके से पता कर सकता है कि कहां किनके लिए सामुदायिक रसोई स्थापित करने की आवश्यकता है? इस मामले में राज्य सरकारें भी गंभीर नहीं, इसका पता इससे चलता है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इसी जनहित याचिका पर जवाब न दाखिल करने वाले छह राज्यों पर जुर्माना लगाया था।

इससे इन्कार नहीं कि देश में कुपोषण और भुखमरी की समस्या है, लेकिन जब तक इसका सटीक आकलन नहीं होता कि इस समस्या से कौन लोग जूझ रहे हैं, तब तक उन्हें राहत भी नहीं दी जा सकती। प्रभावित लोगों की सही तरह पहचान किए बगैर सामुदायिक रसोई जैसी योजना उसी तरह अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का शिकार हो सकती है, जैसे एक समय सार्वजनिक वितरण प्रणाली थी। भले ही सुप्रीम कोर्ट याचिकाकर्ता की इस मांग से सहमत हो कि भुखमरी की समस्या का समाधान सामुदायिक रसोई स्थापित किया जाना है, लेकिन उचित यह होगा कि समाधान के कहीं अधिक प्रभावी तरीकों पर विचार किया जाए।

आखिर भुखमरी से जूझ रहे लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे में लाने का काम क्यों नहीं किया जा सकता? सवाल यह भी है कि कोरोना काल में लागू की गई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को उन वर्गो के बीच जारी क्यों नहीं रखा जा सकता, जिनके बारे में यह माना जा रहा है कि वे भुखमरी से ग्रस्त हैं? 30 नवंबर तक जारी रहने वाली इस योजना के तहत गरीबों को मुफ्त में प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज दिया जाता है।

आखिर जब यह योजना पहले से चल रही है, तब फिर उसे ही आगे बढ़ाने की पहल क्यों नहीं की जाती? जब अन्न के भंडार भरे हुए हैं, तब ऐसी किसी योजना के जरिये भुखमरी की समस्या से निपटना कठिन नहीं होना चाहिए। सामुदायिक रसोई का विचार कितना भी आकर्षक दिखता हो, उस पर अमल आसान नहीं।

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