चीन को जवाब: पीएम मोदी ने वियतनाम के नए पीएम को जीत की और कम्युनिस्ट पार्टी को सालगिरह की बधाई देकर एक तीर से साधे कई निशाने

भारतीय नेतृत्व को चीन से अपनी नाखुशी प्रकट करने का कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहिए-ठीक वैसे ही जैसे उसने इस माह के प्रारंभ में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस पर उसे शुभकामनाएं देना जरूरी नहीं समझा।

Bhupendra SinghSat, 10 Jul 2021 08:22 PM (IST)
भारतीय नेतृत्व को चीन से अपनी नाखुशी प्रकट करने का कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहिए

वियतनाम के नए प्रधानमंत्री को जीत की और वहां की कम्युनिस्ट पार्टी को सालगिरह की बधाई देकर भारतीय प्रधानमंत्री ने एक तीर से कई निशाने साधने वाला ही काम किया। भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने वियतनामी समकक्ष से वार्ता के दौरान एक खुले, समावेशी, शांतिपूर्ण और नियम-आधारित हिंद महासागर क्षेत्र को लेकर जो प्रतिबद्धता व्यक्त की, वह एक तरह से चीन को दिया जाना वाला यह संकेत है कि वह इस क्षेत्र की स्थिरता में बाधक बन रहा है। चीन को ऐसे साफ संकेत देने का सिलसिला तेज होना चाहिए, क्योंकि इसके आसार नहीं दिख रहे कि वह सीमा विवाद के मामले में अपने अड़ियल रवैये का आसानी से परित्याग करेगा। यह अच्छा है कि पिछले कुछ समय से चीन के प्रति भारतीय नेतृत्व के तेवर बदले हुए दिखाई दे रहे हैं। अभी हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को उनके 86वें जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं और फिर इस बारे में ट्वीट कर जानकारी भी सार्वजनिक की। यह इसलिए उल्लेखनीय रहा कि अभी हाल तक भारत की ओर से ऐसे प्रसंगों को रेखांकित नहीं किया जाता था। यदि भारत इस नतीजे पर पहुंच रहा है कि चीन को सही रास्ते पर लाने के लिए उसकी दुखती रगों को दबाना होगा तो यह शुभ संकेत है।

इसका कोई मतलब नहीं कि भारत तो चीन की संवेदनशीलता की चिंता करे, लेकिन वह भारतीय हितों की अनदेखी ही करता रहे। चीन को यह बताया ही जाना चाहिए कि ताली एक हाथ से नहीं, दोनों हाथों से बजती है। नि:संदेह तिब्बत और वहां के धर्मगुरु दलाई लामा चीन के लिए एक नाजुक मसला हैं, लेकिन यदि चीन यह चाहता है कि भारत उसके नाजुक मसलों पर संयम बरते तो फिर ऐसा ही उसे भारत के संवेदनशील मसलों पर करना होगा। उचित यह होगा कि भारत सरकार दलाई लामा के जरिये तिब्बत के सवालों को उभारने तक ही सीमित न रहे। उसे तिब्बत के मसले को सतह पर लाने के लिए भी सक्रियता दिखानी चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि भारत की यह घोषित नीति रही है कि तिब्बत चीन का स्वायत्तशासी क्षेत्र है। अब जब चीन ने तिब्बत की स्वायत्तता हड़प ली है तो फिर भारत के लिए यह ठीक नहीं कि वह इस क्षेत्र के साथ हो रहे अन्याय को लेकर मौन धारण किए रहे। भारतीय नेतृत्व को चीन से अपनी नाखुशी प्रकट करने का कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहिए-ठीक वैसे ही जैसे उसने इस माह के प्रारंभ में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस पर उसे शुभकामनाएं देना जरूरी नहीं समझा। यह सिलसिला कायम रहे और ताइवान एवं हांगकांग पर भी भारत अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करे तो बेहतर।

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