सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप एक गंभीर मामला है

जितना गंभीर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगना है उतना ही उनका यह कहना भी कि ये आरोप किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हैं और उनका मकसद है न्यायपालिका को निष्क्रिय करना। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि ये आरोप ऐसे समय आए जब सुप्रीम कोर्ट कई संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने जा रहा है। यह बेहद गंभीर टिप्पणी है। अगर सुप्रीम कोर्ट को अस्थिर करने के लिए इस हद तक जाया जा सकता है तो इससे खतरनाक बात और कोई नहीं हो सकती। इस मामले में जो जानकारी सार्वजनिक हुई है उसके आधार पर किसी के लिए भी किसी नतीजे पर पहुंचना कठिन है और पहुंचा भी नहीं जाना चाहिए, लेकिन सच-झूठ की तह तक जाना भी जरूरी है और यह किसी जांच से ही संभव है। यह जांच न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप केवल होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखनी भी चाहिए। यह इसलिए और आवश्यक है, क्योंकि मुख्य न्यायाधीश का कहना है कि यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला के पीछे कुछ बड़ी ताकतें हैैं। इन स्थितियों में सुप्रीम कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा कि ये ताकतें न केवल बेनकाब हों, बल्कि कठोर दंड की भागीदार भी बनें।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोप सच हैैं या झूठ, इसका फैसला चाहे जब और जैसे हो, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकी कि वह एक तरह से मी-टू की चपेट में आ गए हैैं। यह अंतरराष्ट्रीय अभियान भारत में भी एक अर्से से अपना असर दिखा रहा है।

कार्यस्थलों में महिलाओं का यौन उत्पीड़न एक हकीकत है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए किसी सुनिश्चित प्रक्रिया का अभाव ही दिख रहा है। जब कोई नामचीन हस्ती यौन उत्पीड़न के आरोपों से दो-चार होती है तो देश भर में शोर मच जाता है और उसके मामले में अलग व्यवहार होता है, लेकिन जब कोई आम आदमी इस तरह के आरोपों का सामना करता है तो कभी चर्चा नहीं होती और कभी वह आरोप सिद्ध हुए बगैर दंडित हो जाता है। साफ है कि इस तरह के आरोपों की जांच के लिए ऐसी कोई व्यवस्था बनाने की दरकार है जिससे एक ओर जहां यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को न्याय मिले वहीं दूसरी ओर कोई झूठे आरोपों का शिकार न बनने पाए। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि यौन उत्पीड़न के झूठे आरोप लगाने के मामले पहले भी सामने आ चुके हैैं। ऐसे मामलों में जब तक सच्चाई सामने आती है, आरोपित की प्रतिष्ठा धूल-धूसरित हो चुकी होती है। ऐसा न हो, इसकी कोई व्यवस्था बननी चाहिए और यह व्यवस्था बने, यह देखना नीति-नियंताओं के साथ न्याय के रखवालों का भी काम है।

मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोपों के मामले में यह एक सवाल उठा है कि क्या उन्हें उस बेंच का हिस्सा होना चाहिए जिसने उनके मामले की सुनवाई की? इस सवाल के साथ इसकी भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगाने वाली महिला की शिकायत का विवरण मीडिया के एक खास हिस्से में ही आया और उसके पहले यह शिकायत 22 न्यायाधीशों तक पहुंचा दी गई।

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