इंग्लैैंड के बराबर अर्धशतक और उससे ज्यादा शतक के बाद भी टीम इंडिया हारी क्यों?

[ शिवेंद्र कुमार सिंह ]: भारतीय क्रिकेट टीम ने 12 दिसंबर 2016 को मुंबई में इंग्लैंड को पारी और 36 रनों के बड़े अंतर से हराया था। इस जीत के साथ ही टीम इंडिया ने सीरीज पर भी कब्जा किया था। विराट कोहली ने उस टेस्ट मैच में शानदार दोहरा शतक जड़ा था। उस जीत के बाद विराट ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि उन्होंने टेस्ट टीम की कप्तानी संभालने के बाद साथी खिलाड़ियों के साथ संवाद पर काफी ध्यान दिया है। उन्होंने खिलाड़ियों को समझाया है कि टेस्ट क्रिकेट में कई बार मैदान में कुछ समय ऐसा मिलता है जब आप अपनी काबिलियत से मैच का रुख अपनी टीम की तरफ मोड़ सकते हैं, लेकिन आप ऐसा इसलिए नहीं करते, क्योंकि आपको अपना कोई व्यक्तिगत रिकॉर्ड दिख रहा होता है या टीम में अपनी जगह पक्की करना पहला लक्ष्य होता है।

अगर उस वक्त उस व्यक्तिगत उपलब्धि की फिक्र किए बिना टीम के लिए खेला जाए तो कामयाबी निश्चित तौर पर मिलेगी। तब विराट ने यह भी कहा था कि वह इस सोच को खिलाड़ियों के दिमाग से निकालने में कामयाब हुए हैं। उनके मुताबिक इसी कारण टीम के हर खिलाड़ी में एक चैंपियन दिखाई दे रहा है। क्या करीब दो साल बाद विराट कोहली अपनी इस बात को दोहरा पाएंगे? यह सवाल इसलिए, क्योंकि उनकी कप्तानी में टीम इंडिया इंग्लैंड से 4-1 से टेस्ट सीरीज हार चुकी है। यह वही टेस्ट सीरीज है जिसके शुरू होने से पहले कई दिग्गजों ने कहा था कि भारत के पास इंग्लैंड को उसी के घर में हराने का यह बेहतरीन मौका है।

टीम के कोच रवि शास्त्री तो कई कदम आगे निकलकर ताल ठोंक रहे थे कि उनकी टीम के खिलाड़ी अब ‘कंडीशंस’ के मोहताज नहीं हैं। वे अहमदाबाद में खेलें, ओवल में खेलें या ऑकलैंड में खेलें, एक जैसे प्रदर्शन की क्षमता रखते हैं। उन्होंने यह भी दावा कर दिया था कि मौजूदा भारतीय टीम विदेशी दौरों पर निकली पिछली कई टीमों से बेहतर टीम है। इन दावों की हवा ऐसे निकली कि अब कुछ बोलते नहीं बन रहा है।

इंग्लैंड के खिलाफ 4-1 से मिली हार की जड़ में क्या है? जिस सीरीज के तीन मैचों में हार-जीत का फैसला सवा सौ से कम रनों के अंतर पर हुआ हो उसमें पराजय के मूल कारणों की पहचान करना बहुत जरूरी है। हार का अंतर बड़ा हो तो हार की वजहें भी साफ दिखती हैं, लेकिन हार का अंतर मामूली हो तो हार की वजह तलाशना मुश्किल होता है। अगर भारत के बल्लेबाज नहीं चले तो इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने भी कोई रनों का पहाड़ नहीं खड़ा किया। सारी कहानी उसी ‘टीम भावना’ में छिपी है जिसका जिक्र विराट कोहली ने करीब दो साल पहले मुंबई में किया था।

ओवल में भारतीय टीम 464 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही थी। कोई नौसिखिया भी बता देता कि भारत यह टेस्ट मैच जीत नहीं सकता। मैच के आखिरी दिन का खेल जब शुरू हुआ तो भारतीय टीम ने 58 रन पर तीन विकेट से आगे खेलना शुरू किया। रहाणे और विहारी जल्दी ही आउट हो गए तो लगा, अब मैच खत्म ही है। इसके बाद पूरी सीरीज में रनों के लिए तरस रहे केएल राहुल ने नया रूप अख्तियार किया। दूसरे छोर पर थे इसी सीरीज से टेस्ट कॅरियर की शुरुआत करने वाले ऋषभ पंत। दोनों ने जिस तरह बल्लेबाजी की उससे यही सवाल मन में कौंधा कि इस पिच पर बाकी बल्लेबाज रन क्यों नहीं बना पा रहे? केएल राहुल ने पांचवे दिन लंच तक अपना शतक पूरा कर लिया।

लंच से चायकाल तक का समय ऋषभ पंत का था। उन्होंने चारों ओर मनचाहे शॉट्स लगाए और अपनी सेंचुरी पूरी की। चाय के विश्राम पर जब दोनों ड्रेसिंग रूम में लौटे तो स्कोर 298 रन पर पांच विकेट था। इसके बाद सिर्फ एक सेशन का खेल बाकी था। टीम इंडिया जीत किसी हाल में नहीं सकती थी, लेकिन यह टीम हित में था कि ये दोनों बल्लेबाज आराम से विकेट पर वक्त बिताते और हार को टालते, लेकिन चायकाल के बाद करीब आधे घंटे के भीतर दोनों शतकवीर पवेलियन में बैठे थे। कुछ ही मिनट बाद पूरी टीम पवेलियन में थी।

इस पर गौर करें कि इस सीरीज में इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने कुल मिलाकर चार शतक लगाए जबकि भारतीय बल्लेबाजों ने पांच। इंग्लैंड की तरफ से दस अर्धशतक लगे, भारतीय टीम ने भी दस अर्धशतक लगाए। सीरीज के श्रेष्ठ गेंदबाजी आंकड़ों में तीन भारतीय गेंदबाजों के हैं, जबकि दो इंग्लैंड के, लेकिन ऐसा प्रदर्शन सीरीज के नतीजे पर असर नहीं डाल सका। आखिर क्यों कई मौकों पर कड़ी चुनौती देने के बाद भी टीम इंडिया को 4-1 से हार का सामना करना पड़ा? इस सवाल का जवाब बड़ा सीधा है- हर खिलाड़ी ने अपने-अपने प्रदर्शन की फिक्र अधिक की। अपने लिए जिससे जो बन पड़ा उसने किया, लेकिन टीम के लिए नहीं कर पाया। इसमें दोराय नहीं कि भारतीय गेंदबाजों ने लाजबाव प्रदर्शन किया, लेकिन यह भी साफ है कि ज्यादातर मौकों पर वे बल्ले से टीम के लिए कुछ नहीं कर पाए।

एक जमाने में कहा जाता था कि टेस्ट क्रिकेट में आप चाहे बतौर गेंदबाज ही क्यों न खेल रहे हों, लेकिन आपको कुछ देर क्रीज पर टिकना आना चाहिए। निचले क्रम से जो 30-40 रनों की उम्मीद होती है वह इस सीरीज में करीब-करीब हर बार टूटी। पूरी सीरीज में ईशांत शर्मा ने 42 रन बनाए, मोहम्मद शमी ने 27 रन बनाए, जसप्रीत बुमराह ने 6 रन बनाए। उधर इंग्लैैंड की ओर से सैम करन ने अकेले 272 रन बनाए। स्टुअर्ट ब्रॉड ने 87 रन बनाए। सैम करन या स्टुअर्ट ब्रॉड के बनाए रनों से टीम में उनकी जगह पर कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन ये रन उनकी टीम के बहुत काम आए। इसके विपरीत पूरी सीरीज में ऐसा लगा कि हमारी टीम का हर खिलाड़ी बस इसके लिए खेल रहा है कि वह अपने व्यक्तिगत प्रदर्शन से टीम में बना रहे। इस दौरे पर गए ज्यादातर खिलाड़ियों के पास आने वाले समय में यह तो बताने के लिए होगा कि उन्होंने इंग्लैंड में क्या किया, बस वे यह बताने में हिचकिचाएंगे कि उनकी टीम ने क्या किया और क्या पाया?

[ लेखक खेल पत्रकार हैैं ]

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