हमारे देश के कानून क्यों दूसरे पक्ष के प्रति होने वाले अन्याय के बारे में नहीं सोचते?

[ क्षमा शर्मा ]: लगभग तीन साल पहले दिल्ली की एक सड़क पर आगे-पीछे जाने को लेकर एक लड़के पर एक लड़की ने यौन प्रताड़ना का आरोप लगाया। हालांकि मौके पर मौजूद एक शख्स ने कहा कि लड़के ने लड़की के साथ कोई गलत बर्ताव नहीं किया था, लेकिन जैसा अक्सर होता है, लड़की के आरोप लगाते ही लड़के को खलनायक मान लिया गया। टीवी चैनलों पर जोरदार बहस शुरू हो गईं। ऐसी ही एक बहस में डाक्यूमेंट्री निर्माता दीपिका भारद्वाज ने मामले की तह में गए बिना लड़के को दोषी करार देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए, लेकिन किसी ने परवाह नहीं की। अब उसी चैनल के उस पत्रकार ने इस लड़के से माफी मांगी जिसने इस घटना को रिपोर्ट किया था, लेकिन इस लड़के का जो नुकसान होना था वह हो गया।

यदि किसी पर आरोप लगते ही लोग और खासकर मीडिया न्यायाधीश बनकर फैसला सुनाने लगेगा तो फिर वकील और अदालत की जरूरत ही क्या? छेड़छाड़ और यौन प्रताड़ना संबंधी मामलों में अक्सर यही होता है। जिस पर आरोप लगता है उसे कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। शायद ही किसी को इसकी परवाह होती हो कि उस व्यक्ति पर क्या गुजरती होगी और उसका परिवार क्या महसूस करता होगा? बाद में अगर वह व्यक्तिआरोप मुक्त भी हो जाए तो कोई उसकी सुध नहीं लेता और भूल सुधार तो तभी होती है जब मानहानि का मामला दायर किया जाता है। एक पूर्व न्यायाधीश के मामले में ऐसा ही हुआ था। उन्होंने मानहानि का मुकदमा ठोका तो सारे क्रांतिवीर मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।

यह दुखद है कि झूठे आरोप का शिकार दिल्ली के उक्त युवक को अदालतों के चक्कर काटते हुए तीन साल हो चुके हैं। उसे हर तारीख पर जाना पड़ता है, जबकि इन तीन सालों में वह लड़की एक दिन भी अदालत में नहीं आई। उसके घर वालों को फोन करने पर पता चला कि वह तो भारत में है ही नहीं, पढ़ने के लिए कनाडा जा चुकी है। लड़के का कहना है कि उसे भी अपना करियर बनाने का हक है, लेकिन उस पर जो आरोप लगा उससे वह नौकरी से हाथ धो बैठा।

तीन साल पहले यानी कथित घटना के समय वह वह जहां काम करता था वहां से उसे हटा दिया गया। फिर उसने चालीस प्रतिशत कम वेतन पर दूसरी जगह नौकरी की, लेकिन जैसे वहां पता चला कि उसे आए दिन सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित रहना पड़ता है तो उसकी छुट्टी कर दी गई। अब तक वह कई नौकरी बदल चुका है। कुछ समय पहले तक वह जहां नौकरी करता था वहां के अधिकारियों ने कहा कि पहले अदालत से बरी हो जाओ, तब आना।

लड़के की मुश्किल यह है कि जिस लड़की ने आरोप लगाया था वह अदालत आती ही नहीं तो वह बरी कैसे हो। अगर तारीख पर तारीख पड़ती रहेगी तो वह कब तक इंतजार करेगा। उसके पास महंगा वकील करने के पैसे नहीं हैं और जो वकील सरकार की तरफ से उसे दिया गया है वह न तो न्यायाधीश के सामने कुछ बोलते हैं और न ही उसकी फाइल देखते हैं। थक-हार कर इस लड़के ने न्यायाधीश से खुद मुलाकात की और उन्हें सारा किस्सा बताया। लड़की की लगातार अनुपस्थिति से न्यायाधीश भी नाराज हैं। उनका कहना है कि अब अगर लड़की नहीं आई तो उसके खिलाफ गैर जमानती वांरट निकाला जाएगा। पता नहीं आगे क्या होगा, लेकिन यह साफ है कि एक आरोप मात्र ने इस लड़के का जीवन बर्बाद कर दिया। यह एकलौता मामला नहीं है जिसमें कोई कानून के दुरुपयोग का शिकार होता दिख रहा है। ऐसे मामले रह-रह कर सामने आते रहते हैैं, लेकिन हमेशा उन्हें अपवाद की तरह देखकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है।

अपने देश में तमाम कानून जिनकी रक्षा के लिए बनते हैं और जो न्याय देने का सुबूत होते हैं उनका इतना दुरुपयोग क्यों होता है? आखिर हमारे कानून क्यों दूसरे पक्ष के प्रति होने वाले अन्याय के बारे में नहीं सोचते? कानून बने ही इसलिए हैं कि वे न्याय दे सकें न कि दूसरे के प्रति अन्याय करने लगें।

हाल में सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में कुछ सुधार किए और यह व्यवस्था दी कि दलित उत्पीड़न के मामले में आरोप लगते ही फौरन गिरफ्तारी न की जाए। पहले जांच-पड़ताल कर ली जाए तब किसी को गिरफ्तार किया जाए, लेकिन जैसे ही यह फैसला आया। हल्ला मच गया। इस मसले पर भारत बंद तक करा दिया गया। ऐसे तर्क दिए गए कि अगर सुप्रीम कोर्ट की बात मान ली गई तो दलितों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो जाएगा। किसी ने इस पर विचार नहीं किया कि आखिर बिना जांच-पड़ताल किसी को जेल भेज देने से लोकतंत्र का भला कैसे हो जाएगा? यह लोकतंत्र की ही तो प्रतिज्ञा है कि कानून सबको न्याय दे और निरपराध को न सताए। केवल आरोप भर से लोगों को अपराधी नहीं माना जाना चाहिए। इसके अलावा कानूनों का दुरुपयोग रोकने की व्यवस्था की जानी चाहिए। आखिर जिसने किसी को आरोपित बनाया यदि उसका आरोप सही है तो उसे किसी जांच-पड़ताल से डर कैसा? स्त्रियों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए कई कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है।

इस पर अदालतें नाराजगी भी प्रकट करती हैं, लेकिन सुधार होता नहीं दिखता। दहेज संबंधी धारा 498 ए को लेकर जब यह कहा गया कि आरोप लगते ही लड़के के पूरे के पूरे परिवार को गिरफ्तार न किया जाए तब भी यही तर्क दिए गए थे कि औरतों के पास यही तो उन्हें ताकत देने वाला कानून था। इसी से लोग डरते थे, अगर औरतों के नाम लेने से गिरफ्तारियां नहीं होंगी तो कानून का क्या फायदा? इसके अलावा इस तरह के भी तर्क दिए जाते हैैं कि अदालतें पितृसत्ता से संचालित हैं, लेकिन जब औरतों को न्याय मिलता है तब कोई इस पितृसत्ता की बात नहीं करता। इसी तरह जब दलित उत्पीड़न के मामले में कानून किसी को सजा देता है तब यह सुनने को नहीं मिलता कि अदालतों में दलितों का प्रतिनिधित्व नहीं है। हम जानते हैं कि सत्ताएं चाहे वह पुरुषों की हों या स्त्रियों की वे अपने नफे-नुकसान से ही चलती हैं। लोकतंत्र में तो यह गणित वोट के गुणा-भाग के रूप में साफ दिखाई देता है।

[ लेखिका साहित्यकार हैैं ]

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