West Bengal Assembly Election 2021: जानिए ममता दीदी की बेचैनी की वजह

मुस्लिम वोट बैंक बचाए रखने के लिए उसी अनुरूप आचरण दर्शातीं ममता बनर्जी। फाइल

West Bengal Assembly Election 2021 दीदी ने सरकारी नौकरियों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को इसका लाभ भी मिला लेकिन उनकी यही नीति अब उनके गले की फांस बन गई है।

Sanjay PokhriyalMon, 19 Apr 2021 09:11 AM (IST)

ब्रजबिहारी। West Bengal Assembly Election 2021 बंगाल में पांच चरणों के मतदान के बाद अब तीन चरण शेष हैं। आगामी 29 अप्रैल को आखिरी चरण का मतदान होगा और दो मई को नतीजे आएंगे। जैसे-जैसे चुनावी कार्यक्रम खत्म होने की ओर बढ़ रहा है और मतगणना का दिन नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यानी दीदी की बेचैनी का ग्राफ ऊपर की ओर जा रहा है। कांग्रेस के अधिकांश संगठन को अपनी पार्टी में आत्मसात कर लेने और वाममोर्चा के 34 साल के शासन को समूल नष्ट करने के बाद वह पिछले 10 साल से निíवघ्न राज कर रही है।

पिछले लोकसभा चुनाव में ममता को भाजपा ने अवश्य कड़ी चुनौती दी थी, लेकिन उन्हें उम्मीद नहीं थी कि ये परिणाम राज्य विधानसभा के चुनाव में भी परिलक्षित होंगे। अब जबकि भाजपा के रूप में उनके सामने एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी खड़ा है तो उनका आत्मविश्वास पूरी तरह से डगमगा गया है। इसी का परिणाम है कि ममता दीदी चुनाव प्रचार के दौरान मंचों से खुलकर केंद्रीय सुरक्षा बलों पर आरोप लगा रही हैं कि वे भाजपा को जिताने के लिए काम कर रहे हैं। यही नहीं, हाल में उनके एक तथाकथित ऑडियो क्लिप ने तो उनकी राजनीति की कलई खोलकर रख दी। इस क्लिप में वे कूचबिहार जिले के शीतलकुची में उपद्रवी भीड़ पर सीआइएसएफ की गोलीबारी में मारे गए चार लोगों के परिजनों को दंगा भड़काने के लिए उकसा रही हैं। कहना न होगा कि इस तरह के आरोप और षड्यंत्र कोई ऐसा नेता नहीं करता, जिसे अपनी जीत पर पूरा भरोसा हो। लगातार कमजोर होती अपनी जमीन को बचाने के लिए ही इस तरह के उपक्रम किए जाते हैं।

राज्य के चुनावी समीकरण में बनर्जयिों, चटर्जयिों और मुखर्जयिों यानी भद्रलोक का हमेशा से ही दबदबा रहा है। वे दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के साथ मिलकर राज करते आए हैं। दीदी भी पिछले 10 साल से इसी समीकरण के दम पर सत्ता में हैं, लेकिन अब उनका यह गणित गड़बड़ा गया है। पार्टी पर परिवार को प्राथमिकता देने के कारण भद्रलोक के उनके करीबी साथी एक-एक कर उनसे दूर होते गए, जिन्हें भाजपा ने गले लगाने में तनिक भी देर नहीं की। राज्य की आबादी में लगभग 24 प्रतिशत की हैसियत रखने वाले राजबंशी और मतुआ जैसे दलित समुदायों का भी दीदी से मोहभंग हो चुका है, क्योंकि सत्ता में उनकी भागीदारी में कोई सुधार नहीं हुआ है। अब दीदी के पास सिर्फ मुसलमान वोट बचे हैं, जिनका बंटवारा रोकने के लिए वे एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। इस वोट बैंक में कांग्रेस, वामपंथी पार्टयिों और अब्बास सिद्दीकी के इंडियन सेकुलर फ्रंट को मिलाकर बना संयुक्त मोर्चा सेंध लगा रहा है।

दरअसल, गौर से देखा जाए तो ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति ही उनके लिए मुसीबत की बड़ी वजह बन गई है। इसके कारण राज्य का भद्रलोक भी उनसे नाराज है। शहरों में तो यह ज्यादा नहीं दिखता, लेकिन गांवों में इसका असर स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। सामाजिक रूप से भले ही मुसलमान राज्य में हाशिए पर ही हैं, लेकिन ममता राज में सरकारी नौकरियों में उन्हें प्राथमिकता दी गई है। आंकड़े भी इसकी गवाही दे रहे हैं। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के वर्ष 2005 और वर्ष 2012 के आंकड़ों और केंद्र सरकार द्वारा 2017 में शुरू किए गए लेबर फोर्स सर्वे के 2018 के आंकड़ों के अनुसार सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 2006 में 6.7 प्रतिशत से बढ़कर 2012 में नौ प्रतिशत और 2018 में 17 प्रतिशत पर पहुंच गया है।

बंगाल में सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार में मुसलमानों की हिस्सेदारी भद्रलोक की कीमत पर ही बढ़ी। वर्ष 2006 में सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार में इनका हिस्सा 63 प्रतिशत हुआ करता था, जो 2012 में घटकर 53 प्रतिशत और 2018 में 47 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसी दौरान दलितों का प्रतिनिधित्व 20 प्रतिशत पर स्थिर रहा, जबकि आदिवासियों की हिस्सेदारी 3.5 प्रतिशत से बढ़कर 6.9 प्रतिशत हो गई। राज्य की जनसंख्या में आदिवासियों की हिस्सेदारी लगभग छह प्रतिशत है। ये मुख्य रूप से दार्जििलंग, जलपाईगुड़ी, दक्षिण दिनाजपुर, पश्चिम मिदनापुर, बांकुड़ा और पुरुलिया में वास करते हैं। ममता राज में सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के बढ़ते प्रतिनिधित्व खासकर कालेजों और विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों पर उनकी बढ़ती संख्या से भद्रलोक अंदर ही अंदर काफी असहज महसूस कर रहा है।

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार 2012-13 में कॉलेज शिक्षकों में मुसलमानों की हिस्सेदारी तीन प्रतिशत थी जो 2018-19 में बढ़कर लगभग आठ प्रतिशत हो गई। इसी समयावधि में विश्वविद्यालय शिक्षकों में इस समुदाय का प्रतिनिधित्व चार प्रतिशत से बढ़कर सात प्रतिशत हो गया। इसके लिए ममता बनर्जी ने अपने शासनकाल में खूब जतन किए। उन्होंने न सिर्फ अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के आरक्षण को 10 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया, बल्कि 99 मुस्लिम समुदायों को ओबीसी की सूची में शामिल कर दिया।

दीदी ने सरकारी नौकरियों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को इसका लाभ भी मिला, लेकिन उनकी यही नीति अब उनके गले की फांस बन गई है। राज्य में भद्रलोक को लग रहा है कि अगर सबकुछ इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बंगाल को कोई पश्चिम बांग्लादेश बनने से नहीं रोक सकता है। परिवारवाद के अलावा भाजपा का दीदी पर यह बड़ा आरोप है, जिसे वह राजनीतिक रूप से भुनाने की राह पर है।

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