खुद को कमजोर साबित करता विपक्ष: विपक्ष की कमजोरी छिपाई जा रही, विपक्ष कमजोर नहीं, बल्कि बिखरा हुआ और दिशाहीन है

संसद में हंगामा मचाने के प्रति विपक्ष की अतिरिक्त दिलचस्पी से यही लगता है कि उसका मकसद सदन की कार्यवाही ठप कराना होता है। निसंदेह वह अपने इस मकसद में कामयाब हो जाता है लेकिन इससे यह कभी नहीं लगता कि वह एक मजबूत विपक्ष है।

Bhupendra SinghWed, 28 Jul 2021 04:32 AM (IST)
संसद का मानसून सत्र चलने का नाम नहीं ले रहा है

[ राजीव सचान ]: संसद का मानसून सत्र चलने का नाम नहीं ले रहा है, क्योंकि विपक्ष पेगासस जासूसी मामले की जांच कराने और तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर आक्रामक मुद्रा में है। इसी मुद्रा के चलते वह न तो लोकसभा चलने दे रहा है और न ही राज्यसभा। ये दोनों ही मसले ऐसे नहीं जिन पर संसद में बहस नहीं हो सकती। बहस के दौरान विपक्ष अपने तर्कों से सत्तापक्ष को निरुत्तर कर सकता है-ठीक वैसे ही जैसे राज्यसभा में कोरोना पर बहस के दौरान राजद सांसद मनोज झा ने अपने भावुक और प्रभावी संबोधन से किया। उन्होंने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान सरकारों की नाकामी और आम आदमी की बेबसी को जिस तरह बयान किया, उसने सभी को प्रभावित किया। आखिर संसद में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर ऐसे ही भाषण क्यों नहीं हो सकते, जो सरकार के साथ आम आदमी को सोचने के लिए बाध्य करें? यह वह सवाल है, जो विपक्ष को खुद से पूछना चाहिए, क्योंकि वही है, जो संसद को चलने नहीं दे रहा है। मनोज झा के संबोधन ने यह रेखांकित किया कि विपक्ष तार्किक हो तो उसका संख्याबल मायने नहीं रहता।

विपक्ष कमजोर नहीं है

एक अर्से से और खासकर 2014 के बाद से यह कहा जा रहा है कि विपक्ष कमजोर है और इसी कारण वह प्रभावी नहीं साबित हो पा रहा है। यह एक मिथ्या धारणा है। यदि किसी एक दल या गठबंधन की सरकार बहुमत हासिल कर ले तो इसका यह मतलब नहीं होता कि विपक्ष कमजोर हो गया है। 2014 और 2019 में मोदी के नेतृत्व में राजग ने बहुमत अवश्य हासिल किया, लेकिन वैसा नहीं जैसा राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1984 के चुनाव में हासिल किया था। उन्होंने चार सौ से अधिक सीटें हासिल की थीं। तब विपक्ष के दिग्गज नेता तक चुनाव हार गए थे और उसका संख्याबल भी सिमट गया था। आज यह स्थिति नहीं है।

विपक्ष बिखरा हुआ है

विपक्ष का संख्याबल कमजोर नहीं कहा जा सकता- न लोकसभा में और न ही राज्यसभा में। सच तो यह है कि मोदी सरकार राज्यसभा में अभी भी बहुमत से दूर हैं। आखिर इस स्थिति में विपक्ष को कमजोर बताने का क्या मतलब? कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि विपक्ष इस मिथ्या धारणा का बंधक बनकर रह गया है कि वह कमजोर है। विडंबना यह है कि इस धारणा को बनाने का काम खुद विपक्ष ने यह कहकर किया है कि मोदी सरकार बहुमत के बल पर मनमानी कर रही है। जिसे विपक्ष सत्तापक्ष की मनमानी बताता है, वह दरअसल सरकार का संसदीय कौशल है। इसी कौशल के कारण राज्यसभा से ऐसे भी अनेक विधेयक पारित हो गए, जिन पर विपक्ष को आपत्ति थी। ये विधेयक इसलिए पारित हो गए, क्योंकि विपक्ष बिखरा हुआ था या फिर उसने तार्किक रवैये का परिचय नहीं दिया। वह राज्यसभा में अक्सर ऐसा व्यवहार करता रहा जैसे उसे लोकसभा की गलतियों को ठीक करने का अधिकार मिल गया है। वह यह भी आभास कराता रहा कि देश की जनता ने मोदी सरकार को बहुमत देकर गलती कर दी है और इस गलती को सुधारने का दायित्व उस पर आ गया है। जब कभी वह ऐसा करने में नाकाम रहा तब उसने यह रोना रोया कि सरकार बहुमत के बल पर अपनी ही चला रही है। इसी के साथ यह मिथ्या धारणा बनाई जाने लगी कि विपक्ष तो कमजोर है।

विपक्ष को दीनहीन बताकर उसकी कमजोरी को ढका जा रहा

विपक्ष को बेवजह दीनहीन बताकर एक तरह से उसकी कमजोरी को ही ढका जा रहा है। विपक्ष कमजोर नहीं, बिखरा हुआ और दिशाहीन अवश्य है। इसी सत्र को देखें तो विपक्ष तय नहीं कर पा रहा है कि उसे किन मसलों पर एकजुट होना चाहिए। कुछ दल कृषि कानूनों को लेकर सरकार को घेरना चाहते हैं तो कुछ पेगासस जासूसी मामले को लेकर। कई बार एक ही समय संसद में एक से अधिक मुद्दों पर हंगामा हो रहा होता है। अपने बिखराव पर विपक्ष खुद ही लगाम लगा सकता है। उसे केवल अपना बिखराव और अपनी दिशाहीनता को ही नहीं रोकना है, बल्कि तार्किक रवैया भी अपनाना है। आखिर इस बात का क्या मतलब कि जो कृषि कानून सुप्रीम कोर्ट की ओर से स्थगित किए जा चुके हैं, उन पर संसद के भीतर और बाहर हंगामा मचाया जाए? कृषि कानूनों पर हंगामा मचाने वालों में सबसे आगे वह कांग्र्रेस है जिसने 2019 के लोकसभा चुनाव के अवसर पर जारी अपने चुनावी घोषणा पत्र में वैसे ही कानून बनाने का वादा किया था जैसे मोदी सरकार ने बनाए हैं। हालांकि सरकार इन कानूनों में संशोधन को तैयार है, लेकिन विपक्ष इन कानूनों को रद करने की वैसी ही अतार्किक मांग कर रहा है, जैसी किसान संगठन कर रहे हैं।

क्या तुक: विपक्ष किसी मसले पर चर्चा के लिए नोटिस दे और सदन में नारेबाजी भी करे

आखिर इस बात का क्या तुक कि विपक्ष किसी मसले पर चर्चा के लिए नोटिस भी दे और सदन में नारेबाजी भी करे? वह जितनी मेहनत किसी मसले पर चर्चा के लिए नोटिस देने में करता है, उससे अधिक विभिन्न मसलों पर नारेबाजी के लिए तख्तियां बनाने और उन्हें सदन में लहराने के लिए करता है। न जाने कितने सांसद ऐसे हैं जो अपनी सारी ऊर्जा इसी में खपा देते हैं कि उनकी तख्ती लोकसभा या राज्यसभा टीवी के कैमरे में कैद हो जाए। कैमरे इससे बचते हैं। इसीलिए जनता को वह बेहूदा दृश्य देखने को नहीं मिला जब तृणमूल कांग्रेस सांसद शांतनु सेन आइटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के हाथ से कागज छीनकर फाड़ रहे थे।

संसद में हंगामा मचाने का मतलब सदन की कार्यवाही ठप कराना

संसद में हंगामा मचाने के प्रति विपक्ष की अतिरिक्त दिलचस्पी से यही लगता है कि उसका मकसद सदन की कार्यवाही ठप कराना होता है। नि:संदेह वह अपने इस मकसद में कामयाब हो जाता है, लेकिन इससे यह कभी नहीं लगता कि वह एक मजबूत विपक्ष है। वह जमाना बीत गया जब सदन की कार्यवाही बाधित होना बड़ी खबर बनती थी। ऐसी खबरें अब जनता का ध्यान भी मुश्किल से ही आकर्षित करती हैं।

( लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं ) 

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