भीड़ का उन्माद हमारे राष्ट्र का मूल स्वभाव नहीं है, बढ़ती हिंसा सभ्य समाज पर कलंक है

[ हृदयनारायण दीक्षित ]: उन्माद प्राय: व्यक्तिगत नहीं होता। होता भी है तो भीतर छिपा रहता है। यह भीड़ पाकर उत्तेजित होता है। अराजक और हिंसक भी हो जाता है। आंदोलनों की भीड़ निर्जीव बसें फूंकती हैैं। अकेला मनुष्य ऐसी निरर्थक मूर्खता नहीं कर सकता। सामान्य चोरी में पकड़े गए व्यक्ति को भीड़ पीट देती है। सुशिक्षित भी भीड़ में ऐसे अवसर पर दो चार थप्पड़ मार लेते हैं। बच्चों की चोरी की घटनाओं में भीड़ संदिग्ध को मारती ही रहती है। गो तस्करी के मामलों में भीड़ के ऐसे ही आचरण देखे गए हैं। भीड़ भीड़ होती है। उसके आचरण का कोई नियम नहीं होता। भीड़ के उन्माद बढ़ने का पूर्वानुमान मुश्किल है।

सामान्य भीड़ भी किसी समय हिंसक हो सकती है। भारतीय समाज का यह चरित्र चिंताजनक है, लेकिन यहां का समाज अपने मूल स्वरूप में अराजक व हिंसक नहीं है। ऐसा होता तो गजनी का महमूद सोमनाथ न लूट पाता। पिछले ढाई-तीन दशक से ऐसा उन्माद ज्यादा बढ़ा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भीड़ ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी बड़ी हिंसा की थी। पिछले दशक में तमाम आंदोलनों तथा अन्य अवसरों पर भीड़ हिंसक हुई है। केंद्र सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी भीड़ की हिंसा पर नाराजगी प्रकट की है।

भीड़ की हिंसा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही नाराजगी व्यक्त की थी। सरकार ने लोकसभा में बताया था कि भीड़ की हिंसा पर समग्र विचार करने के लिए गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में एक मंत्रिसमूह गठित किया है। इस समूह में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद और सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद्र गहलोत शामिल हैं। इसके अलावा केंद्रीय गृहसचिव के नेतृत्व में भी एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुई भयानक हिंसा को सबसे बड़ी ‘मॉब लिंचिंग’ कहा था। उन्होंने उचित ही कहा कि संविधान में लोकव्यवस्था व पुलिस राज्य विषय हैं। राज्यों को इन विषयों पर विधि निर्माण व विधि प्रवर्तन के पूरे अधिकार हैं। उन्होंने भीड़ हिंसा रोकने के लिए समय-समय पर राज्यों को परामर्श भी जारी किए हैं। उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट और केंद्र की अपेक्षानुसार कार्रवाई भी की है। राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाला मंत्रिसमूह सम्यक विचारोपरांत प्रधानमंत्री को अपनी रिपोर्ट देगा। ऐसी त्वरित सक्रियता के बावजूद इस मुद्दे का राजनीतिक दुरुपयोग दुर्भाग्यपूर्ण है।

सुप्रीम कोर्ट की चिंता सही है। केंद्र की सक्रियता सही है। भारतीय दंड विधान में समूह द्वारा किए गए अपराधों के लिए बहुत पहले से कानून हैं। दंड प्रक्रिया संहिता के कारण पुलिस भी तमाम विधिक उपायों से समृद्ध है। मूल समस्या कानून के क्रियान्वयन की है। दुष्कर्म के कानून लगातार कड़े हुए हैं। कड़ाई मृत्युदंड और आजीवन कारावास तक पहुंच गई है। तो भी अबोध बच्चियों के विरुद्ध घटनाएं घट रही हैं। ‘मॉब लिंचिंग’ पर भी कड़ा कानून बन सकता है। माना जाता है कि कड़े दंड के भय से अपराधी अपराध नहीं करते, लेकिन यह अद्र्धसत्य है। सभ्य और सांस्कृतिक समाज स्वयं ही अपराधों से दूर रहते हैं।

पुलिस का काम आपराधिक घटना के बाद शुरू होता है। पुलिस दुष्कर्म, हत्या या भीड़ द्वारा हिंसा का पूर्वानुमान नहीं कर सकती। राजव्यवस्था की सीमा है। अपराधी को दंड दिलाना उसका कर्तव्य है। इस काम में किसी भी तरह की ढिलाई अक्षम्य है। हमें प्रकृति में विद्यमान नियम व अनुशासन देखने चाहिए। व्यक्ति को शील, आचार-व्यवहार व नियम-अनुशासन देना समाज का कर्तव्य है। हिंसा भारतीय प्रकृति नहीं है।

प्रकृति नियमबद्ध है। एक लयबद्ध संगीत है। सूर्य नियमबद्ध है। चंद्र का घटना-बढ़ना, पूर्णिमा और अमावस होना भी नियमबद्ध है। पृथ्वी नियमबंधन में गतिशील है। जल ऊंचे से नीचे प्रवाहमान है। प्रकृति अराजक नहीं है। ऋग्वैदिक पूर्वजों ने प्रकृति की प्रत्येक गतिविधि को सुसंगत नियम आबद्ध बताया है। प्रकृति का अपना आंतरिक संविधान है। उन्होंने इस संविधान का नाम रखा था ऋत। अग्नि प्रकृति की महत्वपूर्ण शक्ति है। अग्नि ऋतस् कवि या ज्ञानी बताए गए हैं। ऋग्वेद में अनेक देवताओं के उल्लेख हैं, वे भी ऋत नियमों में हैं। वरुण देव ‘ऋतस्य गोपा’ यानी प्राकृतिक संविधान के विशेषज्ञ हैं। पृथ्वी भी ‘ऋतस्य’ है।

डॉ. राधाकृष्णन ने बताया है कि ईश्वर भी इस विधान में परिवर्तन नहीं कर सकता। मनुष्य इसी प्रकृति का भाग है। उसे भी विधि मर्यादा में रहना चाहिए, लेकिन मनुष्य प्राकृतिक विरासत के बावजूद मर्यादित नहीं है। यूनानी दर्शन में मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा गया है। दुनिया का प्राचीनकाल शालीन था। मध्यकाल में बर्बरता आई। भारतीय इतिहास के उत्तर वैदिक काल तक सामूहिक प्रीति थी। सामाजिक नियमबंधन थे। फिर अराजकता जैसी स्थिति की शुरुआत हुई। तब भद्रजनों ने सांस्कृतिक व्यवस्था गढ़ी। समाज और राज का सुसंगत विकास हुआ।

भारत के प्राचीन इतिहास में भीड़ द्वारा हिंसा के उदाहरण नहीं हैं। गुप्त काल के शासन में मृत्युदंड नहीं था। फाह्यान ने लिखा है, चोरी-डकैती नहीं थी। कानून उदार थे। शासन लोकप्रिय था। मध्यकाल में पड़ोसी देशों में अपराधी को सार्वजनिक रूप से पत्थर मारे जाते थे। भारत विभाजन के ठीक पहले बंगाल में भीड़ की हिंसा से हजारों हिंदू मारे गए थे। यूरोप में डायन होने के आरोप में हजारों महिलाएं सार्वजनिक रूप से जलाई गई थीं। बाइबिल (ओल्ड टेस्टामेंट, निर्गमन 22.18) में लिखा है, ‘तू डायन को जीवित न रहने देना।’ कोमो नगर में 1485 में 40 और 1514 में 300 महिलाएं जलाई गईं। ये सारे कृत्य उन्मादी भीड़ ने किए थे। भारतीय समाज में परस्पर आदर की प्राचीन परंपरा रही है। अथर्ववेद में ‘विभिन्न पंथों और भाषाओं के आदर का उल्लेख है। समाज में एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान जरूरी है।

समाज व्यवस्था के विकास के कई सिद्धांत हैं। हाब्स का सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत प्रतिष्ठित माना जाता है। हाब्स के अनुसार सामान्य व्यवस्था भंग हुई। अराजकता फैली। व्यथित लोग एकत्रित हुए होंगे। उन्होंने परस्पर अनुबंध किया, ‘मैं अपने ऊपर नियम लगाने के अधिकार एक मनुष्य अथवा मनुष्यों की सभा का सौंपता हूं, यदि आप सब भी इसी तरह अपने अधिकार इसी मनुष्य/मनुष्यों की सभा को सौंप दो।’ हाब्स के अनुसार इस अनुबंध से समाज बना। समाज का हरेक सदस्य समाज से बहुत कुछ पाता है। शर्त यह है कि वह समाज के अनुशासन में रहता है।

भारतीय समाज स्वअनुशासित नहीं है। हम परंपरा को पिछड़ापन बताते हैं और संस्कृति विहीनता को प्रगतिशीलता। संप्रति गाय बहस का मुद्दा है। भारत के करोड़ों लोग गाय का आदर करते हैं। इसे मूर्खता कहा जा सकता है, लेकिन ललकारते हुए बीफ पार्टी देने की घटनाएं क्या उन्माद नहीं बढ़ातीं? बच्चे सबको प्रिय हैं। बच्चा चोर पकड़े जाने पर अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत क्यों नहीं है? भीड़ द्वारा हिंसा सभ्य समाज पर कलंक है। इससे बचने बचाने के लिए वाणी पर संयम भी जरूरी है। भीड़ का उन्माद राष्ट्र का मूल स्वभाव नहीं।

[ लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैैं ]

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