टकराव की राह पर अमेरिका और चीन, दुनियाभर के लिए गंभीर हो सकते हैं परिणाम

जैसे-जैसे चीन अड़ियल होकर आक्रामक बन रहा है वैसे-वैसे अमेरिका अपने क्षेत्रीय साथियों को साधकर कड़े प्रत्युत्तर की तैयारी में जुटा है। अमेरिका और चीन के रिश्तों में ताइवान एक अहम कड़ी साबित होने जा रहा है। इस प्रभाव दुनियाभर पर देखने को मिल सकता है।

TilakrajWed, 13 Oct 2021 08:36 AM (IST)
चीन इस क्षेत्र में कई जगहों पर शांति और स्थिरता वाली यथास्थिति को बदलने पर आमादा

हर्ष वी पंत। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते चौतरफा टकराव के बीच ताइवान तनातनी के एक प्रमुख बिंदु के रूप में उभर रहा है। इस मामले में अमेरिका लंबे समय से संतुलन साधने की जो कवायद करता आया है, उसे कायम रख पाना अब मुश्किल हो गया है। कुल मिलाकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र इस समय शक्ति संतुलन में संक्रमण का साक्षी बना हुआ है। ऐसा संक्रमण अतीत में कभी नहीं देखा गया। इसके प्रभाव भी व्यापक और दूरगामी दिख रहे हैं। जैसे-जैसे चीन अड़ियल होकर आक्रामक बन रहा है, वैसे-वैसे अमेरिका अपने क्षेत्रीय साथियों को साधकर कड़े प्रत्युत्तर की तैयारी में जुटा है। इस स्थिति में बढ़ते क्षेत्रीय दबाव को दूर करने के लिए कोई संस्थागत ढांचा भी उपलब्ध नहीं है, जो मध्यस्थता के माध्यम से टकराव समाप्त करा सके। इतना ही नहीं इस संक्रमण का दायरा और रफ्तार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि उसके असर से ताल मिलाने में क्षेत्रीय पक्षों को मुश्किलें पेश आ रही है। इस प्रक्रिया के परिणाम का प्रभाव भी मुख्य रूप से नकारात्मक ही है।

बीते कुछ हफ्तों में सभी पक्षों की ओर से सख्त संकेत देखने को मिले हैं। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने ‘ताइवान के पुन: एकीकरण की अनिवार्यता’ की एक तरह से धमकी दी है। ताइवान नेशनल डे के अवसर पर ताइवानी राष्ट्रपति साई इंग वेन ने चिनफिंग की इस धमकी का जवाब देते हुए दो टूक लहजे में कहा कि उनका देश चीनी दबाव के आगे कभी नहीं झुकेगा और हर हाल में अपने लोकतांत्रिक जीवन की रक्षा करेगा। बीजिंग के प्रति सख्त रवैये ने साई को घरेलू स्तर पर बहुत लोकप्रिय बना दिया है। उन्होंने अपने देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को खासा महत्व देकर उसे अपनी ढाल बनाया है। उन्होंने ताइवान की नियति को एशिया में शांति एवं लोकतंत्र के साथ बहुत प्रभावी ढंग से जोड़ दिया है।

वहीं, बीजिंग इन पहलुओं पर जोखिम लेकर लाभ उठाने की फिराक में है। इसी कड़ी में वह ताइवानी रक्षापंक्ति की क्षमताओं को परखने के साथ ही इस बात की भी परीक्षा लेता दिख रहा है कि इस मामले में अमेरिका किस सीमा तक जा सकता है। जे-16 फाइटर्स और परमाणु सक्षम एच-6 बांबर जैसे चीनी लड़ाकू विमान लगातार बड़ी संख्या में ताइवानी वायु क्षेत्र में दाखिल हो रहे हैं। जिस तरह चीन इस क्षेत्र में कई जगहों पर शांति और स्थिरता वाली यथास्थिति को बदलने पर आमादा है कुछ वैसा ही काम वह ताइवान को लेकर भी कर रहा है। वहीं बीजिंग में इस पर नए सिरे से चिंता बढ़ गई है कि ताइवानी सरकार स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा करने के करीब पहुंच रही है। इसी कड़ी में चीन जो सैन्य कलाबाजियां दिखा रहा है वह एक तरह से ताइवान और उसके समर्थकों को धमकाने की ही कोशिश है कि बीजिंग किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है।

अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में ताइवान को फिलहाल जितनी तवज्जो मिल रही है, उतनी बीते कुछ दशकों के दौरान कभी नहीं मिली। जहां ताइवान के पक्ष में सकारात्मक माहौल बना है, वहीं चीन की प्रतिष्ठा घटी है। इसके बावजूद ताइवान के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ी है, क्योंकि बीजिंग द्वारा आक्रामक सैन्य शक्ति के प्रदर्शन का सिलसिला आने वाले दिनों में और बढ़ने की आशंका है। ऐसे बिगड़ते हालात के बीच चीनी राष्ट्रपति चिनफिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने परस्पर संपर्क कर ‘ताइवान समझौते’ पर सहमति जताई। इसका अर्थ यही है कि वाशिंगटन चीन की ‘वन चाइना’ नीति को मानता रहेगा, जिसमें वह ताइवान के बजाय चीन को ही मान्यता देता है। साथ ही वाशिंगटन के ताइवान के साथ हुए समझौते के तहत अमेरिका ताइवान को उसकी आत्मरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध कराना भी जारी रखेगा। इतना ही नहीं अमेरिका ताइवान को उसके हाल पर भी नहीं छोड़ने वाला। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने ऐसी अमेरिकी मंशा हाल में फिर से दोहराई। सुलिवन ने बीते दिनों कहा कि ताइवान स्ट्रेट में शांति एवं स्थायित्व को चुनौती देने वाली किसी भी कार्रवाई का अमेरिका न केवल मुखर विरोध करेगा, बल्कि उसे माकूल जवाब भी देगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि अमेरिका और चीन के बीच संबंध उनकी बढ़ती रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता के आधार पर ही आकार ले रहे हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि बुनियादी कूटनीतिक जुड़ाव की कड़ियां भी मुश्किल से जुड़ पा रही हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन अपने चीनी समकक्ष के साथ प्रत्यक्ष द्विपक्षीय बैठक चाहते थे, लेकिन चीनी राष्ट्रपति ने इस पर कोई गर्मजोशी नहीं दिखाई और यही संकेत दिए कि ऐसे किसी भी आयोजन से पहले रिश्तों की प्रकृति में ‘सुधार’ आना आवश्यक है। वहीं वाशिंगटन ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी नीति को दोतरफा मोड़ दिया है। जहां बाइडन प्रशासन ने छह महीनों के भीतर ही क्वाड नेताओं की दो शिखर बैठकें आयोजित की हैं वहीं गत माह आकस जैसे नए त्रिपक्षीय मंच का एलान भी किया। अमेरिका के लिए यह सब इस बात का संकेत देना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर उसका रवैया खुला और समावेशी है। बीजिंग इसे चीन पर अंकुश लगाने वाली कवायदों के रूप में देखता है।

जो भी हो, अमेरिका और चीन के रिश्तों में ताइवान एक अहम कड़ी साबित होने जा रहा है। अफगानिस्तान से एकाएक पलायन के बाद यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के लिए साख और विश्वसनीयता का बड़ा सवाल बन गया है। उधर यह चीन की दशकों पुरानी राष्ट्रीय एकीकरण की महत्वाकांक्षा और शी चिनफिंग के राष्ट्रीय कायाकल्प की परियोजना का अहम पड़ाव है। इन दोनों शक्तियों के उलट ताइपे के लिए यह उसके लोकतांत्रिक मूल्यों और जीवनशैली की संरक्षा का सवाल है। ऐतिहासिक और समकालीन रणनीतिक रुझानों की ये धाराएं इस अनावृत्त हो रहे घटनाक्रम में बड़ी शक्तियों की क्रिया एवं प्रतिक्रिया की प्रकृति तय करेंगी। इसके निहितार्थ न केवल इस क्षेत्र के लिए बहुत गंभीर हो सकते हैं, बल्कि नए आकार लेते वैश्विक ढांचे पर भी उसका असर पड़ेगा।

(लेखक नई दिल्ली स्थित आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं)

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