न्यायपालिका पर भरोसे का सच: आखिर यह कैसे मान लिया जाए कि जब चीजें गलत होती हैं तो सुप्रीम कोर्ट लोगों के साथ खड़ा होता है?

दो महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुना और केंद्र सरकार बंगाल सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने को कहा। क्या आप यह कह सकते हैं कि जब चीजें गलत होती हैं तो सुप्रीम कोर्ट लोगों के साथ खड़ा होता है?

Bhupendra SinghWed, 21 Jul 2021 04:42 AM (IST)
देश के लोगों को भरोसा है कि उन्हें न्यायपालिका से राहत और न्याय मिलेगा।

[ राजीव सचान ]: बीते शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा कि देश के लोगों को भरोसा है कि उन्हें न्यायपालिका से राहत और न्याय मिलेगा। उनके अनुसार लोग यह भी जानते हैं कि जब चीजें गलत होती हैं तो सुप्रीम कोर्ट सबसे बड़े लोकतंत्र के संरक्षक के रूप में उनके साथ खड़ा होगा। उन्होंने ये बातें भारत-सिंगापुर मीडिएशन समिट को संबोधित करते हुए कहीं। उनके इस कथन ने अन्य अनेक बातों के अलावा दिल्ली के शाहीन बाग इलाके के उस कुख्यात धरने की भी याद दिला दी, जो 2019 में सौ दिनों से अधिक समय तक चला था और जिसके चलते लाखों लोगों को परेशानी उठानी पड़ी थी। लोग और खासकर इस धरने से सीधे तौर पर प्रभावित लोग यह नहीं भूल सकते कि जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तो क्या हुआ था? सुप्रीम कोर्ट ने धरना दे रहे लोगों से बातचीत करने के लिए मध्यस्थों की नियुक्त कर दी थी। इसका परिणाम यह हुआ कि धरने को एक तरह की वैधानिकता मिल गई और शायद इसी कारण धरना दे रहे लोग टस से मस नहीं हुए।

शाहीन बाग में धरना जारी रहा और सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नहीं किया

मध्यस्थों ने बीच सड़क पर धरना दे रहे लोगों को अन्यत्र धरना देने के लिए समझाया, लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहे। धरना जारी रहा और सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नहीं किया। बाद में जब कोरोना की दहशत बढ़ी और धरना स्थल पर चंद लोग ही रह गए, तब दिल्ली पुलिस ने शाहीन बाग को मुक्त कराया। कई महीने बाद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दिया कि कोई भी व्यक्ति या समूह सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा नहीं कर सकता। यह फैसला आने के पहले ही पंजाब में किसान संगठनों के लोग कृषि कानूनों के विरोध में रेल पटरियों पर बैठ गए थे। चूंकि इन किसान संगठनों को पंजाब सरकार का भी समर्थन हासिल था इसलिए किसी ने उन्हें हटाने की कोशिश नहीं की। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तो नहीं, हाई कोर्ट अवश्य पहुंचा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। किसान संगठनों के लोग रेल पटरियों पर बैठे ही रहे।

पंजाब: किसान संगठनों के चलते 5 महीनों तक सैकड़ों ट्रेनों का परिचालन ठप रहा, कोर्ट चुप रहा

चूंकि पंजाब में यात्री ट्रेनों के साथ मालगाड़ियों का भी परिचालन ठप हो गया था इसलिए कोयले की किल्लत के चलते बिजली संयंत्र बंद होने की नौबत आ गई और उद्योगों को कच्चा माल मिलना भी बंद हो गया। रेल पटरियां बाधित होने के कारण सैकडों ट्रेनों का परिचालन ठप रहा। यह सिलसिला पांच महीने से अधिक चला। न्यायपालिका का पता नही, आम लोग यह अनुमान सहज ही लगा सकते हैं कि पांच महीनों तक सैकड़ों ट्रेनों का परिचालन ठप रहने से कितने लाख लोग प्रभावित हुए होंगे? लोगों को न्यायपालिका से कोई राहत नहीं मिली। 169 दिन बाद किसान संगठनों ने पंजाब की रेल पटरियों को अपने कब्जे से मुक्त करने के बाद दिल्ली की ओर कूच किया और वे राजधानी के प्रवेश मार्गों पर आकर बैठ गए। सात महीने हो गए हैं, वे हटने का नाम नहीं ले रहे हैं। उनके सड़कों पर बैठे होने के कारण दिल्ली और आसपास के लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। उन्हें या तो रास्ता बदलकर जाना पड़ता है या भारी ट्रैफिक जाम से जूझना पड़ता है। इस पर गौर करें कि सात महीने हो गए हैं, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है-सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं। यह तब है जब रास्ता खुलवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं।

न्यायपालिका लोगों के दुख और तकलीफों पर मौन

कोई नहीं जानता कि सुप्रीम कोर्ट किसान संगठनों की धरनेबाजी से आजिज लोगों को राहत और न्याय देने की जरूरत क्यों नहीं समझ रहा है? आखिर क्यों और कैसे यह मान लिया जाए कि जब चीजें गलत होती हैं तो सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र के संरक्षक के रूप में लोगों के साथ खड़ा होता है? क्या इसलिए कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ऐसा कह रहे हैं? सवाल यह भी है कि आखिर शाहीन बाग मामले में देर से दिए गए उस निर्णय का क्या मूल्य-महत्व, जो यह कहता है कि धरना-प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक स्थलों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता? क्या सात महीने की लंबी अवधि अनिश्चितकाल के दायरे में नहीं आती? अगर नहीं आती तो यह अंधेर के अलावा और कुछ नहीं। देर और अंधेर के साथ-साथ आम लोगों की अनदेखी का यह इकलौता उदाहरण नहीं। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जब न्यायपालिका लोगों के दुख और तकलीफों पर या तो मौन रही या फिर उससे परिचित होने के बावजूद तत्परता नहीं दिखाई। कई बार तो वैसे मामलों में भी नहीं, जो स्वत: संज्ञान लिए जाने लायक थे। ऐसा ही एक मामला है बंगाल में चुनाव बाद की हिंसा का।

तृणमूल कांग्रेस प्रायोजित हिंसा में लोगों को चुन-चुनकर प्रताड़ित किया गया

तृणमूल कांग्रेस प्रायोजित हिंसा में उसे वोट न देने वालों को चुन-चुनकर प्रताड़ित किया गया। कुछ की हत्या की गई। कुछ के घर-दुकान में तोड़फोड़, लूटपाट और आगजनी की गई। तमाम लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया गया, जो अभी तक जारी है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों का आतंक इतना जबरदस्त था कि सैकड़ों लोग पलायन के लिए मजबूर हुए। देश के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। कायदे से सुप्रीम कोर्ट को इस भयावह हिंसा का स्वयं ही संज्ञान लेना चाहिए था, लेकिन पता नहीं क्यों उसने नहीं लिया। बाद में जब इस हिंसा की जांच कराने के लिए याचिका दायर की गई तो सुप्रीम कोर्ट की एक जज ने खुद को मामले से अलग कर लिया। दूसरी तारीख में एक और जज ने भी ऐसा ही किया। ऐसा करने का कोई कारण भी नहीं बताया गया। करीब दो महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुना और केंद्र सरकार, बंगाल सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने को कहा। क्या आप यह कह सकते हैं कि जब चीजें गलत होती हैं तो सुप्रीम कोर्ट लोगों के साथ खड़ा होता है?

( लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं )

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