जासूसी मामले की सच्चाई: पेगासस साफ्टवेयर के जरिये सरकार ने जासूसी की, इसका विपक्ष के पास नहीं है कोई सुबूत

संसद में शोर मचाने से बात बनने वाली नहीं है। आखिर कमल नाथ किस आधार पर यह कह रहे हैं कि मध्य प्रदेश में उनकी सरकार गिराने में पेगासस का इस्तेमाल हुआ या राहुल गांधी कैसे यह दावा कर रहे हैं कि सरकार उनके फोन टैप कर रही है।

Bhupendra SinghSun, 25 Jul 2021 04:03 AM (IST)
पेगासस साफ्टवेयर बनाने वाली इजरायली कंपनी ने जासूसी मामले को बेबुनियाद बताया है।

[ संजय गुप्त ]: मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल और पेरिस की संस्था फारबिडेन स्टोरीज द्वारा किए गए इस दावे ने देश-विदेश में राजनीतिक माहौल गर्मा दिया है कि इजरायली कंपनी एनएसओ के पेगासस साफ्टवेयर से दुनिया के कई देशों के साथ भारत में भी तीन सौ से अधिक लोगों के मोबाइल फोन को हैक करके जासूसी की गई। जिस तरह संसद के मानसून सत्र के ठीक पहले यह सनसनीखेज दावा किया गया, उससे संदेह नहीं कि यह सिर्फ मानसून सत्र की कार्यवाही बाधित करने के मकसद से किया गया। हालांकि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने यह साफ कर दिया है कि उसके दावे से इसकी पुष्टि नहीं होती कि फोन हैक कर जासूसी की ही गई। अगर यह सच है तो फिर पूरा मामला बिना बात का बतंगड़ बन जाता है। पेगासस साफ्टवेयर बनाने वाली इजरायली कंपनी ने भी इस दावे को बेबुनियाद बताया है।

मोदी सरकार ने जासूसी मामले को निराधार बताया, फिर भी विपक्ष संसद में कर रहा हंगामा

मोरक्को ने तो जासूसी का दावा करने वालों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने की बात कही है। इसके बाद भी भारत में विपक्ष जासूसी के मामले में मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा है। यह दावा संसद सत्र शुरू होने के कुछ ही घंटों पहले किया गया। इस पर सरकार ने भी अपना पक्ष रखा और पूरे मामले को निराधार बताया, फिर भी विपक्ष संसद में हंगामा कर रहा है। राज्यसभा में जब आइटी मंत्री इस मामले पर अपना बयान दे रहे थे तो तृणमूल कांग्रेस के सांसद ने उनके हाथ से कागज छीनकर फेंक दिए। इस अशोभनीय हरकत के कारण उन्हेंं संसद के शेष सत्र से निलंबित कर दिया गया, लेकिन विपक्ष शांत होने का नाम नहीं ले रहा है।

मंत्री लेखी ने कहा- जासूसी मामले का मतलब डाटा सुरक्षा विधेयक को कानून बनने से रोकना

विपक्ष के हमलावर रुख के बाद भी सरकार यही कह रही है कि उसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं और उसने किसी की जासूसी नहीं की। विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने इस मामले को एक अंतरराष्ट्रीय साजिश करार देते हुए कहा कि इसका मकसद प्रस्तावित डाटा सुरक्षा विधेयक को कानून बनने से रोकना है। सच जो भी हो, इसमें दो राय नहीं कि विदेशी मीडिया समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भारत का बढ़ता हुआ कद रास नहीं आ रहा है। उन्हेंं न तो मोदी सरकार पसंद है और न ही उसकी विदेश नीति। हैरानी नहीं कि मीनाक्षी लेखी की बात में सच्चाई हो। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कोविड महामारी की दूसरी लहर के दौरान विदेशी मीडिया के एक हिस्से की ओर से किस तरह भारत को नीचा दिखाने और उसे बदनाम करने की कोशिश के तहत बेहद नकारात्मक रिपोर्टिंग की गई।

जासूसी नई बात नहीं, मानव इतिहास के प्रारंभ से ही जासूसी चलती आ रही

जहां तक जासूसी की बात है तो यह कोई नई बात नहीं है। शायद मानव इतिहास के प्रारंभ से ही जासूसी चलती आ रही है। प्राचीन काल में चाहे राजा रहे हों या आज की सरकारें, उन्हेंं जनता की टोह लेने या पड़ोसी देश की सैन्य शक्ति की जानकारी हासिल करने के लिए जासूसी का सहारा लेना पड़ता है। जासूसी के बल पर न जाने कितने युद्ध जीते गए होंगे। शायद ही कोई ऐसा देश हो जिसकी जासूसी करने की कोई औपचारिक संस्था न हो। देश के अंदर भी आंतरिक सुरक्षा का आकलन करने के लिए जासूस सक्रिय रहते हैं। यह काम खुफिया संस्थाएं करती हैं। इसके अलावा सादे कपड़ों में पुलिस को भी यह जिम्मेदारी दी जाती है। जबसे टेलीफोन का अविष्कार हुआ तभी से फोन टैपिंग का भी सिलसिला शुरू हो गया था। संदिग्ध लोग, देश विरोधी तत्व, अपराधी और आतंकी तत्व फोन पर किससे क्या बात करते हैं, अगर सरकारें फोन टैपिंग करके इसका पता न लगाएं तो वे अपने नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख सकतीं। आज तकनीक इतनी उन्नत हो चुकी है कि बेहतर जासूसी करना आसान होता जा रहा है। इसका प्रमाण पेगासस जैसे साफ्टवेयर भी हैं ।

पेगासस फोन को हैक कर बात ही नहीं सुन सकता, बल्कि मैसेज, ईमेल आदि भी पढ़ सकता है

पेगासस जैसे साफ्टवेयर महज फोन को हैक कर लोगों की बात ही नहीं सुन सकते, बल्कि मैसेज, ईमेल आदि भी पढ़ सकते हैं। ऐसे साफ्टवेयर भी आ गए हैं जो आपके फोन से किसी दूसरे को संदेश भेज देंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा। वास्तव में मोबाइल फोन की क्रांति ने जहां लोगों को सहूलियत दी है, वहीं उनकी निजता के लिए खतरा भी पैदा कर दिया है। आज लोगों की निजी जानकारी का डाटा चोरी होना आम बात हो गई है। यह किसी से छिपा नहीं कि र्आिटफिशियल इंटेलीजेंस के जरिये कंपनियां लोगों को अपने उत्पाद या सेवाएं खरीदने या उनकी पसंद बदलने के लिए किस तरह प्रेरित कर रही हैं। ब्रिटेन की कैंब्रिज एनालिटिका पर यह आरोप लगे अधिक दिन नहीं हुए कि उसने फेसबुक से लोगों का डाटा हासिल कर कई देशों के चुनाव प्रभावित किए। आज मोबाइल फोन के डाटा पर जिन कंपनियों का नियंत्रण है, वे उसका आसानी से उपयोग कर रही हैं।

डाटा का बेजा इस्तेमाल लोगों की निजता में सेंध लगा रहा 

जहां हर नागरिक की निजता सुरक्षित रहनी चाहिए, वहीं सरकारों को अपराधी-आतंकी और समाज विरोधी तत्वों की टोह लेने के लिए उनकी जासूसी भी करनी होगी। तभी वे देश को सुरक्षित रख सकती हैं। जहां डाटा के इस्तेमाल से विश्व के अधिकतर नागरिकों के जीवन को बेहतर और सुरक्षित बनाया जा रहा है, वहीं इस पर भी बहस चल रही है कि इस डाटा का बेजा इस्तेमाल लोगों की निजता में सेंध लगा रहा है। यह बात सभी दलों को समझ लेनी चाहिए कि जहां डाटा से लोगों के जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है, वहीं जासूसी भी की जा सकती है। पेगासस के जरिये सरकार ने जासूसी की, इसका विपक्ष के पास फिलहाल कोई सुबूत नहीं है।

संसद में शोर मचाने से बात बनने वाली नहीं

लिहाजा संसद में शोर मचाने से बात बनने वाली नहीं है। आखिर कमल नाथ किस आधार पर यह कह रहे हैं कि मध्य प्रदेश में उनकी सरकार गिराने में पेगासस का इस्तेमाल हुआ या राहुल गांधी कैसे यह दावा कर रहे हैं कि सरकार उनके फोन टैप कर रही है। अगर आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस या अन्य किसी तकनीक के सहारे लोगों के डाटा का इस्तेमाल उनके जीवन को सुखद बनाने में हो तो भला किसे आपत्ति होगी। फोन टैपिंग से वे सफेदपोश लोग जरूर असहज होंगे जो कच्ची बात करने के आदी हैं। डिजिटल तकनीक के कारण डाटा के बेजा इस्तेमाल से लोगों की निजता भंग होती है। इससे लोगों का चिंतित होना लाजिमी है।

[ लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं ]

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