अहम मसलों पर सहमति बनाने का समय: भारत आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों से जूझ रहा तब संवाद व लचीलेपन का कोई विकल्प नहीं

भारतीय संविधान ने विविध कानूनों और सरकारी फैसलों के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार प्रदान किया है।

राष्ट्र के समक्ष अहम मुद्दों पर अड़ियल रुख से केवल जनता का ही अहित होगा। इसका केवल पाकिस्तान और चीन जैसे शत्रु देशों को ही फायदा होगा। यह समय भारत के राजनीतिक नेताओं और नागरिक समाज के नेतृत्वकर्ताओं द्वारा खाइयों को पाटने और सहमति बनाने का है।

Bhupendra SinghThu, 25 Feb 2021 01:09 AM (IST)

[ विवेक काटजू ]: दिशा रवि को जमानत मिल गई, लेकिन उनका मामला चर्चा से बाहर नहीं हुआ है। देश के साथ विदेश में भी उस पर खूब चर्चा हो रही है। इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का पेच भी फंसा है। इस पर बहुत शांत चित्त से विचार करना होगा ताकि संवैधानिक मूल्यों के साथ सही संतुलन बना रहे। तभी हम राष्ट्रीय हितों की पूर्ति कर पाएंगे। यदि राजनीतिक वर्ग और सिविल सोसायटी यानी नागरिक समाज इस पर राजनीति करेंगे तो देश के तात्कालिक एवं दीर्घकालिक, दोनों हितों पर आघात होगा। भारतीय संविधान ने विविध कानूनों और सरकारी फैसलों के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार प्रदान किया है। इसके जरिये प्रदर्शनकारी मुख्यधारा या इंटरनेट मीडिया के माध्यम से विधिसम्मत विचारों का प्रसार कर सकते हैं। यह किसी व्यक्ति या समूह पर निर्भर है कि वह अपने अभियान से जोड़ने के लिए किन व्यक्तियों या समूहों से संपर्क करते हैं। इसमें बस इतनी सी शर्त है कि जिस संगठन का समर्थन लिया जाए, उस पर किसी किस्म का प्रतिबंध न लगा हो और न ही वह हिंसा को बढ़ावा देता हो। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने वाले अमूमन यह ख्याल रखते हैं कि वे प्रतिबंधित या हिंसक समूहों का समर्थन न लें। इस मामले में उन्हें हरसंभव सतर्कता बरतनी चाहिए।

एनजीओ से मिलकर बना वैश्विक नागरिक समुदाय सक्रिय, एजेंडे के तहत सोच को प्रभावित करते हैं

दिशा रवि मामले से एक सवाल यह भी उभरा है कि यदि प्रदर्शनकारी विदेशी व्यक्तियों या समूहों का समर्थन लेना चाहें तो उस पर क्या दृष्टिकोण होना चाहिए? इस मसले को भी बहुत सावधानी से देखना होगा। समकालीन अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य ऐसा है, जिसमें सभी प्रकार के गैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ से मिलकर बना वैश्विक नागरिक समुदाय सक्रिय है। इनमें से तमाम संगठन स्वतंत्र रूप से संचालित होते हैं। उनका अपना एक खास एजेंडा भी होता है। इस एजेंडे के तहत वे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, पारिस्थितिकीय और मानवाधिकार जैसे विषयों पर अंतरराष्ट्रीय सोच को प्रभावित करना चाहते हैं। कई मामलों में ये स्वतंत्र होने का महज आभास ही कराते हैं, परंतु उनकी कमान परोक्ष रूप से किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी या किसी देश विशेष की खुफिया एजेंसियों के जरिये सरकारों के हाथ में होती है, जो उनके माध्यमों से अपने हितों की पूर्ति करती हैं। ऐसे एनजीओ की स्थापना और उन्हें प्रोत्साहन के पीछे अक्सर गूढ़ राज छिपे होते हैं।

एनजीओ के तमाम सदस्यों को वास्तविक उद्देश्यों की जानकारी नहीं होती 

इन एनजीओ के तमाम सदस्यों तक को उनके वास्तविक उद्देश्यों की जानकारी नहीं होती। वे उन एनजीओ के प्रवर्तकों से भी पूरी तरह परिचित नहीं होते। उद्योग जगत में प्रतिस्पर्धी के हितों को क्षति पहुंचाने के लिए भी अक्सर ऐसे कुटिल खेल खेले जाते हैं। भारत में भी औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ पर्यावरण संस्थाओं के विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। कुछ मामलों में प्रदर्शनकारियों की वास्तविक चिंताएं झलकीं तो तमाम अभियान ऐसे रहे, जिन्हें भारत से बाहर ऐसे तत्वों का समर्थन हासिल था, जिनकी मंशा देश में विकास गतिविधियों को पटरी से उतारने की थी।

एनजीओ की आड़ में खेल

जब कोई देश पर्दे के पीछे से किसी एनजीओ को आगे बढ़ाए तो उसकी आड़ में उसका मकसद प्रतिद्वंद्वी देश को क्षति पहुंचाना होता है। पाकिस्तान लंबे अर्से से यही करता रहा है। वह प्रत्यक्ष-परोक्ष, दोनों तरह से हमारे संवेदनशील मामलों में दखल देने की फिराक में रहता है। इसके लिए अक्सर वह ऐसे एनजीओ की आड़ लेता है, जिनके बारे में यह मालूम ही नहीं होता कि उनकी डोर पाकिस्तान के हाथ में है।

कोई भी देश खुद को अंतरराष्ट्रीय नागरिक समाज से हटकर नहीं रख सकता

भारत सहित दुनिया का कोई भी देश खुद को अंतरराष्ट्रीय नागरिक समाज से काटकर नहीं रख सकता। ऐसे में भारत सरकार अपने नागरिक समाज को यह हिदायत नहीं दे सकती कि उसका विदेशी एनजीओ से कोई संपर्क नहीं रहेगा। जहां इंटरनेट आधारित मीडिया माध्यमों के आने से ऐसे किसी संपर्क पर नजर रखना मुश्किल हो गया है, वहीं भारत एक लोकतांत्रिक देश भी है। लाखों भारतीय दुनिया के विभिन्न देशों में रहते हैं। ऐसे में सैद्धांतिक रूप से भारतीय नागरिक समाज की गतिविधियों में गतिरोध पैदा करना और उसे नियंत्रित करना उचित नहीं होगा। इसके साथ ही भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी किसी भी कवायद से भारत के मूलभूत राष्ट्रीय हितों को नुकसान न पहुंचे। सभी दलों और भारतीय नागरिक समाज द्वारा राष्ट्रीय आम सहमति बनानी होगी। देश में चौड़ी होती वैचारिक खाई और कड़वी होती राजनीति के दौर में यह आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य है।

सतर्क रहें, कहीं एनजीओ राष्ट्रहित के विरुद्ध अपने एजेंडा का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे

इस समय सभी दलों को संविधानप्रदत्त शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार का एक सुर में समर्थन करना चाहिए। राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय विकास प्रक्रिया की एक थाती के रूप में गतिशील और सक्रिय नागरिक समाज के विकास के लिए प्रतिबद्धता जतानी चाहिए। वैश्विक नागरिक समाज से कड़ी जोड़ने के नागरिक समाज के अधिकार पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। एक्टिविस्ट भी इसे लेकर सतर्क रहें कि कहीं एनजीओ अपने एजेंडे के लिए राष्ट्रहित के विरुद्ध उनका इस्तेमाल तो नहीं कर रहे? यह तब और महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब कोई विरोध-प्रदर्शन भारत के आंतरिक मामलों को प्रभावित करने वाला हो। किसानों का विरोध-प्रदर्शन ऐसा ही एक मसला है। भारत की कृषि नीतियां उसका अपना मसला है और यहां तक कि विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्था वाले दौर में भी यह तथ्य बदल नहीं जाता।

नए कानून बनाकर भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल विदेशी एनजीओ पर बैन लगाया जा सकता है

यह महत्वपूर्ण है कि सरकार नागरिक समाज को उन कुछ विदेशी एनजीओ की वास्तविकता से परिचित कराए, जो अतीत में भारत विरोधी गतिविधियां करते रहे हैं। यदि आवश्यक हो तो इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए नए कानून बनाए जा सकते हैं। आखिर भारतीय राजनीतिक बिरादरी और देश के नागरिक समाज का साझा लक्ष्य भारतीयों का कल्याण करना ही है, भले ही इसके लिए उनकी राहें अलग क्यों न हों।

राष्ट्र के समक्ष अहम मुद्दों पर अड़ियल रुख से केवल जनता का ही अहित होगा

मेरा मानना है कि विभिन्न रूप-स्वरूप वाली राजनीति के बावजूद भारतीय राजनीतिक वर्ग राष्ट्रभक्त है। यही बात नागरिक समाज पर भी लागू होती है। जब भारत सुरक्षा से लेकर आर्थिक जैसे कई मोर्चों पर चुनौतियों से जूझ रहा है तब संवाद और लचीलेपन का कोई विकल्प नहीं। राष्ट्र के समक्ष अहम मुद्दों पर अड़ियल रुख से केवल जनता का ही अहित होगा। इसका केवल पाकिस्तान और चीन जैसे शत्रु देशों को ही फायदा होगा। यह समय भारत के राजनीतिक नेताओं और नागरिक समाज के नेतृत्वकर्ताओं द्वारा खाइयों को पाटने और सहमति बनाने का है।

( लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं ) 

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