राजनीति में आत्मचिंतन का समय: राजनीति राष्ट्रनिर्माण की दीर्घकालीन तप साधना है, आरोप-प्रत्यारोप का खेल नहीं

भारत में छोटी-छोटी घटनाओं का राजनीतिकरण हिंसक आंदोलन का रूप लेता है।

विपक्ष को सरकार की आलोचना का अधिकार है। आलोचना तथ्यगत और लोकहित से प्रेरित होनी चाहिए। तथ्यहीन आलोचना माहौल खराब करती है। इससे अनावश्यक तनातनी होती है। देश हमेशा तनाव में रहता है। ऐसे लोग देश को विकास मोड में नहीं आने देना चाहते।

Bhupendra SinghMon, 01 Mar 2021 12:57 AM (IST)

[ हृदयनारायण दीक्षित ]: भारत के वैभव का अनुष्ठान राजनीति है। राष्ट्रजीवन से जुड़े आदर्शों के बिना लोकतांत्रिक राजनीति संभव नहीं। संविधान निर्माताओं ने पूरी राजव्यवस्था का चित्र बनाया है। संविधान में अनेक संस्थाएं हैं। उनका सम्मान सबका कर्तव्य है। संसदीय जनतंत्र में राजनीतिक विचारधाराएं दलों के माध्यम से व्यक्त होती हैं। चुनाव में किसी दल या समूह को बहुमत मिलता है। उसे पांच वर्ष के लिए काम करने का संवैधानिक अधिकार है। विपक्ष सरकार की आलोचना करता है, लेकिन कुछ समय से सरकारों के शासन करने के अधिकार को चुनौती दी जा रही है। विधायिका द्वारा पारित कानूनों को भी खारिज किया जा रहा है। यह स्थिति संवैधानिक जनतंत्र के लिए भयावह है। नीति आयोग की हालिया बैठक में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इसी निराशाजनक राजनीति पर दुख प्रकट करते हुए कहा कि प्रत्येक छोटी-बड़ी घटना का राजनीतिकरण हो रहा है। सरकारों के प्रत्येक काम को वोट के नजरिये से देखा जाता है। पटनायक ने कहा कि परिपक्व जनतंत्र में निर्वाचित सरकार को जनहित में काम करने का अवसर मिलना ही चाहिए।

भारत में छोटी-छोटी घटनाओं का राजनीतिकरण हिंसक आंदोलन का रूप लेता है

भारत का माहौल वास्तव में चिंताजनक है। यहां छोटी-छोटी घटनाओं का भी राजनीतिकरण होता है। ऐसा राजनीतिकरण हिंसक आंदोलन का रूप भी लेता है। कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होती है। भारत की विश्व प्रतिष्ठा, समृद्धि और आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा है। सबको साथ लेकर सबका विकास प्रधानमंत्री मोदी का एजेंडा है, लेकिन यहां प्रधानमंत्री की गरिमा का भी ध्यान रखा नहीं जाता। प्रधानमंत्री की गरिमा और अधिकार संपन्नता के औचित्य पर डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था, ‘प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद के भवन की नींव है। जब तक हम उसे ऐसी अधिकारपूर्ण स्थिति प्रदान न कर सकें तब तक मंत्रिमंडल की जवाबदेही तय नहीं होगी।’ कल्पनाओं का भी राजनीतिकरण आश्चर्यजनक है। कुछ समय पहले काल्पनिक सहिष्णुता का प्रेत प्रचारित किया जा रहा था। नकारात्मक राजनीति के पक्षधर सिद्ध कर रहे थे कि भारत में घोर अव्यवस्था है। संविधान विहीनता है।

असहिष्णुता के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाया गया

असहिष्णुता के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाया गया। राष्ट्रहित की क्षति हुई। विदेश नीति पर भी ऐसी राजनीति द्वारा नकारात्मक टिप्पणियां की जाती हैं। पूछा जाता है कि चीनी सेना की वापसी के प्रमाण क्या हैं? नकारात्मक अभियान के कारण राफेल पर भी गैरजिम्मेदार बयानबाजी हुई और बोफोर्स तोपों पर भी। पाकिस्तान पर हुई सर्जिकल स्ट्राइक पर भी भारत की प्रतिष्ठा गिराने वाले बयान दिए गए। कोरोना महामारी पर भारत सरकार के कार्यों की प्रशंसा विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी की है। दुनिया प्रशंसा कर रही है, लेकिन यहां कभी टीके पर शंका उठाई जाती है और कभी लॉकडाउन के समय को लेकर।

भारत में राजनीति और राजव्यवस्था का विकास प्राचीन काल से है, ब्रिटिश संसद का जन्म बाद में हुआ

भारत की राजनीतिक नियति यह नहीं है। यहां राजनीति और राजव्यवस्था का विकास प्राचीन काल में ही हो गया था। ब्रिटिश संसद का जन्म और विकास बाद में हुआ। ऋग्वेद, यजुर्वेद में समृद्ध राष्ट्र की अभिलाषाएं हैं। अथर्ववेद में कहा गया है कि राज्य संस्था का क्रमिक विकास हुआ है। प्राचीन राजव्यवस्था में राजा सभा समिति के प्रति जवाबदेह था। ऋषियों के तप बल से राष्ट्र का जन्म हुआ। राष्ट्र और राजनीति को जन्म देने वाले ये ऋषि वस्तुत: उस समय के राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। यहां राजधर्म या नीतिशास्त्र का विकास कम से कम छह हजार वर्ष पहले ही शुरू हो गया था। कौटिल्य का अर्थशास्त्र ईसा से 340 वर्ष पूर्व का माना जाता है। कौटिल्य ने अपने पूर्ववर्ती राजनीतिक चिंतकों वृहस्पति, शुक्राचार्य, भारद्वाज, पराशर आदि के उल्लेख किए हैं। शुक्रनीति में उल्लेख है, ‘नियुक्ति-पदोन्नति योग्यता और कार्य के आधार पर ही होनी चाहिए। जाति या कुल के आधार पर नहीं। जातियां श्रेष्ठता की मापदंड नहीं हैं।’ प्राचीन भारत में राजनीतिशास्त्र के कई नाम थे। इसे दंडनीति, अर्थशास्त्र और राजधर्म आदि नामों से जाना जाता था, लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रिय नाम था नीतिशास्त्र। नीति वस्तुत: राज्य की नीति है। राजा में लोक संग्रह और नेतृत्व का गुण जरूरी बताया गया है। नेता ही जनता को गतिशील करता है। गतिशील समाज प्रगतिशील होता है। शुक्र नीति के अनुसार राजा के सुयोग्य नेता न होने के कारण प्रजा विपत्ति की नाव में डूब जाती है। महाभारत शांतिपर्व में समाजसेवा व्यक्ति निर्माण, राष्ट्र निष्ठा आदि आधारभूत सांस्कृतिक तत्वों को राजनीति से जोड़ा गया है।

समाज व्यवस्था इकहरी नहीं होती, समाज की एक संस्कृति होती है, एक दर्शन होता है

समाज व्यवस्था इकहरी नहीं होती। समाज की एक संस्कृति होती है। एक दर्शन होता है। एक अर्थनीति होती है और सभी प्राप्तियों के लिए एक व्यावहारिक राजनीति भी होती है। राजनीति को संस्कृति और नैतिकता के बंधन और मर्यादा में रहना चाहिए। मर्यादा का अनुशासन संविधान है। संविधान में मूल कर्तव्य भी हैं, लेकिन ध्येय शून्य राजनीति समाज निर्माण के आदर्श पर आक्रामक हैं। शाहीन बाग, नागरिकता संशोधन कानून विरोध, किसान आंदोलन जानबूझकर तिल का ताड़ बनाए गए हैं। मूलभूत प्रश्न है कि विधिनिर्वाचित सरकारें जनहित में अपनी कार्यसूची क्यों नहीं चला सकतीं? अल्पमत बहुमत वाली सरकार पर अपना निर्णय कैसे थोप सकता है? यह आदर्श राजनीति नहीं है। प्रधानमंत्री भी कई अवसरों पर ऐसी ही बातें कर चुके हैं।

संकीर्ण राजनीति माहौल खराब करती है 

संकीर्ण राजनीति माहौल खराब करती है। संप्रति भारत में समूची राजनीति को हेय माना जाता है। इस कारण अच्छे राजनीतिक कार्यकर्ता भी उचित सम्मान नहीं पाते। आम धारणा में सब धान बाईस पसेरी हैं। गांधी, लोहिया, आंबेडकर, दीनदयाल उपाध्याय ने सार्वजनिक जीवन की मर्यादाएं खींची थीं। लोहिया ने दीर्घकालीन राजनीति को धर्म बताया था। राजनीति राष्ट्रनिर्माण की दीर्घकालीन तप साधना है। आरोप-प्रत्यारोप का खेल नहीं। जनतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष शत्रु नहीं होते, लेकिन अभी यही शत्रुता है। ऐसी राजनीति से समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रीय विमर्श के मुद्दे पाश्र्व में चले जाते हैं। आर्थिक समृद्धि को हमेशा राष्ट्रीय विमर्श में रहना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता महत्वपूर्ण विषय हैं।

विपक्ष को सरकार की आलोचना का अधिकार है, आलोचना तथ्यगत और लोकहित से प्रेरित होनी चाहिए

विपक्ष को सरकार की आलोचना का अधिकार है। आलोचना तथ्यगत और लोकहित से प्रेरित होनी चाहिए। तथ्यहीन आलोचना माहौल खराब करती है। इससे अनावश्यक तनातनी होती है। देश हमेशा तनाव में रहता है। ऐसे लोग देश को विकास मोड में नहीं आने देना चाहते। ये गंभीर प्रश्न हैं। यह राजनीति के लिए आत्मचिंतन का अवसर है।

( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं )

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