विचारधारा पर परिवार को प्राथमिकता के कारण शुरू हुआ राजनीति में नैतिक पतन का दौर

जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री के पद पर बैठना वह निर्णायक मोड़ है जहां से भारतीय राजनीति में तमाम बुराइयों के पनपने की शुरुआत होती है। इंदिरा गांधी ने एक-एक कर ऐसे काम किए जिनकी वजह से लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षय शुरू हुआ।

Sanjay PokhriyalMon, 14 Jun 2021 09:52 AM (IST)
इंदिरा के शासनकाल में विचारधारा पर वंशवाद के प्रभावी होने के कारण राजनीतिक मूल्यों में गिरावट का दौर। फाइल

 ब्रजबिहारी। जितिन प्रसाद और मुकुल रॉय के पाला बदलने के बाद से राजनीति में विचारधारा की खूब चर्चा हो रही है। शशि थरूर ने जितिन प्रसाद के बहाने सवाल उठाया कि वे किसके लिए खड़े हैं और उनकी राजनीति को चलाने वाले मूल्य क्या हैं या वे केवल सत्ता पाने और खुद को आगे बढ़ाने के लिए राजनीति में हैं। इसी तरह, मुकुल रॉय के बारे में कहा गया कि अब वे भाजपा की वाशिंग मशीन में धुलकर साफ-सुथरे हो गए हैं। विचारधारा के बजाय परिवार के महत्व के कारण वे तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे, लेकिन अब विचारधारा पर चलने वाली पार्टी को छोड़कर फिर वंशवादी पार्टी का दामन थाम लिया।

ये दोनों नेता अपनी-अपनी पार्टियों में घुटन महसूस कर रहे थे, इसलिए विपरीत विचारधारा वाली पार्टियों में चले गए। ये घुटन इसलिए नहीं थी कि उन्हें अपने-अपने दल की विचारधारा रास नहीं आ रही थी, बल्कि वे अपने अंधकारमय भविष्य को लेकर परेशान थे। अगर उन्हें कायदे से महत्व मिल रहा होता तो वे जहां थे वहीं जमे रहते। जितिन प्रसाद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया जाता और मुकुल रॉय को बंगाल में नेता विपक्ष का पद मिल जाता तो वे अपनी-अपनी पार्टियों और उनके कर्ता-धर्ता के गुण गा रहे होते। लेकिन उन दोनों नेताओं ने जो किया, इसका सारा दोष उन पर मढ़ देना न्यायोचित नहीं होगा।

ये दोनों और इन जैसे तमाम नेता तो राजनीति में प्रचलित रीति-नीति पर ही चल रहे हैं। आज सभी राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं। लंबे समय से संघर्ष कर रहे जमीनी कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करते हुए दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को टिकट दिए जा रहे हैं। राजनीतिक संघर्ष की पूंजी के बजाय चुनाव जीतने की संभावना और उसके साथ उम्मीदवार से मिलने वाले धन की अहमियत बढ़ती जा रही है। यहां तक कि राजनीतिक दल अपराधियों को सांसद और विधायक बनाने से गुरेज नहीं कर रहे हैं।

इस राजनीतिक पतन की शुरुआत भी कांग्रेस से ही होती है। जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री के पद पर बैठना वह निर्णायक मोड़ है, जहां से भारतीय राजनीति में तमाम बुराइयों के पनपने की शुरुआत होती है। कांग्रेस के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से मुकाबला करने के लिए इंदिरा गांधी ने एक-एक कर ऐसे काम किए, जिनकी वजह से लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षय शुरू हुआ। उनकी कांग्रेस पार्टी के अंदर भी और राज्यसत्ता में भी। उनके बेटे संजय गांधी ने कांग्रेस में एक नई संस्कृति को ही जन्म दिया, जिसे ‘संजय कल्चर’ कहा जाने लगा। सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए इंदिरा गांधी ने वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा की और उसके बाद तो पार्टी इस संस्कृति की गिरफ्त में आ गई। अपराधियों और गुंडों को पार्टी में प्रमुखता दी जाने लगी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, उनकी पार्टी के चुनिंदा लोगों और नौकरशाही के पास सारी शक्तियों का केंद्रीकरण हो गया।

यही वह दौर था जब कांग्रेस में चाटुकारिता सबसे बड़ा गुण माना जाने लगा। पार्टी के सिद्धांतों और विचारधारा के बजाय सुप्रीम नेता के आगे घुटने टेकना राजनीतिक शिष्टाचार में शामिल हो गया। आज भी कांग्रेस में वही संस्कृति फल-फूल रही है। पार्टी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से ज्यादा बुद्धिमान और दूरदर्शी कोई नेता नहीं है। कांग्रेस की इस राजनीतिक संस्कृति से कोई दल अछूता नहीं है, क्योंकि जैसे-जैसे कांग्रेस कमजोर होती गई, अपराधियों और गैर कानूनी काम करने वालों ने खुद को बचाने के लिए दूसरी पार्टियों में शरण लेना शुरू किया। अब थोड़ा कम या ज्यादा, उनकी व्याप्ति हर दल में है।

वैसे भी इस पूरी बहस में बुनियादी सवाल यह है कि सिर्फ राजनीति में ही विचारधारा के लोप की बात क्यों की जा रही है? देश के जनमानस का समुच्चय ही उसके राष्ट्रीय मानस का निर्माण करता है। धन और नाम कमाने के लिए कोई भी रास्ता अपनाया जा रहा है। दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे आम आदमी की बात छोड़िए। उनमें नैतिक पतन हो तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए, लेकिन तब क्या कहेंगे जब पुलिस की सख्त ट्रेनिंग और अनुशासन में रहने वाले पुलिसकर्मी भी तत्काल लाभ के लिए अनैतिकता की हर गहराई नापने को तैयार हैं। उत्तराखंड में रविवार को दो पुलिस कास्टेबलों को आठ हजार किग्रा से ज्यादा मात्र में चरस के साथ गिरफ्तारी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। जाहिर है, वे अपनी मौजूदा आíथक हैसियत से असंतुष्ट होंगे और जल्द से जल्द अमीरों की श्रेणी में शामिल होना चाहते होंगे।

इसी तरह का एक हालिया किस्सा पारस सिंह का भी है। अरुणाचल प्रदेश के राजनेता एवं पूर्व सांसद नाइनांग एरिंग को लेकर यूट्यूब पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण पारस को गिरफ्तार किया गया। बाद में जमानत मिलने के बाद उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ, लेकिन सबसे अहम बात यह कि उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि यह सब उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल के जरिए ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने के लिए किया था। जाहिर है, ज्यादा से ज्यादा पैसा और नाम कमाने के लिए हम कुछ भी करने को तैयार हैं, तो सिर्फ राजनीति में पतन पर आंसू क्यों बहाए जाएं।

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