आंदोलन में गुम हुआ कृषि सुधारों का संदेश, किसानों को बरगलाकर किया गया कानूनों पर बखेड़ा

मोदी सरकार के जिन नवोन्मेषी उपायों से खेती के हालात बदले उनका संदेश कृषि कानून विरोधी आंदोलन में दब गया। चूंकि इनसे छोटे किसानों को फायदा और बिचौलियों के हितों पर आघात हो रहा था तो उन्होंने किसानों को बरगलाकर इन कानूनों को लेकर बखेड़ा शुरू कर दिया।

Shashank PandeyMon, 13 Sep 2021 08:08 AM (IST)
ये आंदोलन राजनीतिक रूप लेते हुए मोदी-योगी को हटाने पर केंद्रित हो गया।(फोटो: प्रतीकात्मक)

रमेश कुमार दुबे। जाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में इन दिनों कृषि सुधारों के विरुद्ध कुछ किसान संगठनों के विरोध-प्रदर्शन खबरों में बने हुए हैं। इसी क्रम में विगत एक सप्ताह के दौरान ही मुजफ्फरनगर में किसान महापंचायत हुई और हरियाणा के करनाल में किसान संगठनों और राज्य सरकार के बीच संघर्ष और उसके उपरांत उस पर विराम भी लग गया। हालांकि किसान संगठनों की जिस मुहिम से किसानों की बदहाली दूर करने के उपाय सुझाने, फसल विविधीकरण के लिए आवाज उठाने की अपेक्षा थी वह आंदोलन अब गेहूं-धान की गारंटीड सरकारी खरीद और धार्मिक नारों में उलझकर रह गया। अब तो यह अभियान राजनीतिक रूप लेते हुए मोदी-योगी को हटाने पर केंद्रित हो गया है।

ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या किसानों की बदहाली केंद्र में नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद शुरू हुई। जबकि सच्चाई यही है कि पिछले कुछ समय से जारी किसान संगठनों के कर्कश कोलाहल में कृषि क्षेत्र की कायापलट करने के लिए मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे उन नवोन्मेषी उपायों के सकारात्मक संदेश कहीं गुम से हो गए हैं। वास्तविकता यही है कि मोदी सरकार ने खेती-किसानी की बदहाली दूर करने के लिए कई नवोन्मेषी योजनाएं लागू की हैं। उसने किसानों के खाते में सालाना 6,000 रुपये भेजने की पहल की है। इसी का परिणाम है कि किसानों की आत्महत्याओं में उल्लेखनीय कमी आई है।

देश के करीब 86 फीसद किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं। ये न तो गेहूं-धान-गन्ना-कपास की एकफसली खेती करते हैं और न ही लक्जरी गाड़ियों में चलते हैं। इन्हीं बहुसंख्यक किसानों को खेती-किसानी की मुख्यधारा से जोड़ने और बाजार अर्थव्यवस्था का लाभ दिलाने के लिए मोदी सरकार तीन नए कृषि कानून लाई है। चूंकि इनसे छोटे किसानों को फायदा और बिचौलियों के हितों पर आघात हो रहा था तो उन्होंने किसानों को बरगलाकर इन कानूनों को लेकर बखेड़ा शुरू कर दिया।

याद रहे कि पुरानी नीतियां तब बनाई गई थीं जब देश खाद्यान्न के मोर्चे पर आत्मनिर्भर नहीं था। उनसे सफलता अवश्य मिली, परंतु उनके कुछ दुष्परिणाम भी सामने आए। जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और देश के कुछेक हिस्सों में स्थानीय पारिस्थितिकीय दशाओं की उपेक्षा करके उन फसलों की खेती को बढ़ावा मिला जिनकी सरकारी खरीद सुनिश्चित थी। इससे फसल चक्र बिगड़ा और मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी घटती गई। खामियाजा किसानों को ही भुगतना पड़ा, जहां खेती नुकसान का सौदा बनती गई। दुर्भाग्यवश राज्य सरकारों ने खेती-किसानी की बदहाली दूर करने के बजाय मुफ्त बिजली-पानी का पासा फेंका जिससे समस्या और गंभीर हुई। इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जिस देश के गोदाम गेहूं-चावल से भरे हैं वही देश खाद्य तेल और दालों का दुनिया में सबसे बड़ा आयातक है।

खेती-किसानी की इन्हीं विसंगतियों को दूर करने के लिए मोदी सरकार तीन नए कृषि कानून लाई। इनका दूरगामी उद्देश्य गेहूं, धान, गन्ना और कपास की एकफसली खेती के बजाय पारिस्थितिकीय दशा के अनुरूप विविध फसलों की खेती को बढ़ावा देना है। दलहनी-तिलहनी फसलों के समर्थन मूल्य में भरपूर बढ़ोतरी के पीछे यही दूरगामी सोच है। दलहनी फसलों की खेती के मामले में मोदी सरकार की नीति कामयाब भी रही। परिणामस्वरूप दशकों बाद भारत दालों के मामले में करीब-करीब आत्मनिर्भर बन चुका है। इससे हर साल 15,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है। मोदी सरकार दलहनी फसलों में मिली इस कामयाबी को तिलहनी फसलों के मामले में दोहराने में जुटी है। इसके लिए 11,040 करोड़ रुपये वाली राष्ट्रीय खाद्य तेल-पाम आयल मिशन को मंजूरी दी गई है।

राष्ट्रीय खाद्य तेल-पाम आयल मिशन से जहां खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता घटेगी तो दूसरी ओर किसानों की आमदनी बढ़ेगी। सबसे बड़ी बात यह है कि देश का संतुलित कृषि विकास होगा। तिलहनी फसलों को प्रमुखता देने का ही नतीजा है कि इस साल सरसों 4650 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य से अधिक कीमत पर बिकी। कुछ मंडियों में तो सरसों का रेट 9200 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया। आगे चलकर यही रणनीति बागवानी फसलों, औषधीय पौधों आदि के मामलों में अपनाई जाएगी ताकि किसानों की आमदनी बढ़े। इसके लिए देश भर में प्रसंस्करण इकाइयां लगाने की योजना है ताकि पौष्टिक आहार, डिब्बाबंद जूस का कारोबार ग्रामीण इलाकों में फैले। इसी प्रकार वर्ष 2016 से शुरू हुई ई-नाम से अब तक 21 राज्यों की 1000 कृषि उपज मंडियां जुड़ चुकी हैं। इसमें और 1000 कृषि उपज मंडियों को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

फल-फूल और सब्जियों की खेती मुख्य रूप से लघु एवं सीमांत किसान करते हैं, मगर शीघ्र नष्ट होने के कारण वे अपनी उपज बाजार में नहीं पहुंचा पाते। इससे बिचौलियों की चांदी हो जाती है। इस समस्या को दूर करने के लिए सरकार उत्पादक क्षेत्रों को महानगरों से जोड़ने के लिए किसान एक्सप्रेस चला रही है ताकि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच संतुलन बना रहे। बीते दिनों ही आगरा के किसानों ने किसान एक्सप्रेस से आलू असम भेजा है। इसी तरह सब्जियों दूध, आम, लीची आदि को किसान एक्सप्रेस से भेजा जा रहा है। कृषि को आधुनिक बनाने के लिए डिजिटल प्रणाली तैयार की जा रही है। इससे किसानों का डाटा बेस बनेगा। कृषि क्षेत्र में निजी निवेश व फसलों की पैदावार बढ़ाने, वैल्यू चेन को मजबूत बनाने और घरेलू व वैश्विक बाजार में उपज की बिक्री में मदद मिलेगी। इस सबके बावजूद किसान संगठन अपनी मुहिम के माध्यम से इन सुधारों की राह में अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। एक विडंबना यह भी है कि अतीत में ऐसे ही सुधारों की दुहाई देने वाले भी अब उनका विरोध करने में जुटे हैं।

(लेखक केंद्रीय सचिवालय सेवा के अधिकारी हैं)

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