मौजूदा नौकरियों के लिए काल बन सकती है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोजगार के नए आयाम भी खुलेंगे

[कैलाश बिश्नोई]। पूरी दुनिया में टेक्नोलॉजी की दृष्टि से दो बड़े स्तरों पर काम हो रहा है- कृत्रिम बुद्धिमता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट ऑफ थिंग्स। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) विगत एक दशक में चर्चा के केंद्र में रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में एआइ का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। मसलन शिक्षा के क्षेत्र में एआइ का प्रयोग ग्रेडिंग, रिकॉर्ड कीपिंग व अंक देने में, व्यापार में ग्राहकों को तत्काल सेवा देने के लिए, विनिर्माण क्षेत्र में अधिक उन्नत रोबोट का उपयोग व्यापक रूप से हो रहा है। संभावना यह भी है कि भविष्य में इसके द्वारा उन सभी कार्यों को किया जा सकेगा जो एक इंसान करता है।

एआइ रोजगार के सामने कड़ी चुनौती पेश करेगी

आने वाला वक्त एआइ का होगा। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक चीन अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 26 प्रतिशत और ब्रिटेन 10 प्रतिशत निवेश कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधित गतिविधियों और व्यापार पर करेगा। वहीं 2030 तक विश्व अर्थव्यवस्था में एआइ 15.7 खरब डॉलर का योगदान करेगा। इस परिप्रेक्ष्य में भारत भी एआइ के क्षेत्र में अहम भूमिका निभा सकता है। संभावना यह व्यक्त की जा रही है कि आने वाले कुछ वर्षों में एआइ रोजगार के सामने कड़ी चुनौती पेश करेगी। इस वजह से दुनिया भर में वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों तथा शिक्षकों को बताया जा रहा है कि उन्नत तकनीक जल्द ही उनके दरवाजे पर दस्तक देने वाली है और मौलिक रूप से उनके काम की प्रकृति को बदल देगी तथा नई अर्थव्यवस्था तकनीकी रूप से संपन्न लोगों की मांग करेगी। सवाल यह है कि क्या हमारा देश इस मामले में जरूरी निवेश कर पा रहा है?

भारत के 90 फीसद कर्मचारी अनौपचारिक क्षेत्र में 

हाल के तमाम सर्वे बताते हैं कि अर्थव्यवस्था की बदलती जरूरतों के अनुरूप कौशल निर्माण कर पाने में भारत अभी बहुत पीछे है। देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम एक हजार विद्यार्थियों में से मात्र चार ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को अपने उच्च अध्ययन का विषय बनाते हैं जो गहरी चिंता की बात है। वर्तमान में भारत के 90 फीसद कर्मचारी अनौपचारिक क्षेत्र में हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जन्मी आर्थिक ऊथल-पुथल का आसानी से शिकार बन सकते हैं।

वाहनों के क्षेत्र में पहले ही रोबोट प्रवेश कर चुके हैं

ऑटोमेशन के प्रसार के साथ ही संविदा नियुक्तियों की संख्या बढ़ेगी और वेतन में बहुत कमी आएगी। निर्माण उद्योग से जुड़े अनेक श्रमिक, जो अभी संविदा पर काम कर रहे हैं, थ्रीडी प्रिंटिंग तकनीक के आने के बाद तो बेकार ही हो जाएंगे। इसी प्रकार पूर्वी एशिया के देशों में रोबोट के जरिये होने वाली कृषि के सस्ते उत्पाद जब भारत में आने शुरू हो जाएंगे, तब भारत के किसानों की और भी ज्यादा दुर्दशा हो जाएगी। वाहनों के क्षेत्र में पहले ही रोबोट प्रवेश कर चुके हैं। वहीं, दूसरी तरफ भारत के बैंक भी खर्चे नियंत्रित रखने के लिए मशीनीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। वजह बताई जा रही है कि इससे उत्पादकता बढ़ेगी और गलतियां भी कम होंगी। 

उच्च कौशल वाली नौकरियों की संख्या में इजाफा 

पिछले कुछ वर्षों में बैंकों में भर्तियां कम हो गई हैं और जो हो भी रही हैं वे अग्रिम पंक्ति की होती हैं। एक आंकड़े के मुताबिक देश के आइटी और बीपीओ उद्यम में कम स्किल वाले कर्मियों की संख्या 2016 में घटकर 24 लाख रह गई थी जो 2022 में 17 लाख रह जाएगी। वैसे उसी स्टडी के अनुसार मध्यम कौशल वाली नौकरियों की संख्या 2022 तक बढ़कर 10 लाख हो जाएगी, जो 2016 में नौ लाख थी। उच्च कौशल वाली नौकरियों की संख्या भी 2022 तक बढ़कर पांच लाख हो जाएगी जो 2016 में 3.20 लाख थी।

तकनीकी क्षेत्रों में रोजगार के लाखों मौके तैयार

आने वाले वर्षों में एआइ, वर्चुअल रियलिटी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, बिग डाटा एनालिसिस तथा क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे तकनीकी क्षेत्रों में रोजगार के लाखों मौके भी तैयार होंगे जो उच्च गुणवत्ता और बढ़िया वेतन वाले होंगे। लेकिन इसके लिए भारत को तीन चुनौतियों से पार पाना होगा। पहला, अर्थव्यवस्था को ज्ञान आधारित बनाना होगा जिसके लिए जरूरत के अनुरूप शिक्षा के आधारभूत ढांचे पर व्यापक निवेश करना होगा और भारत की शिक्षा व्यवस्था को डिग्रियों के जाल से निकाल कौशल आधारित करना होगा। साथ ही चौथी औद्योगिक क्रांति से निपटने के लिए हमें ऐसे टास्क फोर्स बनाने होंगे, जो बहुआयामी कौशल से युक्त हों।

‘जॉब परमिट फॉर रोबोट’ 

दूसरी चुनौती रोबोट के रोजगार को छीनने के खतरे से निपटने की होगी। रोबोट के रोजगार पर पड़ते प्रभाव को देखते हुए भारत में रोबोट के इस्तेमाल की इच्छुक कंपनियों पर इसके प्रयोग के लिए ‘जॉब परमिट फॉर रोबोट’ का शुल्क लगाया जाए। तीसरी चुनौती, तकनीकी बदलावों और नवाचारों से सामंजस्य स्थापित करने की होगी। पूरी दुनिया में चौथी औद्योगिक क्रांति को लेकर अटकलें और तैयारियां चल रही हैं। ऐसे में भारत के लिए भी करीब पांच करोड़ तकनीक सक्षम कर्मचारी तैयार करने की चुनौती है। लिहाजा डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते रुझान को अपनाकर ही भारत बेरोजगारी की समस्या से प्रभावी ढंग से निपट सकता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत में शैशवावस्था में है और देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें इसे लेकर प्रयोग किए जा सकते हैं। देश के विकास में इसकी संभावनाओं को देखते हुए उद्योग जगत ने सरकार को सुझाव दिया है कि वह उन क्षेत्रों की पहचान करे जहां एआइ का इस्तेमाल लाभकारी हो सकता है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में एआइ के प्रयोग से स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं तक पहुंच बनाने में उत्पन्न बाधाओं को हल करने में मदद मिल सकती है।

खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में जहां कनेक्टिविटी की समस्या तथा स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में प्रशिक्षित कर्मियों की कमी है। एआइ के प्रयोग से बीमारियों का पता लगाने, उनका निदान बताने, संभावित महामारी की प्रारंभिक पहचान और इमेजिंग डायग्नोस्टिक्स को सरल बनाया जा सकता है। चिकित्सा के क्षेत्र की तरह विनिर्माण, व्यापार, शिक्षा, बैंकिंग, खेल, साइबर सुरक्षा व अंतरिक्ष से जुड़ी खोजों में भी इस एआइ तकनीक का इस्तेमाल भविष्य में काफी लाभदायक साबित हो सकता है। एआइ के अलावा डाटा एनालिटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और क्लाउड कंप्यूटिंग कुछ इस प्रकार की नई टेक्नोलॉजी हैं, जिनमें रोजगार और धन के लाभ की अपार संभावनाएं हैं।

एक अध्ययन के अनुसार भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के 2023 तक एक खरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 20 अरब डॉलर है। भारत को डिजिटल अर्थव्यवस्था को विश्वस्तरीय बनाने तथा इंजीनियरों की प्रतिभा का देश में ही उपयोग करने के लिए ऐसी औद्योगिक नीति की जरूरत है, जो शोध-विकास के साथ जोखिम उठाने में विश्वास रखती हो।

[अध्येता, दिल्ली

विश्वविद्यालय]

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