परिवार और प्रकृति से जुड़कर मानसिक अवसाद के संकट से लड़ाई लड़ी जा सकती है

कोरोना आपदा ने मानसिक बीमारियों को और गंभीर बना दिया है। परंपरागत पारिवारिक मूल्यों को अपनाकर और आवश्यक उपचार करते हुए इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। सहानुभूति संवेदनशीलता सामूहिकता संपर्क संवाद और संबंध न सिर्फ जीवन को सहज-सरल बनाते हैं।

Sanjay PokhriyalWed, 16 Jun 2021 10:35 AM (IST)
मानसिक बीमार व्यक्ति को बहुत आसानी से पागल करार देकर गलत नजर से देखा जाता है।

प्रो. रसाल सिंह। विश्व की सर्वश्रेष्ठ महिला टेनिस खिलाड़ियों में से एक जापानी मूल की नाओमी ओसाका के एक निर्णय ने विश्व समुदाय का ध्यान मानसिक रोगों की व्यापकता की ओर खींचा है। उन्होंने फ्रेंच ओपन टेनिस प्रतियोगिता से हटने का निर्णय करके सबको चौंका दिया है। नाओमी ने यह बड़ा निर्णय किसी शारीरिक चोट के कारण नहीं, बल्कि अपने मानसिक स्वास्थ्य के ठीक न होने के कारण लिया है। उन्होंने इस निर्णय को सार्वजनिक करते हुए बताया कि वर्ष 2018 में अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीतने के बाद से ही वे मानसिक अवसाद से जूझ रही हैं। उल्लेखनीय है कि 23 वर्षीय नाओमी ओसाका अत्यंत सफल और संभावनाशील टेनिस खिलाड़ी हैं।

इससे पहले बॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा भी स्वयं के लंबे समय तक मानसिक अवसाद की शिकार रहने की बात कर चुकी हैं। इन तीनों ही महिलाओं द्वारा इन तथ्यों को स्वीकारना सनसनीखेज जरूर लगता है, लेकिन वास्तव में यह साहसिक और सराहनीय है। इस खुलासे ने मानसिक स्वास्थ्य को चर्चा और चिंतन के केंद्र में ला खड़ा किया है, जिसकी प्राय: उपेक्षा की जाती रही है। मानसिक बीमारियों के बारे में न तो कोई खुलकर बात करना चाहता है और न ठीक से इलाज कराना चाहता है। अधिकांश लोग मानसिक बीमारियों को छिपाते हैं, क्योंकि मानसिक बीमार व्यक्ति को बहुत आसानी से पागल करार देकर गलत नजर से देखा जाता है।

कोरोना काल में मानवीय जीवन और आर्थिक गतिविधियों एवं संसाधनों की अभूतपूर्व क्षति हुई है। इसके अलावा पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद, रिश्ते-नाते और दैनंदिन जीवन भी प्रभावित हुए हैं। जीवन-चक्र के अचानक थम जाने से पिछले डेढ़ साल में मानसिक व्याधियों में भी गुणात्मक वृद्धि हुई है। कोरोना से पहले भी मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों की संख्या में वृद्धि हो ही रही थी। कोरोना आपदा ने इस संकट को और व्यापक व भयावह बना दिया है। हमारे देश में मानसिक रोगियों के प्रति अत्यंत उपेक्षा और तिरस्कार का व्यवहार किया जाता है। अन्यान्य शारीरिक रोगों की तरह मानसिक रोगों के प्रति समाज की संवेदनशीलता और स्वीकार्यता बेहद कम है। न केवल समाज ने, बल्कि सरकारों ने भी अभी तक इस समस्या की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। वैसे तो भारत जैसे विकासशील देशों में स्वास्थ्य ढांचे जैसी सुविधाओं का अभाव होता ही है, लेकिन जो सीमित सुविधाएं और स्वास्थ्य ढांचा है, उसमें मानसिक स्वास्थ्य ढांचे का घनघोर अभाव है। ऐसे में मानसिक रोगियों का इलाज करना मुश्किल होता जा रहा है। कोरोना काल में प्रत्येक व्यक्ति मृत्युबोध से ग्रस्त, भयभीत और असुरक्षित है।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार भारत में लगभग 15 करोड़ लोगों को मानसिक इलाज, संबल और सहायता की आवश्यकता थी, लेकिन भारत में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं और चिकित्सकों का इतना व्यापक अभाव है कि लगभग एक लाख जनसंख्या के लिए मात्र एक मनोचिकित्सक ही उपलब्ध है। यह सचमुच चिंताजनक स्थिति है। कोरोना आपदा के दौरान यह समस्या कई गुना बढ़ गई है। लगभग सभी स्वास्थ्यकर्मी और पूरा स्वास्थ्य ढांचा कोरोना के इलाज में लगा हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चिंता व्यक्त की है कि कोरोना संकट ने 93 प्रतिशत गंभीर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को ठप कर दिया है, जबकि पहले की तुलना में मानसिक बीमारियों में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है। इस अभूतपूर्व संकट काल में खुद डॉक्टर और अन्यान्य चिकित्साकर्मी मानसिक व्याधियां ङोलने को अभिशप्त हैं। महामारी के इस क्रूर-क्रीड़ा काल में लोगों की मानसिक व्यथा-कथा सुनने और सुलझाने की गुंजाइश और फुर्सत बहुत कम है।

सर्वप्रथम तो मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है। यह जनजागरण व्यापक जागरूकता और संवेदनशीलता अभियानों के माध्यम से किया जा सकता है। इसमें सरकार, सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज के प्रमुख व्यक्तियों की निर्णायक भूमिका होगी। इसके अलावा मानसिक स्वास्थ्य ढांचे के विकास की भी महती आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब इसमें पर्याप्त निवेश किया जाए। इसके अलावा जीवन-शैली और सामाजिक मूल्यों में भी व्यापक बदलाव अपेक्षित है।

जीवन की सफलता के निर्धारक मापदंड बदले जाने चाहिए। अतिभौतिकता, अतियांत्रिकता और अतिबौद्धिकता ने मनुष्यता और प्रकृति को सर्वाधिक क्षतिग्रस्त किया है। जितना मशीन को मनुष्य का विकल्प बनाने की कोशिश की जाएगी, उतनी ही मनुष्य के मशीन बनने की संभावना बढ़ती जाएगी। इस क्रम को भी बदलना होगा। मानव-समाज का रोबोटीकरण मानसिक व्याधियों की उर्वर भूमि है। इसलिए सामाजिकता और आध्यात्मिकता को भौतिकता और तकनीक से ज्यादा तरजीह दी जानी चाहिए। सहानुभूति, संवेदनशीलता, सामूहिकता, संपर्क, संवाद और संबंध न सिर्फ जीवन को सहज-सरल बनाते हैं, बल्कि संभव भी बनाते हैं। यह इन भावों की पुनर्जागरण बेला है।

[अधिष्ठाता, छात्र कल्याण, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय]

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