संस्कृति का दुश्मन तालिबान: कभी वैदिक, पौराणिक, शैव और बौद्ध संस्कृतियों का संगम था अफगानिस्‍तान

भावी पीढ़ियों को शायद इस पर विश्वास नहीं होगा कि अफगानिस्तान में समृद्ध सनातन संस्कृति भी थी। कभी अखंड भारत के पवित्र भूगोल का अभिन्न अंग रहा अफगान भूभाग आज अपने अतीत से बहुत दूर चला आया है।

TilakrajFri, 24 Sep 2021 08:48 AM (IST)
सांस्कृतिक प्रतीकों के खिलाफ भी आक्रामक तालिबान

लावण्या शिवशंकर। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत रहीं निक्की हेली ने कुछ दिन पहले कहा था कि अफगानिस्तान से अमेरिकी पलायन के बाद वहां के बगराम एयरबेस पर चीन आसानी से काबिज हो जाएगा। भारतीय मूल की हेली की यह चिंता निराधार नहीं है। बगराम एयरबेस रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, सामरिक संदर्भों में अहमियत के कारण उसके गौरवशाली अतीत एवं सांस्कृतिक महत्व को अनदेखा किया जाता है। यही बगराम शहर कभी कनिष्क जैसे लब्धप्रतिष्ठ बौद्ध-शैव कुषाण सम्राट की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा। कुषाण वंश के तार उस देश से भी जुड़े हैं, जो आधुनिक भारत और पाकिस्तान के साथ मिलकर अफगानिस्तान की नियति का एक और कोण बनाता है। यह देश है चीन।

चीनी इतिहासकार कुषाणों को यूजी कबीले की एक शाखा मानते हैं, जिन्हें शियोंगनू नामक मंगोलियाई खानाबदोशों ने अपनी पैतृक भूमि से बेदखल कर दिया था। गुइशुआंग कहलाने वाली यह शाखा अफगानिस्तान आ गई। यहीं उनका यूनानी नामकरण हुआ-कुषाण। प्राचीन सिल्क रूट पर होने के कारण गांधार (आधुनिक उत्तर-पूर्वी पाकिस्तान) से कुषाणों के अहम व्यापारिक संबंध थे।

जहां तक आधुनिक इतिहास की बात है, वर्ष 1915 में पश्चिमी ताकतों को अफगानिस्तान में खोदाई का अवसर मिला। इतालवी, जर्मन, फ्रांसीसी, तुर्क और अंग्रेज सभी इस मुहिम में जुटे। बीती सदी के पांचवें और छठे दशकों के बीच फ्रांसीसी पुरातत्वविदों को बगराम में खोदाई के दौरान बेशकीमती खजाना मिला। उनमें आइवरीज यानी हाथी दांत और अनमोल हस्तशिल्प भी शामिल थे। पूरे संग्रह में भारतीय मूर्तिकला की परंपरा में बनी कलाकृतियां, भारतीय अलंकरण और वेशभूषा में उकेरी सम्मोहक शालभंजिकाएं भी थीं। भारत में तब कई शिल्प संघ थे, जिन्होंने स्वयं या फिर अपने स्थानीय शिष्यों की मदद से उन्हें गढ़ा होगा। प्रसिद्ध पांपेई लक्ष्मी नामक शालभंजिका बगराम और प्राचीन यूनान के व्यापारिक संबंधों को दर्शाती है।

बगराम आइवरीज जल्द ही अंतरराष्ट्रीय कला बाजार का हिस्सा बन गई। कालांतर में इन कलाकृतियों में तस्कर भी सक्रिय हो गए। उसमें पाकिस्तानी सबसे आगे थे। इस पर हुई आलोचनाओं को लेकर पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने कहा था कि वक्त आने पर पाकिस्तान उन्हें उपहारस्वरूप अफगानिस्तान को सौंपेगा, लेकिन वह वक्त कभी नहीं आ पाया।

वैसे तो अफगानिस्तान का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन उसकी मौजूदा सीमाएं 19वीं सदी के अंत में तय हुईं। अपने समृद्ध इतिहास में उसने तमाम ऐतिहासिक धरोहरों को समेटा हुआ है। हिंदूकुश तलहटी की उपजाऊ भूमि पर खेती और बहुमूल्य खनिजों का उत्खनन होता रहा है। चंद्रगुप्त मौर्य के श्वसुर और सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस के समय यहां यूनानी और भारतीय संस्कृतियों का अनूठा संगम था। यहीं फ्रांसीसी पुरातत्वविदों ने जलालाबाद के पास हड्डा नामक स्थान पर खोदाई की, जहां उन्हें हजारों की तादाद में गौतम बुद्ध की मूर्तियां, शिलालेख, पांडुलिपियां और अन्य ऐसे संकेत मिले जिनसे साफ हुआ कि यह एक महत्वपूर्ण बौद्ध मठ था।

अनुमान है कि बुद्ध की हड्डी पर बने स्तूप होने से इसका नाम हड्डा पड़ा। अत्यंत सुंदर बुद्ध मूर्तियों और उनके पृथक बनाए हुए विशालकाय सिर, इंडो-ग्रीक शैली का विलक्षण उदाहरण हैं। गुप्त काल के दौरान उत्तर भारत में विकसित शिल्पकला की कई शैलीगत विशेषताएं भी यहां मिलती हैं। इससे यहां बौद्ध और यूनानी साझा परंपरा के संकेत मिलते हैं।

कभी अखंड भारत के पवित्र भूगोल का अभिन्न अंग रहा अफगान भूभाग आज अपने अतीत से बहुत दूर चला आया है। यहां की नदियों, पहाड़ों, जीव और वनस्पति का वैदिक एवं पौराणिक साहित्य में प्रमुखता से उल्लेख है। सनातन धर्म के अलावा यहां बौद्ध धर्म की भी गहरी छाप रही। वस्तुत: अफगानिस्तान का अतीत सनातन था, परंतु उसका वर्तमान कट्टरपंथी इस्लाम है और भविष्य में भी उस पर उसकी ही छाप रहने के आसार हैं। भारत का दुर्भाग्य ही है कि हमारी प्रागैतिहासिक सभ्यता के भग्नावशेष, सनातन धर्म के अभिन्न अंग रहे शक्ति पीठ और शैव मंदिर और अमूल्य धरोहरों में से कुछ कट्टरपंथियों के हाथों ध्वस्त हो गए। तालिबान के हाथों संस्कृति पर इतना गहरा आघात हुआ है कि भावी पीढ़ियों को विश्वास ही नहीं होगा कि यहां कभी वैदिक, पौराणिक, शैव और बौद्ध संस्कृतियों की गहरी पैठ थी।

जब रूस ने अफगानिस्तान में कठपुतली सरकार बनाई, तब अफगान सांस्कृतिक संपदा रूस के हर्मिटिज म्यूजियम भेज दी गई। जो बचा वह भी आतंकियों के कारण नष्ट होता गया। मुजाहिदीन गुटों के आपसी हमलों में काबुल का राष्ट्रीय संग्रहालय आहत होता रहा। वर्ष 1993 में राकेट गिरने से संग्रहालय की छत नष्ट हो गई। मलबे के नीचे दबे अतुलनीय संग्रह का 70 प्रतिशत हिस्सा पिछली सदी के आखिरी दशक तक गायब हो गया। वर्ष 1994 में जब संयुक्त राष्ट्र की टीम संग्रहालय का सर्वे करने पहुंची, तो उसे जले कागज, टूटे बक्से और पत्थरों के टुकड़े मिले।

यूनानी और बैक्टियम सिक्के, बगराम आइवरीज और बौद्ध मूर्तियों में से कुछ नहीं बचा। जिन्हें उनकी रखवाली का जिम्मा सौंपा वही सब कुछ लूटकर ले गए। इतना ही नहीं विश्व की कई प्राचीन बौद्ध अथवा भारतीय पांडुलिपियां और शिलालेख भी वहां मिले, परंतु अधिकांश तालिबान के मूर्तिभंजन के शिकार हो गए। हजारों वर्षों से चली आ रही समृद्ध परंपरा के अब इस धरा पर नाम मात्र के निशान भी शेष नहीं रहे। चूंकि अफगानिस्तान में हमारी सभ्यता और संस्कृति की अमूल्य धरोहर रही हैं। ऐसे में भारत सरकार का दायित्व है कि वह वैश्विक समुदाय के साथ मिलकर उन्हें संरक्षित करने के लिए अभियान चलाए। आखिर घायल सनातन सभ्यता को दुलारना और उसे अपने स्नेह से सींचना ही तो भारत का धर्म है।

(लेखिका प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ एवं पुरातत्व संरक्षण कार्यकर्ता हैं)

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