अफगानिस्तान पर भारत को चलना होगा सही दांव: कूटनीति का यही तकाजा, अवसरों को भुनाया जाए

काबुल में तालिबान सरकार के वजूद में आने से भारत के सामरिक एवं आर्थिक हितों पर उसके प्रभाव को लेकर मोदी सरकार को गहन आकलन करना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान अफगान परिदृश्य से भारत को बाहर कर उसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की तिकड़म करेगा।

TilakrajWed, 08 Sep 2021 08:48 AM (IST)
तालिबान के बदले हुए रवैये की भी चर्चा हो रही है

विवेक काटजू। पाकिस्तान की मदद से तालिबान ने अफगान गणराज्य के विरुद्ध जंग जीत ली। पंजशीर में कड़ा प्रतिरोध झेलने के बाद भी अफगानिस्तान के करीब-करीब सभी हिस्सों पर उसका कब्जा हो गया है। जब तक गैर-पश्तून लोग विद्रोह नहीं करते तब तक तालिबान के इस वर्चस्व को कोई चुनौती मिलने से रही। फिलहाल गैर-पश्तूनों की ओर से ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं। वहीं, तालिबान अब स्थायित्व की तलाश में है। इसका पहला चरण तो ऐसी सरकार बनाना है, जिसे अफगान जनता और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से स्वीकार्यता मिल जाए। काबुल पर कब्जा किए हुए तीन हफ्ते गुजरने के बाद भी तालिबान नेताओं के आंतरिक मतभेद और कबीलाई प्रतिद्वंद्विता सरकार गठन की राह में बड़ी बाधा बने हुए थे।

तालिबान को आइएसआइ से ही ताकत मिलती रही

इस गतिरोध को दूर करने के लिए ही पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के मुखिया फैज हमीद को काबुल में डेरा डालना पड़ा। वर्ष 1994 में अपनी स्थापना से लेकर अब तक तालिबान को आइएसआइ से ही ताकत मिलती रही है। नवंबर 2001 में जब तालिबानी नेताओं को अफगानिस्तान से बेदखल होना पड़ा, तो पाकिस्तान ने न केवल उन्हें शरण दी, बल्कि उनका पूरा ख्याल भी रखा। अनुमान है कि एक पखवाड़े के भीतर तालिबान सरकार आकार ले लेगी, अन्यथा उसके धड़ों में खींचतान और तेज होती जाएगी। तालिबान और पाकिस्तान दोनों में से कोई भी ऐसी स्थिति नहीं चाहेगा।

यदि तालिबान ने ऐसा ही रुख दिखाना जारी रखा तो...!

तालिबान के बदले हुए रवैये की भी चर्चा हो रही है। जैसे कि उसने मौजूदा सत्र में सभी लड़कियों को पढ़ने की अनुमति दी है। पिछली सदी के अंतिम दशक के मुकाबले इस मोर्चे पर उसके सोच में परिवर्तन दिखता है। हालांकि, वे लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग स्कूल एवं कालेजों पर जोर दे रहे हैं। वैसे यह कोई नया चलन नहीं, क्योंकि कई इस्लामिक देशों में यही व्यवस्था है। स्वाभाविक है कि किसी एक फैसले से उनके शासन को लेकर कोई पुख्ता धारणा नहीं बनाई जा सकती, परंतु उसमें कुछ लचीलापन जरूर दिखता है। यदि तालिबान ने ऐसा ही रुख दिखाना जारी रखा तो केवल चीन और रूस ही नहीं, बल्कि और भी देश धीरे-धीरे उनकी सरकार को मान्यता प्रदान करने लगेंगे।

भारत को सुरक्षा मोर्चे पर तालिबान को देना होगा ये संदेश

काबुल में तालिबान सरकार के वजूद में आने से भारत के सामरिक एवं आर्थिक हितों पर उसके प्रभाव को लेकर मोदी सरकार को गहन आकलन करना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान अफगान परिदृश्य से भारत को बाहर कर उसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की तिकड़म करेगा। वैसे इसके आसार कम हैं कि तालिबान सरकार अफगान परिदृश्य से भारत को पूरी तरह बाहर करने जैसा कोई कदम उठाएगी। सुरक्षा मोर्चे पर भारत को तालिबान को यह संदेश देना होगा कि उसे कभी स्वीकार्य नहीं होगा कि तालिबानी भारत के खिलाफ हथियार उठाएं या फिर अफगान धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी तत्वों को खाद-पानी देने के लिए किया जाए। जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत का मिजाज बिगाड़ने वाले तालिबानी प्रलाप के बावजूद ऐसी गुंजाइश कम ही दिखती है कि तालिबान भारत के खिलाफ कोई शत्रुता का भाव रखे। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि भारत संतुष्ट होकर बैठा रहे। भारत को पूरी एहतियात बरतते हुए जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा ढांचे को और सशक्त बनाना चाहिए।

चीन इसी रणनीति को विस्तार दे रहा

पिछले कई दशकों से पश्चिमी सीमा पर चीनी गतिविधियां भारत के लिए समस्या खड़ी करती आई हैं। अब तालिबान के उभार से इन समस्याओं में इजाफा हुआ है। चीन भारत की पश्चिमी सीमा पर भारत के खिलाफ गठजोड़ बनाने में जुटा है। वह अपनी बेल्ट एंड रोड एनिशिएटिव योजना के जरिये इन देशों को जोड़ रहा है। वह इन देशों में रणनीतिक निवेश भी कर रहा है, ताकि उनकी प्राकृतिक संपदा का दोहन कर सके। पाकिस्तान, ईरान से लेकर मध्य एशियाई देशों में चीन इसी रणनीति को विस्तार दे रहा है। उसने अफगानिस्तान को भी निशाना बनाया, लेकिन बीते 20 वर्षों में वहां की सरकार अपनी विकास गतिविधियों और खनिज संपदा के उत्खनन में भारत के सहयोग को वरीयता दे रही थी। अफगानिस्तान में सड़कें बनाने के साथ ही भारत ने वहां तक बेहतर पहुंच के लिए ईरान में चाबहार बंदरगाह भी विकसित किया। चूंकि भारत के यहां बड़े रणनीतिक हित दांव पर लगे हुए हैं इसी कारण चीन और पाकिस्तान उसे इस क्षेत्र से बाहर करने पर तुले हैं। ऐसे में यह समय की मांग है कि अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति को समग्रता से समझा जाए।

तालिबान के कुछ धड़ों ने भारतीयों के खिलाफ हमले किए

हमारे राष्ट्रीय हितों की यही मांग है कि अफगानिस्तान में तालिबान की जीत के कारणों और निहितार्थों की सही पड़ताल की जाए, ताकि अनुकूल नीतियां बनाई जा सकें। यकायक हुए परिवर्तन पर भावावेश में आकर कुछ करने के बजाय शांत एवं संयत रवैया आवश्यक है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत ने जिस प्रकार अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में रचनात्मक भूमिका निभाई, उसे देखते हुए अफगान गणतंत्र के पतन से भारत में लोग आक्रोशित हैं। तालिबान की कट्टर विचारधारा के कारण यह समझ आता है। इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि तालिबान के कुछ धड़ों ने भारतीयों के खिलाफ हमले किए, जिनमें कई की जान भी गई। कुछ लोग तालिबान की पाकिस्तान से नजदीकियों पर कुपित हैं। यकीनन पाकिस्तानी सहयोग के बिना तालिबान की मौजूदा सफलता संभव नहीं थी। साथ ही यह न भूला जाए कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कुछ भी स्थायी नहीं।

कूटनीति का यही तकाजा, अवसरों को भुनाया जाए

इतिहास साक्षी है कि जो आज दोस्त है, वह भविष्य में दुश्मन बन सकता है या फिर इसके उलट हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रत्येक परिस्थिति में एक अवसर भी छिपा होता है। कूटनीति का यही तकाजा है कि अवसरों को भुनाया जाए। अफगानिस्तान में भारत के रणनीतिक हितों को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरी तरह सजग हैं। इन्हीं हितों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने दोहा में भारतीय राजदूत को तालिबान के प्रतिनिधि मोहम्मद अब्बास से मुलाकात के लिए कहा। इस बैठक ने भारत को अवसर दिया कि वह तालिबान को उसे उसकी मर्यादा रेखा के बारे में बताए। तालिबान का दावा है कि वह अफगान पहले हैं और उन्हें पाकिस्तानी पिट्ठू नहीं समझा जाना चाहिए। इन बयानों को वास्तविकता के धरातल पर परखना होगा। मोदी सरकार को तालिबान के साथ तत्परता से आगे बढ़ना चाहिए। भारत में इस मुद्दे का राजनीतिकरण भी नहीं किया जाना चाहिए।

 

(लेखक अफगानिस्तान में भारत के राजदूत रहे हैं)

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