अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद के मामले पर शीघ्र सुनवाई की उम्मीद!

[प्रभाकर मिश्र]। अयोध्या जमीन विवाद मामले में एक बार फिर सुनवाई की तारीख तय हुई है। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संविधानपीठ 26 फरवरी को इस मामले पर सुनवाई करेगी। उस दिन कोर्ट यह तय कर सकता है कि सुनवाई कब से होगी और कैसे होगी, नियमित होगी या नहीं। अयोध्या मामले पर बार बार सुनवाई टलने से भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार पर राम मंदिर को लेकर भारी दबाव है।

लोकसभा चुनाव सिर पर है, ऐसे में सरकार कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती है, क्योंकि उसे पता है कि साधु संतों और मतदाताओं के एक बड़े वर्ग की नाराजगी लोकसभा चुनाव में भारी पड़ सकती है। इसलिए मोदी सरकार भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है कि वह राम मंदिर को लेकर कितना गंभीर है! और इसी कोशिश का नतीजा है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर अयोध्या में राम जन्मस्थान से जुड़े 0.313 एकड़ जमीन को छोड़कर बाकी जमीन को वापस करने की मांग की है। अयोध्या में विवादित स्थल के आसपास की 67.703 एकड़ जमीन अधिगृहित करने के 26 वर्षों बाद केंद्र सरकार इसे असल मालिकों को लौटा देने की अर्जी लेकर कोर्ट पहुंची है।

सरकार की ओर से दायर अर्जी में कहा गया है कि सिर्फ 0.313 एकड़ जमीन ही विवादित है, बाकी नहीं। इसलिए बाकी जमीन उसके असली मालिकों को लौटाने की इजाजत दी जानी चाहिए। चूंकि 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने विवाद के निपटारे तक पूरी जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था, इसलिए न तो उस जमीन पर कोई निर्माण हो सकता है और न ही जमीन को उनके मूल मालिकों को लौटाया जा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट, अयोध्या भूमि विवाद में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई से पहले केंद्र सरकार के जमीन वापस करने की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई करता है या नहीं।

केंद्र सरकार ने जिस जमीन को सौंपने की इजाजत सुप्रीम कोर्ट से मांगी है, वह चार मुख्य हिस्सों में बंटी है। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा करीब 42 एकड़ जमीन रामजन्म भूमि न्यास के नाम पर था। बाकी जमीन या तो उत्तर प्रदेश सरकार की है या विवादित है या फिर मुकदमा जीतने वाले के लिए सुरक्षित रखी गई है। केंद्र सरकार ने अपनी अर्जी में कहा है कि विवादित जमीन (0.313 एकड़) के आसपास की जमीन का अधिग्रहण इसलिए किया गया था, ताकि विवाद के निपटारे के बाद उस विवादित जमीन पर कब्जे और उपयोग में कोई बाधा न हो। रामजन्म भूमि न्यास अपनी जमीन वापस चाहता है और चूंकि विवादित जमीन के निपटारे में विलंब हो रहा है, इसलिए कोर्ट को यथास्थिति वाला अपना आदेश वापस लेना चाहिए ताकि गैर-विवादित जमीन को उसके मूल मालिकों को लौटाया जा सके।

पहले भी मांग कर चुका है न्यास
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने ‘सर्टन एरियाज ऑफ अयोध्या एक्ट 1993’ बनाकर लगभग 67.073 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था जिसमें मंदिर मस्जिद वाली विवादित जमीन (जिसे केंद्र सरकार 0.313 एकड़ बता रही है) के साथ रामजन्म भूमि न्यास की 42 एकड़ जमीन भी शामिल थी। न्यास ने छह जून 1996 को अपनी जमीन वापस लेने के लिए केंद्र सरकार को प्रतिवेदन दिया जिसे सरकार ने अगस्त 1996 में निरस्त कर दिया था। सरकार के इस फैसले के खिलाफ न्यास ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन न्यास को यहां भी निराशा हाथ लगी थी। कोर्ट ने 21 जुलाई 1997 को न्यास की याचिका खारिज करते हुए कोई राहत देने से इन्कार कर दिया था।

सरकार के अर्जी से उपजे सवाल
सुप्रीम कोर्ट में सरकार के इस अर्जी से पहला सवाल विवादित जमीन के क्षेत्रफल को लेकर उठ सकता है। कोर्ट में दाखिल सरकार की अर्जी के अनुसार विवादित क्षेत्र 0.313 एकड़ का है। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो अपीलें आई हैं उसमें 2.77 एकड़ जमीन का विवाद है। ऐसे में सवाल यह है कि बाकी गैर-विवादित जमीन 67 एकड़ है या 65 एकड़? दूसरा सवाल जमीन पर रामजन्म भूमि न्यास के दावे को लेकर उठ सकता है। केंद्र सरकार ने न्यास को 42 एकड़ जमीन का मालिक बताया है। चूंकि यह जमीन राज्य सरकार ने न्यास को लीज पर दे रखी थी इसलिए भूमि का मूल मालिक राज्य सरकार हुई।

दरअसल 1980 के दशक के अंत में उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग ने अयोध्या में राम जन्मभूमि के आसपास की 52.90 एकड़ जमीन अधिगृहित की थी। इसके अलग-अलग हिस्सों के मालिक 20 से ज्यादा परिवार थे। इन्हें जमीन के बदले मुआवजा दे दिया गया (हालांकि मुआवजे की राशि को कम बताकर कई परिवार फैजाबाद जिला कोर्ट की शरण में हैं)। मार्च 1992 में यानी मस्जिद ढहाए जाने से कुछ माह पहले इसमें से 42 एकड़ जमीन रामकथा पार्क विकसित करने के लिए रामजन्म भूमि न्यास को दे दी गई। एक अहम सवाल यह कि गैर-विवादित भूमि में काफी जमीन लीज की है, जो अधिग्रहण के बाद खत्म मानी जानी चाहिए। तो फिर ऐसी लीज वाली जमीनों का स्वामित्व तब के मालिकों के पास रहेगा या उत्तर प्रदेश सरकार जमीन की मालिक हो जाएगी?

इस अर्जी से एक सवाल और उठ खड़ा हुआ है। चूंकि राम जन्मभूमि न्यास सुप्रीम कोर्ट के सामने मुकदमे में पक्षकार है, जिसकी इस बारे में याचिका 1997 में निरस्त हो गई थी, तो अब कोर्ट सरकार की इस अर्जी पर कैसे सुनवाई करेगा कि जमीन राम जन्मभूमि न्यास को लौटाना है? इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई से पहले केंद्र सरकार की इस नई अर्जी पर सुनवाई हो सकती है। और केंद्र की अर्जी पर फैसला सुनाने से पहले अदालत इन सवालों का जवाब ढूंढेगी।

जमीन को विवादित व गैर विवादित में नहीं बांटा जा सकता
केंद्र सरकार ने अपनी अर्जी में कहा है कि केवल मंदिर मस्जिद वाली विवादित 0.313 एकड़ जमीन ही विवादित है, बाकी जमीन विवादित नहीं है इसलिए इसे वापस किया जाना चाहिए। लेकिन 2003 के असलम भूरे बनाम अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसले में कहा था कि विवादित व अविवादित जमीन को अलग करके नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा था कि अधिगृहित जमीन को उनके मालिकों को वापस लौटाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए जमीन मालिकों को कोर्ट में अर्जी दायर करनी होगी।

मिलती रही तारीख पर तारीख
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के आठ वर्षों बाद जब पिछले साल अयोध्या भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई तो एक बार सबको लगा कि एक साल के भीतर कोर्ट से फैसला आ सकता है। लोगों ने फैसला आने के दिन गिनने शुरू कर दिए थे। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तो यहां तक हिसाब लगा लिया था कि 2018 की दिवाली अयोध्या के राममंदिर में ही मनाएंगे। लेकिन मुस्लिम पक्षकारों को अयोध्या मामले में 2019 के चुनाव से पहले सुनवाई से ऐतराज था। दलील दी गई कि अयोध्या मामले का असर चुनाव पर पड़ सकता है, इसलिए 2019 तक सुनवाई टाल दी जाए। कोर्ट ने जब इस दलील को नहीं माना तब बड़ी बेंच की मांग हुई।

वर्ष 1994 के इस्माइल फारूकी मामले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के उस फैसले की बात उठाई गई जिसमें यह कहा गया था कि मस्जिद में नमाज इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है और एक साल तक मामला इसी चक्कर में लटक गया। आखिरकार अब कोर्ट ने कह दिया कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग हो या न हो, अयोध्या भूमि विवाद मामले पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। अयोध्या मामले की सुनवाई भूमि विवाद के तौर पर ही होगी और केवल इस केस के तथ्यों और सबूतों के आधार पर होगी।

लेकिन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय बेंच के इस फैसले को नए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक प्रशासनिक आदेश के जरिये पलटते हुए अयोध्या जमीन विवाद की सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधानपीठ का गठन कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में अपनेआप में यह अनूठा फैसला है। यह एक अनोखा मामला इस लिहाज से भी है कि किसी भूमि विवाद मामले की सुनवाई संविधानपीठ करेगी। इससे यह बात साफ है कि सुप्रीम कोर्ट अयोध्या भूमि विवाद को केवल सिविल सूट नहीं मान रहा जैसा पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा मानते थे। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने पांच जजों की संविधान पीठ का गठन किया।

लेकिन 10 जनवरी को जब अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए संविधानपीठ बैठी तो उस बेंच में शामिल जस्टिस यूयू ललित के होने पर मुस्लिम पक्षकारों में से एक पक्षकार के वकील राजीव धवन ने सवाल उठाया था। उनकी आपत्ति यह थी कि अयोध्या विवाद से ही संबंधित एक मामले में जस्टिस यूयू ललित, वकील की हैसियत से 1997 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की ओर से पेश हो चुके हैं, ऐसी स्थिति में उन्हें मामले की सुनवाई से अलग हो जाना चाहिए। इसके बाद जस्टिस ललित को अयोध्या मामले की सुनवाई से खुद को अलग करना पड़ा। सुनवाई एक बार फिर टल गई थी। मुख्य न्यायाधीश को नई बेंच का गठन करना पड़ा। नई बेंच को 29 जनवरी को सुनवाई करनी थी। इसी बीच बेंच के एक जज जस्टिस एसए बोवडे बीमार होने की वजह से अवकाश पर चले गए थे और सुनवाई नहीं हो पाई थी। अब वह वापस आ चुके हैं और 26 फरवरी को सुनवाई होना तय हुआ है।

स्थितियां मोदी सरकार के अनुकूल
इस मामले की प्रत्येक सुनवाई से पहले लोग उम्मीद पालते हैं कि अदालत की ओर से जल्द फैसला आएगा और भगवान राम के भव्य मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ होगा। लेकिन किसी न किसी वजह से सुनवाई टलती जा रही है। बीते 29 जनवरी को सुनवाई होनी थी, पर सुनवाई करने जा रही नवगठित पांच सदस्यीय संविधानपीठ के एक जज, जस्टिस एसए बोवडे के उपलब्ध नहीं होने के चलते सुनवाई एक बार फिर टल गई थी। इस मामले की सुनवाई के लिए नवगठित बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एसए बोवडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

केंद्र की नई अर्जी आने से इस मामले में जल्द सुनवाई की संभावना बढ़ गई है। इस अर्जी के बहाने केंद्र सरकार कोर्ट से कहेगी कि चूंकि मुख्य अपील पर सुनवाई में देर है, इसलिए कोर्ट को ‘अविवादित’ जमीन पर लौटने वाली याचिका पर पहले सुनवाई करनी चाहिए! अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई से इन्कार करता है या खारिज करता है तो मुख्य अपील पर शीघ्र सुनवाई को तैयार होना पड़ेगा! और दोनों स्थितियां मोदी सरकार के लिए अनुकूल होंगी, क्योंकि अगर नई अर्जी को कोर्ट ने खारिज कर दिया तो सरकार रामभक्तों को कहेगी कि उसने तो प्रयास किया था मंदिर निर्माण के लिए अतिरिक्त जमीन वापस लेने का, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया! और अगर मुख्य अपील पर सुनवाई शुरू हो गई तो लोकसभा चुनाव से पहले जैसे जैसे सुनवाई होगी भाजपा के पक्ष में ‘राम मंदिर मय’ माहौल बना रहेगा। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले अयोध्या मामले में सरकार की इस अर्जी को ‘रामबाण’ कहा जा सकता है।
[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

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