मताधिकार की ताकत: भारतीय मतदाताओं की मन की थाह लेना राजनेताओं के लिए आसान नहीं है

[ डॉ. महेश भारद्वाज ]: लोकसभा चुनावों के लिए दो चरणों का मतदान हो चुका है। चुनाव आयोग के अनुसार 11 अप्रैल को पहले चरण में 69.45 प्रतिशत मतदान हुआ और 18 अप्रैल के दूसरे चरण में भी यह 69.43 प्रतिशत ही रह पाया जो 2014 के 69.62 प्रतिशत मतदान से कम है। काफी लोग भारतीय परिस्थितियों के लिहाज से इस आंकड़े को संतोषजनक मान रहे हैं और इसके लिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पीठ थपथपा रहे हैं। लगभग सभी राजनीतिक दल मतदान के इस प्रतिशत की व्याख्या अपने-अपने पक्ष में कर रहे हैं। मतदान का इतना प्रतिशत जिनके पक्ष में नहीं हैं वे भी चुनाव के बीचों-बीच कोई भी स्वीकारोक्ति करके अगले चरणों के लिए अपनी मुश्किलें नहीं बढ़ाना चाह रहे हैं और गोलमोल दलीलों के सहारे मतदान के आखिरी दौर तक भ्रम की स्थिति बनाए रखना चाह रहे हैं।

वैसे भी गुप्त मतदान की व्यवस्था के चलते ठीक से कहां पता चल पाता है कि कम मतदान से किसे लाभ हुआ और ज्यादा से किसे फायदा। हां, राजनीतिक समीक्षक बहस के इस ऊंट को किसी एक तरफ बैठाने की कोशिश जरूर करते रहेंगे और आखिरकार इसमें कुछ हद तक कामयाब भी होते दिखेंगे, लेकिन इस कोलाहल में हमें इक्कीसवीं सदी के भारतीय मतदाता की राजनीतिक सूझबूझ को कम नहीं आंकना चाहिए जिसके मन की थाह लेना आसान नहीं रह गया है। वह बखूबी जानता है कि किसे क्या और कितना बताना है?

मतदान की यह दर भी विचारणीय मुद्दा इसलिए है, क्योंकि एक तरफ तो हम आर्थिक विकास दर को डेढ़-दो प्रतिशत बढ़ाने की बात करते हैं, देश को विकसित मुल्कों की श्रेणी में ले जाना चाहते हैं, दुनिया की तीसरी बड़ी शक्ति बनना चाहते हैं आदि-आदि। इसके उलट मतदान का प्रतिशत दुनिया के पिछड़े मुल्कों के बराबर रहने पर भी हमें कोई खास अफसोस नहीं होता है। यह सवाल दलों से ज्यादा उन मतदाताओं के लिए है जो मतदान के महत्व को 70 साल बाद भी नहीं समझ पाए हैं और मतदान न करने के दूरगामी परिणामों से अभी भी बेखबर हैं। वास्तव में न तो जनता की ओर से और न ही राजनीतिक व्यवस्था में बैठे लोगों की ओर से इधर कोई विशेष ध्यान दिया गया।

बस मतदान को कानूनी अधिकार बना दिया गया, लेकिन जैसी कड़ाई अन्य कानूनों के पालन के लिए होती है वैसी व्यवस्था इसके लिए नहीं हुई। हो सकता है कि यदि मतदाताओं को इससे कोई तात्कालिक आर्थिक या अन्य प्रकार का लाभ मिलता या सरकार को इससे राजस्व लाभ मिलता तो सूरते-हाल कुछ और होते! ऐसा अनजाने में हुआ या जानबूझकर, इस विषय को समाजशास्त्रीय शोध के लिए छोड़ दिया जाए। असल में एक बड़े वर्ग को कानून प्रदत्त राजनीतिक समानता और स्वतंत्रता की कीमत का अभी भी अच्छे से ज्ञान नहीं हो पाया है। अजीब बात है कि लोग सामाजिक और आर्थिक असमानता का रोना तो रोते रहते हैं, लेकिन जो राजनीतिक समानता मिली हुई है उसके प्रति उदासीन हैैं। क्या हम नहीं जानते कि बीसवीं सदी में शुरू हुई लोकशाही की आंधी ने दुनिया के बड़े-बड़े साम्राज्यों, तानाशाहों और अधिनायकवादी शासकों को उखाड़ फेंका और यह सिलसिला अभी भी जारी है। यह सब हुआ इसी राजनीतिक समानता की बदौलत जिससे हमारे 31 प्रतिशत लोग अभी भी अनभिज्ञ हैं।

मताधिकार की ताकत की पहचान बिना इसके इस्तेमाल के कैसे हो सकती हैं? जान लें कि जिन लोगों ने मताधिकार की ताकत को पहचान कर इसका इस्तेमाल शुरू किया उनको इसका सीधा लाभ मिला है। आज जो समाज, जाति, वर्ग या क्षेत्र संगठित होकर राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने लगे हैं शासन में हिस्सा पाने की कुंजी भी उनके हाथ लगने लगी है और लोकतंत्र का असल लाभ भी मिलने लगा है, चाहे वह आरक्षण, सरकारी योजनाओं, सहायता पैकेजों या अन्य तरीके से हो। इसे करीब से समझने के लिए नजर उन लोगों पर भी डालनी होगी जो मताधिकार के प्रति उदासीन रहते हैैं और असंगठित भी हैं। इस श्रेणी के लोग राज-काज में उपेक्षित तो होते ही जा रहे हैं, राज में से उनकी हिस्सेदारी भी खिसकती जा रही है। ऐसे बहुत वर्ग, समाज और क्षेत्र हैैं जिनकी किसी जमाने में राजनीतिक जागरूकता के चलते तूती बोलती थी और आज अपनी राजनीतिक उदासीनता के कारण हाशिये पर पहुंच गए हैं।

वर्तमान लोकतांत्रिक प्रणाली में महत्व केवल संख्याबल का रह गया है और जिनके पास संख्या है राज वही करने लगे हैं। फिर राजनीतिक समानता की बदौलत राजा और रंक में भले ही कितनी भी सामाजिक और आर्थिक असमानता हो, लेकिन दोनों के मत की कीमत एक है। राजनीतिक समानता की बदौलत बड़े से बड़े ज्ञानी के मत की कीमत भी अशिक्षित मतदाता के समान है। हो सकता है एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी पंचायत में बिना पढ़े-लिखे बहुसंख्यक मतदाता खूब पढे़-लिखे, लेकिन अल्पसंख्यक मतदाताओं को कोने में बिठा दे और हमारा लोकतंत्र भीड़तंत्र में तब्दील हो जाए! बात यह है कि पहले केवल समाज के ऊपरी पायदान और उनसे जुड़े बहुत कम लोग ही राजकार्यों में हिस्सा लेते थे और जनसामान्य की रुचि न के बराबर थी।

जैसे-जैसे सामान्य जन में जागरूकता बढ़ी तो वह सक्रिय होकर इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेने लगा, लेकिन पढ़े-लिखे और संपन्न लोग उदासीन हो गए, जिसका परिणाम सामने है। बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था होने के कारण ज्यादातर गठबंधन सरकारें 30-35 प्रतिशत मतों पर बन रही हैैं, जबकि लगभग 30-35 प्रतिशत मतदाता तो अपने मताधिकार का इस्तेमाल ही नहीं करते। इसमें फर्क सिर्फ यही आया है कि पहले एक अलग तबका मताधिकार का प्रयोग करता था और अब दूसरा तबका।

दोनों ही स्थितियां सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं हैैं, क्योंकि ऐसे में जो भी सरकार बनेगी वह उसी तबके की पसंद की होगी जिसने उसको चुनने में दिलचस्पी दिखाई होगी। अत: यदि बहुसंख्यक मतदाता राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर मतदान करेंगे तो नई सरकार से राष्ट्र सर्वोपरि के निर्णयों की उम्मीद होगी, यदि विकास को ध्यान में रखकर मतदान होगा तो विकास की अपेक्षा रखी जाएगी, यदि जाति विशेष को ध्यान में रखकर मतदान होगा तो चुनावों के बाद जातीय बोलबाले के लिए भी तैयार रहना होगा और यदि किसी ने अपना मत बेचा होगा तो उसे आगे भी इसके लिए तैयार रहना होगा।

अर्थात मतदाताओं की गुणवत्ता ही सरकार की गुणवत्ता निर्धारित करेगी। फिर जब जनप्रतिनिधियों की हार-जीत एक-एक मत से भी होने लगे तो अपने मत की कीमत जान लेनी चाहिए। और जब राजनीति हम सबके जीवन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करने लगे तो इसकी गुणवत्ता के बारे में भी समय रहते विचार करने में ही सबकी भलाई है।

( लेखक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं )

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