इस्‍लामी जगत की हिंसा पर मौन वर्ल्‍ड मीडिया, राजनीति-मजहबी विचार तंत्र को कठघरे में खड़ा करने की जरूरत

कम से कम गैर मुसलमानों को तो ध्यान देना चाहिए। उन्हें अपने और आम मुसलमानों के भी हित में उस संपूर्ण राजनीतिक-मजहबी विचार तंत्र को कठघरे में खड़ा करना चाहिए जो सालाना हजारों निरीह लोगों की बलि लेता है।

Sanjay PokhriyalFri, 18 Jun 2021 09:15 AM (IST)
यह आश्चर्य है कि अफगानिस्तान, सीरिया, इराक आदि देशों के संहार दुनिया के मीडिया में कोई खास समाचार नहीं बनते।

शंकर शरण। मास-इजरायल के बीच लड़ाई फिर शुरू होती दिख रही है, क्योंकि इजरायल की नई सरकार ने यह कहकर गाजा पट्टी पर बम बरसाए हैं कि हमास की ओर से उसके इलाके में आग लगाने वाले गुब्बारे छोड़े जा रहे हैं। इसी के साथ इस्लामी जगत में इजरायल के खिलाफ आवाजें उठनी शुरू हो गई हैं, लेकिन यही आवाजें तब खामोश रहती हैं कि जब अफगानिस्तान में मार-काट मची होती है। इन दिनों अफगानिस्तान के हालात फिर बहुत खराब होते दिख रहे हैं। वास्तव में वहां ईद के बाद से ही हालात खराब होते जा रहे हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब बड़ी संख्या में निदरेष-निहत्थे मुसलमान न मारे जाते हों।

बीते दिनों तो पांच पोलियो कार्यकर्ताओं को भी मार डाला गया। पिछले महीने काबुल में एक स्कूल पर बमों से हमला कर 90 स्कूली लड़कियों और अन्य लोगों को मार डाला गया था, किंतु आश्चर्य है कि अफगानिस्तान का संहार दुनिया के मीडिया में कोई खास समाचार नहीं बनता। इसके विपरीत गाजा में एक मृतक मुस्लिम बच्ची का फुटेज, नाम सहित दुनिया भर के मीडिया में कई दिन चलते रहे। ऐसा विचित्र भैंगापन क्यों? क्या केवल इसलिए, क्योंकि अफगानिस्तान में सैकड़ों निदरेष मुसलमानों की हत्याएं मुसलमानों ने ही कीं?

केवल अफगानिस्तान में ही बच्चे और महिलाएं हिंसा का शिकार नहीं बनते। ऐसा और देशों में भी होता है, जहां मुसलमान ही मुसलमान की हत्या करते हैं। कुछ वर्ष पहले पेशावर, पाकिस्तान में एक स्कूल में टाइम-बम लगाकर तहरीके-तालिबान ने सौ से अधिक स्कूली बच्चों और उनके अलावा अनेक शिक्षकों, कर्मचारियों को मार डाला था। वही हिसाब था: मृतक बच्चे मुसलमान थे तथा मारने वाले भी मुसलमान। मस्जिदों पर हमले कर सालाना असंख्य निदरेष मुसलमानों को मार डालना पाकिस्तान में भी नियमित है। बलूचिस्तान के शिया नेता सैयद दाउद आगा के अनुसार, हम तो बस कब्र खोदने वाले समुदाय बन गए हैं। वे हमारी मस्जिदों के सामने आ-आकर मार डालो के आह्वान करते रहते हैं।

इराक में भी कुछ वर्ष पहले इस्लामिक स्टेट ने एक कैदखाने पर हमला कर सभी शियाओं को चुन कर ट्रकों में भरा। उनकी संख्या 679 थी। उन्हें एक सुनसान स्थान ले जाकर गोली मार दी गई। यानी एक बार में लगभग सात सौ मुसलमानों को मार डाला गया। यहीं पर वे दृश्य भी याद करें, जब छोटे-छोटे अबोध मुस्लिम बच्चों को टाइम बम से लैस कर, महत्वपूर्ण जगहों पर रिमोट से आत्मघाती विस्फोट कराए गए। गत दो दशकों में ऐसा कई देशों में हुआ है। ऐसे कार्य सदैव जिहादियों ने ही किए हैं, परंतु ऐसे भयावह संहारों पर दुनिया में कभी कोई हाय-तौबा नहीं मचती कि बेचारे निदरेष मुसलमान मारे गए। यूरोप, अमेरिका तो दूर, खुद मुस्लिम देशों में भी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। न ही कभी मानवाधिकार उद्योग के प्रचारक उस पर सिर धुनते नजर आते हैं। सभी संवेदनशून्य बने रहते हैं।

मामला बिल्कुल साफ है कि मुस्लिम जमातें और नेता ही मुसलमानों की जान को अहमियत नहीं देते। यह स्थिति केवल कुछ कट्टरपंथियों की ही नहीं है। मुस्लिम देशों के शासक, कथित लिबरल मुस्लिम बौद्धिक, नेता आदि भी इस पर कुछ नहीं सोचते। कभी किसी को इन नियमित संहारों पर चिंता करते नहीं देखा सुना जाता, जो मुसलमानों द्वारा दूसरे मुसलमानों का होता है। ऐसी चुप्पी का मुख्य कारण है -इस्लामी मतवाद का बचाव करना। यदि लड़कियों के स्कूल, ब्यूटी पार्लर, अस्पताल आदि पर जिहादी हमलों का विश्लेषण होगा तो यह सामने आएगा कि वह सब इस्लाम के नाम पर ही किया जाता है।

इस्लाम के अनुसार 11-12 वर्ष की आयु के बाद लड़की अकेले घर से बाहर नहीं निकल सकती। तब लड़की को परिवार के ऐसे पुरुष के साथ ही बाहर निकलना है, जिसके साथ शादी मना हो। जैसे पिता, सगा भाई आदि। यही कायदा शादीशुदा मुस्लिम स्त्रियों के लिए भी है। केवल उम्र-दराज स्त्रियों को इससे छूट है, जो बच्चे पैदा करने की आयु पार कर चुकी हों। इसीलिए तालिबान या इस्लामिक स्टेट लड़कियों के स्कूलों, कॉलेजों पर हमला करते हैं, क्योंकि उनके हिसाब से लड़कियों का ऐसे लड़कों के साथ होना इस्लाम विरुद्ध है, जिनसे उनकी शादी मना न हो। इसी कायदे से लड़कियों का स्कूल जाना, बाहर काम करना, मैत्री संबंध बनाना आदि वर्जति है। जो मुस्लिम लड़की, स्त्री अकेले घर से बाहर स्कूल, अस्पताल या ऑफिस जाने के लिए भी निकलती है, तो वह इस्लामी कायदों का उल्लंघन कर रही होती है। उन्हें दंडित करना इस्लामी नजरिये से जायज है।

यही तालिबान या इस्लामिक स्टेट के दस्ते करते हैं। वे इस्लाम को लागू करने के लिए मुसलमानों को मारते रहते हैं। चाहे उस का रूप जो भी हो। उदाहरण के लिए इस्लाम स्त्रियों को सजने-संवरने की भी मनाही करता है। इसी कारण तालिबान अपने शासन या प्रभाव वाले इलाकों में ब्यूटी पार्लरों को नष्ट कर देते हैं। तालिबान या इस्लामिक स्टेट जैसों के अनुसार, कई मुद्दों पर दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान भी कुफ्र के दोषी हैं। इसलिए इस्लामी कायदे से मौत की सजा के हकदार हैं। उसी श्रेणी में सारे शिया, हाजरा, बहाई, यजीदी, अहमदिया आदि भी हैं, जिन्होंने इस्लामी कायदे से रंच मात्र भी हटने या उसमें कुछ जोड़ने, बदलने की कोशिश की है। सो, कट्टर इस्लामी संगठन खुद मुस्लिम देशों में भी दूसरे मुसलमानों को नियमित मारते रहते हैं।

तमाम मुस्लिम विद्वान भी इस्लाम को एक चट्टान सा अपरिवर्तनीय मानते हैं। लिहाजा इस्लामी संगठनों की ओर से तमाम कार्रवाइयां भी कमोबेश एक जैसी होती हैं। गाजा से लेकर नाइजीरिया, सूडान, सीरिया, यमन, इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि विविध देशों की घटनाएं कमोबेश एकरूप होती हैं। एक सी शिकायतें, एक जैसे कारनामे। सब का निष्कर्ष यही निकलता है कि मुसलमान खुद ही इस्लामी मतवाद के पहले शिकार हैं। दुनिया में इस्लाम का राजनीतिक वर्चस्व बढ़े, या बना रहे, इसके लिए उन्हें सस्ते ईंधन की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इस पर कम से कम गैर मुसलमानों को तो ध्यान देना चाहिए। उन्हें अपने और आम मुसलमानों के भी हित में उस संपूर्ण राजनीतिक-मजहबी विचार तंत्र को कठघरे में खड़ा करना चाहिए, जो सालाना हजारों निरीह लोगों की बलि लेता है।

(लेखक राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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