मध्‍य प्रदेश में उपचुनाव से पहले कांग्रेसियों के हाथ में भगवा झंडा, जानें क्‍या है रणनीति

मध्‍य प्रदेश में उपचुनाव से पहले कांग्रेसियों के हाथ में भगवा झंडा, जानें क्‍या है रणनीति
Publish Date:Sun, 20 Sep 2020 10:47 AM (IST) Author: Arun Kumar Singh

[सद्गुरु शरण]। इस तस्वीर को गौर से देखिए। झंडों का चटख भगवा रंग देखकर यकीनन आपको लगेगा कि यह कोई धार्मिक जुलूस है, पर आप धोखा खा गए। दरअसल, आपकी नजर भगवा की आक्रामकता के बीच बमुश्किल झलक पा रहे इक्का-दुक्का तिरंगे झंडों तक नहीं पहुंची। जुलूस के आयोजक भी शायद यही चाहते थे कि सबको भगवा दिखे, तिरंगा नहीं। अब आपके चौंकने की बारी है। यह जुलूस किसी धार्मिक या सांस्कृतिक संगठन का नहीं, बल्कि कांग्रेस का है। जी हां, कांग्रेस का। 

 अवसर है, इंदौर के सांवेर में आयोजित पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की सभा, जिसमें शामिल होने के लिए सैकड़ों कार्यकर्ता भगवा झंडे लेकर पहुंचे। तस्वीर से साफ है कि ऐसा अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह बाकायदा योजनाबद्ध है। अब इस असाधारण घटना की वजह भी जान लीजिए। मध्य प्रदेश में विधायकों के निधन और इस्तीफों से रिक्त 28 विधानसभा सीटों पर जल्द ही उपचुनाव होने वाला है, जिसे लेकर कमलनाथ का दावा है कि इसके नतीजे प्रदेश की सत्ता बदल देंगे। जाहिर है कि जब उपचुनाव नतीजों के आधार पर सत्ता परिवर्तन की रणनीति बन रही है तो झंडों का रंग बदल ही जाएगा। 

सत्ता के लिए राजनीतिक दलों द्वारा नीति-नियम बदल लेना प्रचलित प्रवृत्ति है, यद्यपि कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा चुनावी राजनीति के लिए तिरंगा पीछे करके भगवा झंडे उठा लेना ऐतिहासिक घटना है। इस क्रांतिकारी बदलाव का मतदाताओं और चुनाव नतीजों पर कितना असर पड़ता है, यह भविष्य में स्पष्ट हो जाएगा। यह जरूर है कि कांग्रेस का भगवा प्रेम आगे बढ़ा तो मध्य प्रदेश और यह उपचुनाव इस दृष्टि से मील का पत्थर माना जाएगा। इससे पहले कांग्रेस के राजनीतिक आयोजनों में कार्यकर्ताओं को भगवा लहराते कभी नहीं देखा गया।

यह उस राजनीतिक दल का हृदय परिवर्तन है, जिसने कुछ साल पहले अपने सत्ताकाल में अयोध्या के राम मंदिर निर्माण के संबंध में कहा था कि राम काल्पनिक हैं। समझा जा सकता है कि कांग्रेस की इस धारणा से भारत समेत पूरी दुनिया में सनातन धर्म के अनुयाइयों को कितनी गहरी ठेस लगी होगी। यह भी उल्लेखनीय है कि हिंदू आतंकवाद जैसा विवादास्पद जुमला भी इसी पार्टी के एक बड़े नेता ने पहली बार बोला था। संयोगवश वह नेता मध्य प्रदेश से ही ताल्लुक रखते हैं। अब उसी प्रदेश में कांग्रेस द्वारा भगवा की महत्ता के सामने समर्पण करना 28 सीटों के उपचुनाव के बहाने एक नई धारा में उतरने का परीक्षण भी है। 

संघ परिवार और भाजपा की आक्रामकता के सामने पस्त दिख रहे कांग्रेस नेतृत्व के लिए अब यह समझना आसान हो चुका है कि जन-जन की आस्था के केंद्र राम को काल्पनिक बताने और सदा-सहिष्णु हिंदुओं को आतंकवाद से संबद्ध साबित करने की हरकतें पार्टी के लिए किस कदर नासूर बन चुकी हैं। इसके बावजूद यह मानना उचित नहीं होगा कि कांग्रेस भगवा झंडे के प्रति श्रद्धा जताकर प्रायश्चित करना चाहती है, क्योंकि पार्टी की तरफ से अब तक ऐसा कोई अधिकृत वक्तव्य नहीं आया है। 

फिलहाल यही माना जाएगा कि कांग्रेस उपचुनाव से पहले मतदाताओं के दिल में जगह बनाने के लिए ऐसा कर रही है। यह उसी दुविधा का विस्तार है, जो पिछले कुछ समय से पार्टी के शीर्षस्थ नेतृत्व में सॉफ्ट हिंदुत्व की शक्ल में नजर आ रही है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नेताओं ने अपने चुनावी दौरों के दौरान मंदिरों में जाना शुरू किया है। यद्यपि इस कवायद के फलीभूत न होने पर पार्टी ने सीधे भगवा ध्वज उठा लिया। पहले कांग्रेस आरोप लगाती थी कि संघ परिवार और भाजपा राम के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, पर मोदी-योगी की जोड़ी ने राम मंदिर समेत पूरे सांस्कृतिक एजेंडे पर जिस तरह पूरी पारदर्शिता के साथ अमल किया, उससे कांग्रेस का बैकफुट पर जाना स्वाभाविक है। इस राह पर भाजपा इतनी लीड ले चुकी है कि कांग्रेस के लिए उसे पार करना नामुमकिन ही है।

बहरहाल, कांग्रेस ने किसी भी वजह से भगवा झंडे उठाए हों, इसका राजनीतिक नफा-नुकसान से हटकर स्वागत किया जाना चाहिए। कांग्रेस नेतृत्व को यह बात समझनी चाहिए कि पार्टी के मौजूदा पतन की कई वजहों में धार्मिक आधार पर घोर तुष्टीकरण वाली वोटबैंक राजनीति भी है। राजनीति देश की परंपराओं और सहिष्णु समाज-जीवनशैली से परे नहीं है। संविधान की मंशा के अनुरूप हर राजनीतिक दल की शैली में सभी पंथों, वर्गो और क्षेत्रों के प्रति सम्मान दिखना ही चाहिए।

इस तस्वीर का संदर्भ यदि प्रस्तावित उपचुनाव न होता तो यह दृश्य तमाम देशवासियों के दिल के किसी कोने में कांग्रेस के प्रति सम्मान बढ़ाता। इस बात पर बहस की गुंजाइश नहीं है कि कुछ नेताओं के आचरण की वजह से बहुसंख्यक वर्ग में कांग्रेस के प्रति नाराजगी है। यह आसानी से खत्म भी नहीं होगी। बहरहाल, इस दिशा में कदम तो बढ़ाना ही होगा। इंदौर की यह घटना पहला कदम मानी जा सकती है। जब जागो, तभी सवेरा।

(संपादक, नई दुनिया, मध्य प्रदेश)

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