कोरोना काल में संघ व सामाजिक समरसता, संकट में पूरी तन्मयता से देश के साथ खड़ा

हिंदू समाज के आंतरिक विभाजन को दूर करते हुए देश को सक्षम और सबल बनाने की दिशा में जो राह डॉ. हेडगेवार ने दिखाई उसी पथ पर चलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज अपनी व्यापक स्वीकार्यता के साथ विश्व का सबसे बड़ा और प्रयोगधर्मी संगठन बन गया है।

Sanjay PokhriyalTue, 20 Apr 2021 09:37 AM (IST)
कुंभ के दौरान कोरोना संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन कराने के लिए निगरानी करते संघ के स्वयंसेवक। फाइल

डॉ. विशेष गुप्ता। विगत वर्ष लॉकडाउन के दौर में सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने ‘वर्तमान परिदृश्य और हमारी भूमिका’ विषय पर बोलते हुए कहा था कि हमारी परंपरा एकांत में आत्मसाधना और लोकांत में परोपकार की पोषक है। उन्होंने यह संकेत भी किया कि इस कोरोना महामारी के काल में संघ के कार्य प्रत्यक्ष रूप से भले ही बंद रहे हों, लेकिन जैसे लॉकडाउन में जीवन चलता रहा है, ठीक वैसे ही संघ के कार्य भी चलते रहे। उस समय नित्य के कार्यक्रम भले ही बंद रहे, किंतु उनकी जगह दूसरे कार्यक्रमों ने ले ली थी। उन कार्यो में सेवा का कार्य प्रमुख रहा था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अपना प्रमुख कार्य तो इन कार्यक्रमों के माध्यम से स्वयं को अच्छा बनाने के साथ साथ अपने प्रयास से दुनिया को भी अच्छा बनाना है।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 130 करोड़ भारतवासी उनका परिवार है और यहां रहने वाले सब भाई-बंधु हैं। इसलिए सेवा की जरूरत जिसे सबसे अधिक है उसके लिए मदद बिना किसी भेदभाव के वहां सबसे पहले पहुंचनी चाहिए। उनका स्पष्ट मानना है कि सेवा करते समय हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि सभी मनुष्य समान हैं। वह इसलिए, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य में वही ईश्वर तत्व समान रूप से व्याप्त है। इस सच को ऋषियों, मुनियों, संतगुरुओं और समाज सुधारकों ने भी अपने अनुभव और आचरण के माध्यम से पुष्ट किया है। यहां इस सच को कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि इस श्रेष्ठ चिंतन के आधार पर जब-जब हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं और हमारे दैनिक जीवन में श्रेष्ठ आचरण का संरक्षण रहा, तब तब भारत एकात्म, समृद्ध और अजेय राष्ट्र रहा। दूसरी ओर जब-जब हमारे इस श्रेष्ठ जीवन के दर्शन का हमारे व्यवहार में क्षरण हुआ, तब तब समाज पतन की ओर गया। जाति के आधार पर ऊंच-नीच की भावना बढ़ी तथा अस्पृश्यता जैसी अमानवीय कुप्रथा का विस्तार हुआ।

वर्ष 2016 के मार्च माह में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने भी सर्वसम्मत रूप से माना था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैनंदिन जीवन में व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक स्तर पर अपने इस सनातन और शाश्वत जीवन दर्शन के अनुरूप समरसतापूर्ण आचरण करना चाहिए। ऐसे आचरण से ही समाज में जातिभेद, अस्पृश्यता और परस्पर अविश्वास का आचरण समाप्त होगा तथा संपूर्ण समाज शोषणमुक्त, एकात्म और समरस जीवन का अनुभव कर सकेगा। वास्तविकता यह है कि संघ कार्य में समरसता के भाव से महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर तक भलीभांति परिचित भी रहे और संघ विचारधारा से प्रभावित भी हुए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जातिभेद से परे हिंदू नवयुवकों को इस समरस पथ की ओर मोड़ने वाले हेडगेवार थे तथा उनकी इस कल्पना को ‘न हिंदू पतितो भवेत’ जैसे विशाल भाव को सामूहिक उद्घोष में रूपांतरित करने वाले द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरु जी थे। तृतीय सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने संघ की आंतरिक संरचना में समरसता के शिल्प की रचना की। यही वजह रही कि संघ की हर अग्रगामी पीढ़ी के वलय के साथ समरसता का संकल्प निरंतर गहरा होकर समाज में संघकार्य की स्वीकार्यता में वृद्धि कर रहा है।

सुदामा के घर कृष्ण के जाने का समय : तृतीय सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने मार्च 1977 में दिल्ली में एक कार्यक्रम में कहा कि संघ एक ऐसा समरस समाज विकसित करना चाहता है जहां किसी के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। परंतु यह समरस एवं समृद्ध समाज भाषणों या नारों से नहीं बनाया जा सकता। ऐसे समाज के निर्माण के लिए एक कठिन तपस्या की आवश्यकता होगी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जातिगत भेदभाव तथा अस्पृश्यता हमारे समाज में घातक रोग है। अब समय आ गया है कि स्वयं कृष्ण को सुदामा के घर जाना होगा। स्वयं जाकर समस्याओं को समझना होगा तथा उनका निदान भी करना पड़ेगा।

संघ के स्वयंसेवकों को समाज के वंचित, पीड़ित एवं पिछड़े वर्गो की सेवा के लिए उनकी बस्ती में जाना होगा। उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाना होगा। अभी तक राजनीतिक दल उनकी गरीबी, अशिक्षा और अज्ञानता को अपनी सत्ता के लिए उन्हें भुनाते रहे हैं। संघ को एक ऐसी राह अपनानी होगी ताकि वे अपनी गरीबी और अशिक्षा से स्वयं लड़ सकें। इससे भी आगे बढ़कर उनके बीच सेवा कार्य करने होंगे। उनकी याचना की प्रवृत्ति को दूर करते हुए उनके स्वावलंबन के लिए कार्य करना होगा। वर्ष 2018 में दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में भी सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने स्पष्ट कहा था कि संघ एक मैथोडोलॉजी है। वह व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है। इसलिए हमको भेदमुक्त समाज चाहिए, समतायुक्त समाज चाहिए और शोषणमुक्त समाज के साथ साथ स्वार्थरहित समाज चाहिए। यही समाज के समरस होने की संकल्पना है।

सेवा के माध्यम से समाज में समरसता : खास बात यह है कि संघ सेवा के माध्यम से समाज में समरसता के निर्माण करने का साधन भी है। संघ के लिए सेवा का अर्थ निस्वार्थ भाव से कर्तव्यबोध लेकर समाज के अभावग्रस्त, पीड़ित तथा वंचित लोगों के कष्ट दूर करते हुए उनको सशक्त बनाना है। आज समाज में एक बड़ा वर्ग अभावग्रस्त, पीड़ित तथा वंचित है। कुरीतियों का शिकार है। ऐसे लोगों के परिवारों में जाकर उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन तथा संस्कारों की शिक्षा देकर मुख्यधारा में लाना आवश्यक है। इसी भाव को दृष्टिगत रखते हुए 1990 में संघ द्वारा सेवा कार्य के लिए समíपत सेवा विभाग प्रारंभ किया गया। आज देश में 800 से भी अधिक छोटी-बड़ी संस्थाओं द्वारा 1.55 लाख सेवा कार्य स्वयंसेवकों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। ये संस्थाएं पूर्णतया स्वावलंबी और स्वायत्त हैं। इन संस्थाओं में गांव स्तर की लघु सेवा से लेकर प्रदेश स्तर तक की बड़ी संस्थाएं शामिल हैं। प्रदेश स्तर पर कार्यरत संस्थाएं सेवा भारती के नाम से जानी जाती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर सेवा करने वाली संस्था राष्ट्रीय सेवा भारती है। इसका मुख्यालय दिल्ली में है। इनके द्वारा किए जाने वाले सेवा कार्यो के चार प्रमुख आयाम हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक संस्कार और स्वावलंबन प्रमुख हैं।

आज नगरीय क्षेत्र की झुग्गी झोपड़ियों तथा पिछड़े हुए क्षेत्रों में अनेक सेवा कार्य चल रहे हैं। वर्तमान में देश में 10 करोड़ से भी अधिक अपने जनजातीय बंधु हैं जिन्हें हम आदिवासी कहते हैं। ऐसे अनेक क्षेत्रों में सेवा कार्य चलते हैं। असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और नगालैंड के सुदूर करीब 4,500 गांवों में लगभग पांच हजार स्वास्थ्य मित्र कार्य कर रहे हैं। महाराष्ट्र की घुमंतू जातियों के बीच 20 वर्षो से भी अधिक समय से वहां सेवा कार्य चल रहे हैं। वहां उनके लिए घर नहीं हैं। राशनकार्ड नहीं हैं। मतदाता सूची में उनका नाम नहीं है। उनके लिए कोई खास रोजगार भी नहीं है और उनके बच्चों को किसी प्रकार की शिक्षा भी नहीं मिलती है। इनमें से अधिकांश व्यसनी हैं तथा अपराधों में शामिल रहते हैं। ऐसी दर्जनभर घुमंतू जातियों के उत्थान के लिए स्वयंसेवक निरंतर सेवा कार्य कर रहे हैं। महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए 50 हजार से भी अधिक महिलाएं इस सेवा कार्य में अपना सहयोग प्रदान कर रही हैं। इसी के जरिये आज महिलाएं स्वावलंबी बन रही हैं। अनाथ व नवजात बच्चों के लिए मातृछाया के नाम से संस्थाएं भी स्वयंसेवकों के द्वारा चलाई जा रही हैं।

संघ में जाति, पंथ, समुदाय व रंग देखकर सेवा का चलन नहीं है। जो संकट में है, वंचित है, पीड़ित है उसकी सेवा करना संघ की परिधि में आता है। उसकी पूजा पद्धति व संप्रदाय चाहे जो हो, संघ उनकी सेवा करने से परहेज नहीं करता। उदाहरण के लिए यदि कहीं सेवा कार्य संपन्न हो रहा है और वहां मुस्लिम समाज की संख्या अधिक है तो वहां वे संघ के सेवा कार्य का लाभ लेते हैं। संघ के सेवा कार्य के जहां चल चिकित्सालय हैं, वहां मुस्लिम परिवार के लोग अपने परिवार के सदस्यों को लेकर पहुंचते हैं। ईसाई वर्ग भी संघ सेवा का लाभ ले रहा है।

संकट में पूरी तन्मयता से देश के साथ खड़ा: देश हमें सबकुछ देता है, लिहाजा हम भी तो कुछ देना सीखें। इसी भाव को लेकर संघ का स्वयंसेवक समाज के साथ समरस होकर सेवा को सदैव तत्पर रहता है। जब जब समाज पर किसी भी प्रकार का कष्ट अथवा कोई प्राकृतिक आपदा आई हो, संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी चिंता न करते हुए पूर्ण निष्ठा के साथ अपना योगदान दिया है। वह चाहे 1962 का भारत-चीन युद्ध हो या फिर 1965 या 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध रहा हो। चाहे 2001 का गुजरात भूकंप रहा हो या 2004 की दक्षिण भारत की सुनामी या फिर वह 2013 के उत्तराखंड की बाढ़ ही क्यों न रही हो, संघ के स्वयंसेवक सदैव बचाव और राहत के कार्यो में आगे ही रहे हैं। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भोजन पहुंचाने के साथ साथ चिकित्सा सुविधा पहुंचाने में संघ के स्वयंसेवकों ने हमेशा अग्रणी भूमिका निभाई है।

अभी कोविड महामारी की बात करें तो कोरोना संक्रमण की विभीषिका के इस काल में अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, राष्ट्रीय सेवा भारती और इससे संबद्ध संस्थाओं ने इस लॉकडाउन के काल में साढ़े तीन लाख से भी अधिक संघ कार्यकर्ताओं ने अपने स्वास्थ्य की चिंता किए बिना 70 हजार स्थानों पर 3.17 करोड़ लोगों तक भोजन तथा 51 लाख लोगों तक राशन किट वितरित कराने का काम किया। इतना ही नहीं, लगभग पांच लाख प्रवासी श्रमिकों तथा दो लाख घुमंतू परिवारों तक जनसहायता पहुंचाई गई। साथ ही 50 लाख मास्क का वितरण स्वयंसेवकों द्वारा किया गया। लगभग 25 हजार स्वयंसेवकों द्वारा किया गया रक्तदान प्रशंसनीय रहा है।

समरसता को लेकर संघ सातत्य से जो एक संस्कार निरंतर दे रहा है वह यह है कि ‘यह मेरी मातृभूमि है, मैं उसका पुत्र हूं तथा अन्य सभी मेरे बंधु हैं। सभी के कल्याण में मेरा कल्याण है। मैं समाज का एक अंग हूं।’ यही भाव संघ के स्वयंसेवकों में निíमत करते हुए संपूर्ण समाज के साथ समरस हो जाने का नाम ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। कोरोना काल के साथ साथ हरिद्वार कुंभ में भी संघ से जुड़ी इस समरसता के भाव के हम सभी ने हकीकत में स्पष्ट दर्शन किए हैं। आज दुनिया का यह सबसे बड़ा सामाजिक संगठन है जो भारतवर्ष पर आने वाले हर संकट में समरस होकर पूरी तन्मयता के साथ देश के साथ खड़ा है।

[अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग]

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