नजीर न माना जाने वाला फैसला: सवाल जमानत देने पर नहीं, बल्कि  जमानत आदेश के साथ दिए गए दृष्टांत पर है

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह बेहतर अवसर है। वह उच्च न्यायालयों की कार्यविधि को संवैधानिक जबाबदेही की सीमा में बांध सकता है। अभी हाई कोर्ट में जजों की जबाबदेही का कोई प्रविधान नहीं है जबकि निचली अदालतें इन्हीं हाई कोर्ट के अधीन हैं।

Bhupendra SinghThu, 01 Jul 2021 04:43 AM (IST)
दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय न्यायपालिका की प्रामाणिकता को कठघरे में खड़ा करता है

[ अजय खेमरिया ]: दिल्ली दंगों में आरोपित तीन छात्रों की जमानत याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय के जमानत आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने एक बार फिर हमारी न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते साल फरवरी में हुए दिल्ली दंगों के आरोप में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा, जेएनयू की छात्राएं नताशा और देवांगना तिहाड़ जेल में बंद थीं। तीनों पर आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए एवं अन्य धाराओं में मामले दर्ज थे। निचली अदालत से जमानत याचिका खारिज होने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों इन तीनों को जमानत दे दी। सवाल जमानत देने पर नहीं, बल्कि जमानत आदेश के साथ दिए गए 133 पेज के दृष्टांत पर है। यह न केवल उच्च न्यायालय की अधिकारिता से बाहर है, बल्कि अनपेक्षित भी। शीर्ष अदालत ने इस आदेश पर रोक नही लगाई, लेकिन उसे नजीर मानने पर प्रतिबंध लगाकर इस बहस को जन्म दे दिया कि क्या हाई कोर्ट मनचाहे निर्णय देने के लिए स्वतंत्र हैं?

दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय न्यायपालिका की प्रामाणिकता को कठघरे में खड़ा करता है

जब देश का सर्वोच्च न्यायालय ही यह मानकर चल रहा है कि इस निर्णय की तार्किक समीक्षा की जाएगी, तब सवाल यह उठता है कि क्या हाई कोर्ट के निर्णयों की समीक्षा ट्रायल कोर्ट की भांति नहीं होनी चाहिए? एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या देश में सत्ता से असहमति और देश के विरुद्ध नियोजित षड्यंत्र में कोई अंतर परिभाषित नही होना चाहिए? असहमति के नाम पर मौलिक अधिकार क्या किसी प्रायोजित षड्यंत्र को आकार देने की अनुमति दे सकते हैं? दिल्ली उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने 133 पेज का जो निर्णय दिया, वह न्यायपालिका की प्रामाणिकता को कठघरे में खड़ा करता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे अचंभा भरा, लंबा और परिधि से परे निरुपित किया। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देश के बौद्धिक जगत और खासकर अंग्रेजी मीडिया में तीनों छात्रों की जमानत का यह आदेश तो चर्चा का केंद्रीय विषय बना, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को विमर्श में कोई जगह नहीं मिली। हाई कोर्ट के जमानत आदेश का सहारा लेकर ऐसा प्रचारित किया गया कि मोदी सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को देशद्रोही गतिविधियों के साथ घालमेल कर रही है।

दिल्ली दंगों में आरोपित तीन छात्रों की जमानत ट्रायल कोर्ट ने खारिज की थी

दिल्ली के कड़कडड़ूमा ट्रायल कोर्ट ने नताशा, देवांगना और आसिफ इकबाल की जमानत खारिज की थी। स्पेशल कोर्ट के न्यायाधीश ने चार्जशीट के आधार पर जो कुछ लिखा, उसे प्रकाश में लाना जरूरी है। उन्होंने आदेश में स्पष्ट किया था कि विघटनकारी चक्का जाम एक पूर्व-निर्धारित साजिश थी, जिसके परिणामस्वरूप दंगों में लोगों की मौत हुई, सैकड़ों घायल हुए और संपत्ति नष्ट हुई। इसके अलावा अदालत ने माना कि दिल्ली में हुर्ई ंहसा की शुरुआत सबसे पहले पुलिसकर्मियों पर हमला करने से हुई। न्यायालय ने यह टिप्पणी भी कीकि नागरिकता संशोधन कानून की आड़ में मुखर आंदोलन का उद्देश्य भारत के खिलाफ असंतोष पैदा करना था।

उच्च न्यायालय ने असहमति और आतंकी गतिविधियों की परिभाषा को एक कर दिया

चार्जशीट के अनुसार आसिफ इकबाल तन्हा ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सिम खरीदा, फिर उसका इस्तेमाल चक्का जाम, दंगे की योजना आदि में किया। इसी नंबर से वाट्सएप ग्रुप बनाए। बाद में यह सिम जामिया की छात्रा सफूरा जरगर को दे दिया। नताशा, देवांगना इस गिरोह के मास्टरमाइंड उमर खालिद, शर्जील इमाम के साथ शाहीन बाग के प्रदर्शन में सक्रिय रहीं। चार्जशीट में वाट्सएप ग्रुप्स की चैट्स भी प्रस्तुत हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे के समय जानबूझकर भारत सरकार को दुनियाभर में बदनाम करने की योजना की तस्दीक करतीं हैं। इन तथ्यों को दरकिनार कर दिल्ली उच्च न्यायालय ने जमानत देते समय असहमति और आतंकी गतिविधियों की परिभाषा को एक कर दिया। यानी एक तरफ असहमति और आतंकी गतिविधियों पर 133 पेज का दृष्टांत जारी किया जाता है और दूसरी तरफ असहमति के नाम पर दंगों की साजिश, भारत के विरुद्ध युद्ध को उचित मान लिया गया।

यह कैसी अभिव्यक्ति और असहमति की स्थापना

आखिर यह कैसी अभिव्यक्ति और असहमति की स्थापना दिल्ली उच्च न्यायालय करना चाहता है, जो हिंसा और दंगे की इजाजत देता है? यूएपीए कानून पर जिस तरह अनावश्यक निर्णय सुनाने का काम किया गया, वह अपने आप में एक खतरनाक घटनाक्रम है। जमानत देना एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक यही प्रचलित है कि जमानत देते समय प्रकरण की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की जाती। तीनों छात्रों को जमानत दी जाती तो किसी को आपत्ति नहीं होती, लेकिन जिस तरह ट्रायल कोर्ट के विश्लेषण को खारिज किया गया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या कोई अधीनस्थ न्यायालय हाई कोर्ट के ऐसे निर्णय के बाद ट्रायल को तथ्यों और साक्ष्य के आधार पर अंतिम निर्णय तक ले जा सकेगा? तब जबकि ट्रायल कोर्ट उच्च न्यायालय के अधीन रहते हुए काम करते हैं?

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बेहतर अवसर

एक बड़ा सवाल यह भी है कि जब ट्रायल कोर्ट के अपीलीय मामलों में हाई कोर्ट कड़ी निगरानी और समीक्षा कर सबंधित जजों के विरुद्ध कारवाई करता है, तब इस मामले में भी क्या सुप्रीम कोर्ट उच्च न्यायालय के आदेश की समीक्षा कर पाएगा? सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह बेहतर अवसर है। वह उच्च न्यायालयों की कार्यविधि को संवैधानिक जबाबदेही की सीमा में बांध सकता है। अभी हाई कोर्ट में जजों की जबाबदेही का कोई प्रविधान नहीं है, जबकि निचली अदालतें इन्हीं हाई कोर्ट के अधीन हैं। अगर हाई कोर्ट के जज गलत या अनधिकृत निर्णयन के दोषी होते हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट केवल चेतावनी देने या ट्रांसफर से आगे कुछ नहीं कर पाता है, क्योंकि उन्हें हटाने के लिए केवल महाभियोग का प्रविधान है, जो आज तक किसी जज के विरुद्ध अमल में नहीं लाया जा सका। दूसरी तरफ निचली अदालतों से प्रतिवर्ष दो दर्जन से अधिक जज निर्णयों की समीक्षा के नाम पर हाई कोर्ट द्वारा घर बिठा दिए जाते हैं।

( लेखक नीति विश्लेषक हैं )

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