कश्मीर में समस्या राजनीतिक या संवैधानिक न होकर मजहबी कट्टरपंथ है

अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद भी बिगड़े हालात यही बताते हैं कि कश्मीर में समस्या राजनीतिक या संवैधानिक न होकर मजहबी कट्टरपंथ है। जिहादी आतंकी कश्मीर में हिंदू और सिखों को निशाना बना रहे हैं। इस भय के कारण वे फिर से पलायन के लिए मजबूर हो सकते हैं।

Manish PandeySat, 09 Oct 2021 07:59 AM (IST)
कश्मीर में हर हाल में बचाना होगा अल्पसंख्यकों को।

 [दिव्य कुमार सोती] कश्मीर घाटी का त्रसद इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता दिख रहा है। जिहादी आतंकी कश्मीर में बचे-खुचे हिंदू और सिखों को निशाना बना रहे हैं। इससे उपजे भय के कारण वे फिर से पलायन के लिए मजबूर हो सकते हैं। गुरुवार को श्रीनगर के एक सरकारी स्कूल में सिख और हिंदू अध्यापकों को चिन्हित कर मौत के घाट उतार दिया गया। इससे पहले श्रीनगर के जाने-माने दवा विक्रेता मक्खन लाल बदरु की आतंकियों ने हत्या कर दी थी। आतंकियों ने दिहाड़ी कमाने वाले एक दलित वीरेंद्र पासवान को भी नहीं बख्शा, जो रोजी-रोटी के लिए कश्मीर आया था। इसी दिन मोहम्मद शफी लोन की भी इस शक में हत्या की गई कि वह सुरक्षा बलों की मदद करते हैं।

यह पहली बार नहीं जब कश्मीर में जिहादियों द्वारा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा हो। कश्मीरी हिंदूओं को मजहबी आतंकवाद के कारण वहां से करीब-करीब छह बार बड़े पैमाने पर पलायन करना पड़ा, जिसके बाद उनकी कभी वापसी भी नहीं हो पाई। आखिरी बड़ा पलायन जनवरी 1990 में हुआ था जब एक ओर जिहादी आतंकी कश्मीरी हिंदुओं की चुन-चुनकर हत्या कर रहे थे और उन्मादियों की हथियारबंद भीड़ मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से ‘हम क्या चाहते? निजाम-ए-मुस्तफा’, ‘रलीव, गलीव, चलीव’ (धर्म बदल लो, मारे जाओ या भाग जाओ) के एलान से कदमताल करती घूम रही थी। यह वह दौर था जब पाकिस्तानपरस्त जिहादियों ने अफगानिस्तान से तब की महाशक्ति सोवियत संघ को खदेड़ा था और कश्मीर में मौजूद इस्लामिक कट्टरपंथियों और रावलपिंडी में बैठे उनके आकाओं को लगता था कि आतंक के बल पर अगर सोवियत संघ को हराया जा सकता है तो भारत को हराना तो बाएं हाथ का खेल है। बहरहाल भारतीय सुरक्षा बलों ने पिछले तीस वर्षो में यह साबित किया कि आतंक के विरुद्ध लड़ाई में वह सोवियत और अमेरिकी फौजों से कहीं अधिक मजबूत है।

अफगानिस्तान से अमेरिकी पलायन और तालिबान के सत्तारूढ़ होने के बाद जिहादी तत्वों के नापाक मंसूबे फिर से परवान चढ़ रहे हैं। उसी का नतीजा कश्मीर में हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों की हत्याओं के रूप में सामने आ रहा है। इन हत्याओं के लिए पाकिस्तान और उसके समर्थित आतंकी संगठन तो जिम्मेदार हैं हीं, लेकिन उतने ही जिम्मेदार फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे संवैधानिक पदों पर रह चुके कश्मीरी मुस्लिम नेता भी हैं, जो तालिबानी उभार पर न सिर्फ सार्वजनिक रूप से खुशी जता चुके हैं, बल्कि भारत को यह धमकी भी दे रहे हैं कि जो अफगानिस्तान में हुआ, वह कश्मीर में भी होगा। वे उसी तालिबान के उदय से खुश हैं, जिसके नेता महमूद गजनवी की मजार पर जाकर सोमनाथ मंदिर पर उसके क्रूर हमले का महिमामंडन कर रहे हैं। यह कश्मीर के समाज और राजनीति का ऐसा नंगा सच है जिसे कश्मीरियत के ढकोसले की आड़ में ढकते रहना आतंकियों द्वारा मारे गए निदरेष लोगों के साथ छल होगा। कश्मीर का एक हिस्सा इस्लामिक कट्टरपंथ का गढ़ बन चुके अफगानिस्तान-पाकिस्तान से उठने वाले मजहबी उन्माद के ज्वार से प्रभावित होता है। इसकी परिणति कश्मीर में गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध हिंसा में होती है।

यह भी सही है कि कश्मीर में आतंकी अक्सर मुसलमानों को भी मारते हैं, लेकिन उसका कारण भी मजहबी होता है। ये आतंकी संगठन गैर-मुस्लिमों को काफिर और मुशरिक बताकर निशाना बनाते हैं। वहीं इस उन्माद से दूर सामान्य जीवन जी रहे मुसलमानों को मुनाफिक या ढोंगी बताकर मारते हैं। इस उन्माद का स्नेत पाकिस्तान का जिहादी तंत्र तो है ही, मगर समूचे कश्मीर में कुकुरमुत्ताें की तरह उग आया कट्टरपंथी मस्जिद-मदरसों का वह जाल भी है, जिन्हें अहले हदीसे और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन संचालित करते हैं, जो लश्कर और जैश जैसे संगठनों के वैचारिक जन्मदाता भी हैं। यही कारण है कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद भी हिंदू और सिखों के लिए स्थितियां नहीं सुधर पा रही हैं, क्योंकि कश्मीर राजनीतिक और संवैधानिक समस्या न होकर मजहबी कट्टरपंथ की समस्या बन चुका है। कश्मीर का समाज वैश्विक जिहादी कट्टरपंथ से अछूता नहीं है। इसीलिए वहां गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों का वही हाल हो रहा है जो सीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे इस्लामिक देशों में है। कश्मीर का मुस्लिम समाज पूरे भारत में कहीं भी स्वयं को सुरक्षित पाता है, परंतु कश्मीर के अंदर रहने वाले कश्मीरी पंडितों और सिखों को सुरक्षा नहीं दे पाता। अगर सरकार 30 साल से अपने घर-बार से उजड़े कश्मीरी पंडितों और सिखों को उनकी संपत्तियां वापस करना चाहती है तो मुख्यधारा के कश्मीरी नेता बवाल खड़ा करते हैं। ऐसा कर ये नेता कश्मीरी समाज में व्याप्त कट्टरपंथ को हवा ही दे रहे होते हैं। इस खुले मजहबी फासीवाद को कश्मीरियत और ‘कंपोजिट कल्चर’ जैसे शब्दाडंबरों से ढका जाता है। किसी आतंकी को हेडमास्टर का बेटा और किसी पत्थरबाज को बुनकर बताते हैं। हैरानी यही है कि ऐसा बताने वाले लोग कश्मीर के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों की हत्याओं पर चुप हैं। कश्मीरियत रूपी ढकोसले को समय-समय पर मीडिया में बेचने वाले कश्मीरी नेता भी मौन हैं। निदरेष गैर-मुस्लिमों की अंतिम यात्रओं से भी नदारद हैं।

हाल-फिलहाल अफगानिस्तान से लेकर कश्मीर तक जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह आने वाले दिनों में सामने आने वाली सुरक्षा चुनौतियों का ट्रेलर मात्र है। मौजूदा माहौल में कश्मीर में अल्पसंख्यक सहज तरीके से नहीं रह सकते। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो कश्मीर जल्द ही हिंदू-सिख विहीन होगा। हमें समझना होगा कि ऐसे आतंकवाद से तब तक प्रभावी तरह से नहीं निपटा जा सकता जब तक आतंकी और उन्मादी प्रवृत्ति को जन्म देने वाले वैचारिक प्रचार तंत्र पर प्रहार न किया जाए। ऐसा इसलिए, क्योंकि यही तंत्र लगातार नए आतंकियों को जन्म देता है और हिंसा समर्थक समाज गढ़ता है। निदरेष लोगों की हत्या आतंकियोंेके हाथों में मौजूद बंदूक और बम नहीं करते, बल्कि उनके दिमाग में भरा गया मजहबी कट्टरपंथ और दूसरे धर्मो के लोगों के प्रति घृणा का भाव कराता है।

(लेखक काउंसिल आफ स्ट्रेटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)

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