आखिर किसकी सियासी फसल की खाद हैं किसान, सभी कर रहे हैं अपना उल्‍लू सीधा

कृषि विधेयक पर मचा है सियासी घमासान
Publish Date:Tue, 22 Sep 2020 08:55 AM (IST) Author: Kamal Verma

विजय गुप्ता। केंद्र सरकार के कृषि विधेयकों के खिलाफ सबसे ज्यादा माहौल पंजाब में गरमाया हुआ है। किसान सड़क पर उतर चुके हैं, पंजाब बंद और रेल रोको आंदोलन की घोषणा कर चुके हैं। कृषि सुधार वास्तव में हैं क्या और उनसे नफा है या नुकसान, यह बात पीछे छोड़ हर सियासी दल 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए इस मुद्दे को अवसर मानते हुए किसानों के आंदोलन की आग में घी डालने पर उतर आया है। केंद्रीय मंत्री पद से हरसिमरत कौर बादल के इस्तीफे के बाद सूबे में मैं ही किसान हिमायती साबित करने की होड़ लग गई है।

इस बार तीस किसान संगठन विचारधारा से ऊपर उठकर, आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट हो गए हैं। मालवा के किसानों ने तो यह एलान कर दिया है कि इन विधेयकों का समर्थन करने वाले नेता को वे अपने गांवों में घुसने नहीं देंगे, वह चाहे जिस भी दल का हो। किसान संगठन अपने प्रदर्शनों में किसी राजनीतिक पार्टी के नेता को शामिल नहीं होने दे रहे हैं। किसान समझ चुका है कि उसे इस्तेमाल किया जा रहा है, सभी दल अपना उल्लू सीधा करने की फिराक में हैं। इसलिए अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे।

शिरोमणि अकाली दल के तो वोट बैंक की रीढ़ ही किसान हैं। यह दल किसानों की नाराजगी मोल लेने का कोई जोखिम नहीं उठा सकता। ऐसे में अब किसानों के इस आंदोलन को अकाली दल संजीवनी मान रहा है। वक्त की नजाकत देख अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल कह रहे हैं, हर अकाली किसान है, और हर किसान अकाली। हरसिमरत के इस्तीफे के बाद खुलकर व एकतरफा किसानों के समर्थन में आ जुटा अकाली दल चाहता है कि पंथक मोर्चे पर उसे लगा आघात कुछ कम हो। देहाती क्षेत्रों में नाराजगी कम हो। वही नाराजगी जो 2015 में उसके शासन में हुई बेअदबी की घटनाओं की वजह से उसकी करारी हार का सबब बनी थी।

इसके बावजूद अकाली दल का स्टैंड बहुत साफ नहीं है। हरसिमरत कौर बादल कहती हैं कि वे यह चाहती थीं कि इस विधेयक को लेकर किसानों की शंकाएं पहले दूर कर ली जातीं। दूसरी ओर उनके पति, सांसद एवं अकाली दल के अध्यक्ष साफ कहते हैं कि यह कानून किसानों और खेत मजदूरों को तबाह कर देगा। कांग्रेस तो उसे यह कहकर घेर ही रही है कि केवल मंत्रिमंडल से हटने से क्या होता है, राजग का हिस्सा तो वह है ही, जिसकी सरकार यह कानून ला रही है। वह उससे नाता तोड़े। राजग से हटने का फैसला लेना अकाली दल के लिए इतना आसान नहीं है।

पंजाब में भाजपा के साथ उसका गठबंधन राजनीतिक, भौगोलिक, धाíमक व सामाजिक संतुलन पर टिका हुआ है। वैसे दोनों दलों के भीतर अलग होने की बात जरूर उठती रही है। राजग में सुखबीर तेवर भी दिखाने लगे हैं। इससे पहले इसी साल जनवरी में केंद्र के नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध में पंजाब विधानसभा में लाए गए प्रस्ताव का भी अकाली दल ने समर्थन किया था, हालांकि पहले संसद में उसने इसके समर्थन में वोट किया था। हालांकि गठबंधन में दरार दिन-ब-दिन गहराती जा रही है, पर अभी टूट जैसे कोई संकेत नहीं हैं। विरोधी दल तो इसे दोनों का फ्रेंडली मैच करार दे रहे हैं।

इस हो हल्ले में हकीकत यही है कि सभी दल सांप निकल जाने पर लकीर पीट रहे हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह कह रहे हैं कि वह इन विधेयकों के खिलाफ अदालत जाएंगे, जबकि सुखबीर सिंह बादल ने राष्ट्रपति से मांग की है कि वह इन विधेयकों पर हस्ताक्षर न करें। जब कैबिनेट में रहते हुए अकाली दल अध्यादेश का विरोध नहीं कर पाया, संसद में विधेयक रुकवा नहीं पाया तो अब राष्ट्रपति को पत्र लिखकर रुकवाने की कवायद के क्या मायने?

भाजपा तो जैसे आग लगने पर कुआं खोदने जा रही है। जब किसान आंदोलित हो चुका है, तब योजना बनाई जा रही है कि केंद्र के कृषि सुधारों को प्रचारित किया जाए।

यह सूबे के भाजपा नेतृत्व के साथ-साथ उसके सहयोगी अकाली दल की भी नाकामी है कि वह किसानों की नब्ज पकड़ नहीं पाया। भाजपा को यही आस है कि अभी 2022 के चुनाव तक किसान को तीन फसलें लेनी हैं। केंद्र के दावों के अनुरूप नई व्यवस्था अगर कारगर साबित होती है, न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है तो किसान की धारणा बदल सकती है। लेकिन भाजपा तब भी शायद उसका फायदा न उठा पाए। कारण यह कि पंजाब में भाजपा शहरी इलाकों की पार्टी रही है और इस कानून से प्रभावित होने वाले आढ़ती उसका वोट बैंक माने जाते हैं।

(वरिष्ठ समाचार संपादक, पंजाब)

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