सुधारनी होगी पंचायती चुनाव प्रक्रिया: प्रधान की तर्ज पर जनता द्वारा कराया जाना चाहिए ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव

पंचायत चुनावों को राजनीतिक दलों के आधार पर नहीं लड़ा जाना चाहिए। वे इन चुनावों को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर धनबल बाहुबल और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग करते हैं। इससे चुनावों की निष्पक्षता और पारदर्शिता बुरी तरह प्रभावित होती है।

Bhupendra SinghMon, 26 Jul 2021 03:36 AM (IST)
जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुख के चुनाव जनादेश की अभिव्यक्ति नहीं करते

[ प्रो. रसाल सिंह ]: उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने हाल में कहा कि राज्य में अगली बार जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुख के चुनाव सीधे जनता द्वारा कराए जाएंगे। इस पर बाकी राज्यों को भी विचार करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि अभी जनता द्वारा चुने गए जिला पंचायत सदस्य और क्षेत्र पंचायत सदस्य क्रमश: जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुख का चुनाव करते हैं। इन चुनावों में धनबल और बाहुबल का अत्यधिक दुरुपयोग होता है। इनमें सत्तारूढ़ दल के पक्ष में शासन-प्रशासन की मशीनरी का भी बेजा इस्तेमाल होता है। इसलिए इन चुनावों के परिणाम वास्तविक जनादेश की अभिव्यक्ति नहीं करते। उप्र ही नहीं, बल्कि बंगाल, राजस्थान, बिहार, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा और जम्मू-कश्मीर आदि राज्य जहां भी त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू है, वहां कमोबेश यही कहानी है। सर्वविदित है कि सत्तारूढ़ दल ही इनमें से अधिकांश पदों पर जीत हासिल करते हैं।

जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुख के चुनाव जनादेश की अभिव्यक्ति नहीं करते

वर्ष 2015-16 में उप्र में तत्कालीन सत्तारूढ़ दल सपा ने जिला पंचायत अध्यक्ष की 75 सीटों में से कुल 63 सीटें और ब्लाक प्रमुख की 826 सीटों में से 623 सीटें जीतकर नया कीर्तिमान बनाया था। 2010 के चुनावों में सत्तारूढ़ बसपा ने भी लगभग यही किया था। 2021 के हालिया संपन्न चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा ने जिला पंचायत अध्यक्ष की 67 सीटें और ब्लाक प्रमुख की 648 सीटें जीतकर नया इतिहास रच दिया है। पंचायत चुनावों में इतनी शानदार जीत हासिल करने के बावजूद साल-डेढ़ साल के बाद हुए विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ दलों का हश्र बहुत बुरा हुआ। इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल नहीं है कि ये चुनाव वास्तविक जनादेश की अभिव्यक्ति नहीं करते।

1993 में 73वें संविधान संशोधन के तहत त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को मिला संवैधानिक दर्जा

देश में 24 अप्रैल, 1993 को 73वें संविधान संशोधन के परिणामस्वरूप त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ था। पंचायती राज व्यवस्था को लागू करने की सबसे बड़ी वजह गांधी जी की ग्राम स्वराज की अवधारणा थी। गांधी जी की लोकतंत्र की अवधारणा में शासन-प्रशासन का विकेंद्रीकरण अंतर्निहित है। उनके इसी सपने को साकार करने के लिए और लोकतंत्र और विकास को ऊपर से नीचे की जगह नीचे से ऊपर की ओर संभव करने के लिए पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई। इसमें ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत को शामिल किया गया।

प्रधान का प्रत्यक्ष चुनाव, ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का अप्रत्यक्ष चुनाव होता है

ग्राम पंचायत के अध्यक्ष अर्थात प्रधान या सरपंच का चुनाव तो ग्राम पंचायत के मतदाता प्रत्यक्ष मतदान के द्वारा करते हैं, किंतु क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष अर्थात ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष अर्थात जिला पंचायत प्रमुख का चुनाव जनता द्वारा चुने हुए सदस्य करते हैं। इस अप्रत्यक्ष चुनाव के कारण ही पंचायती राज व्यवस्था के दूसरे और तीसरे पायदान इतने दूषित और तमाम बुराइयों के उद्गम स्थल बन गए हैं।

सदस्यों की खरीद-फरोख्त में करोड़ों रुपये लगाकर चुनाव जीतकर विकास की जगह अपनी जेब भरते

क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत सदस्यों की क्रमश: ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में मतदान के अलावा कोई सक्रिय और व्यावहारिक भूमिका नहीं होती है। उनके पास कोई कार्यकारी शक्ति, बजट आदि भी नहीं होते हैं। इसलिए वे प्रमुख और अध्यक्ष के चुनाव में प्राय: अपने मत को एकमुश्त रकम लेकर बेच देते हैं। सदस्यों की खरीद-फरोख्त में करोड़ों रुपये लगाकर चुनाव जीते हुए प्रमुख और अध्यक्ष विकास की जगह अपने खर्च की भरपाई में जुट जाते हैं। इससे ये संस्थाएं भ्रष्टाचार के बड़े अड्डे बन जाती हैं।

विकास-राशि का बंदरबांट

ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का कोई प्रत्यक्ष निर्वाचक मंडल न होने से इनकी उसके प्रति जवाबदेही नगण्य होती है। इसलिए ये विकास-कार्यों के लिए आवंटित राशि का कहां, कितना और कैसा प्रयोग करते हैं, इसका जमीनी हिसाब-किताब न होकर कागजी लेखा-जोखा ही अधिक होता है। इस प्रकार विकास-राशि के बड़े हिस्से की बंदरबांट हो जाती है।

प्रधान की तर्ज पर ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव कराया जाना चाहिए

इस व्यवस्था में आंशिक परिवर्तन करके क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत सदस्यों के गैरजरूरी और बेवजह खर्चीले चुनाव से बचा जा सकता है। ग्राम पंचायत पंचायती राज व्यवस्था की वास्तविक रीढ़ है। प्रधान/सरपंच का चुनाव जनता सीधे करती है। उसके पास कार्यकारी अधिकार, वित्तीय शक्तियां और संसाधन होते हैं। उसका अपने निर्वाचकों के साथ सीधा संपर्क और उनके प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही भी होती है। इसी तर्ज पर क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव की जगह जनता द्वारा सीधे ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव कराया जाना चाहिए।

क्षेत्र पंचायत में ब्लाक के सभी प्रधान सदस्य हों, जिला पंचायत में सभी ब्लाक प्रमुख सदस्य हों

ब्लाक के सभी प्रधानों को क्षेत्र पंचायत का सदस्य बनाकर और जिले के सभी ब्लाक प्रमुखों को जिला पंचायत का सदस्य बनाकर क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत का गठन किया जा सकता है।

पंचायत चुनावों को राजनीतिक दलों के आधार पर नहीं लड़ा जाना चाहिए

इन चुनावों को राजनीतिक दलों के आधार पर नहीं लड़ा जाना चाहिए। वे इन चुनावों को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर धनबल, बाहुबल और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग करते हैं। इससे चुनावों की निष्पक्षता और पारदर्शिता बुरी तरह प्रभावित होती है। जब ये चुनाव भी ग्राम प्रधान की तरह गैर-राजनीतिक आधार पर होंगे और राजनीतिक दलों के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से मुक्त होंगे तो जमीनी स्तर पर जनता के बीच सक्रिय और लोकप्रिय नेताओं की नई पौध तैयार हो सकेगी।

ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव राजनीति में धनपशुओं और बाहुबलियों के प्रवेश-द्वार

दरअसल ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव राजनीति में धनपशुओं और बाहुबलियों के प्रवेश-द्वार हैं। वे अपने धनबल और बाहुबल से दलों को प्रभावित कर विधानसभा और लोकसभा के टिकट पर दावेदारी करते हैं। राजनीति के इन गंदे नालों को बंद करने या इनकी चुनाव-प्रक्रिया में तत्काल बदलाव करने की जरूरत है। ऐसा करके ही इन पंचायती राज संस्थाओं में जनता की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी और लक्षित परिणाम प्राप्त होने की संभावना भी बनेगी।

( लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता, छात्र कल्याण हैं ) 

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