संकट समाधान का हिस्सा बने विपक्ष: पहले विपक्ष संसद के विशेष सत्र की मांग कर रहा था, लेकिन अब दोनों सदनों को किए है ठप

कथित पेगासस जासूसी मामले पर भी सरकार ने बिना समय गंवाए संसद में बयान दे दिया लेकिन कांग्रेस विपक्ष का ‘स्वयंभू चौधरी’ बनने की चतुराई में लगी है। कांग्रेस विपक्षी दलों की सकारात्मक सोच को भी बंधक बनाना चाहती है।

Bhupendra SinghTue, 03 Aug 2021 03:38 AM (IST)
सत्र के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगाने वाला विपक्ष संसद में कामकाज एक दिन भी नहीं चलने दिया

[ मुख्तार अब्बास नकवी ]: विपक्ष एक बार फिर देश को निराश कर रहा है। पिछले छह महीने से संसद का सत्र बुलाने और कोरोना संकट सहित तमाम विषयों पर विस्तृत चर्चा की रट लगाने के बाद जब संसद का सत्र वास्तव में चल रहा है तो विपक्ष ने एक दिन भी कार्यवाही में शामिल होने की दिलचस्पी नहीं दिखाई। यही नहीं, विपक्षी नेताओं ने यह साफ कर दिया है कि उनकी ओर से यह पूरा सत्र वाशआउट यानी धुल चुका है। ऐसी गैर जिम्मेदाराना राजनीति में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस सबसे आगे है।

सरकार ने कहा था- कोरोना के दौरान संसद सत्र में लोगों का जुटना खतरे से खाली नहीं

मई की शुरुआत में लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने राष्ट्रपति से मांग की थी कि फौरन संसद का विशेष सत्र आहूत करें। तब कांग्रेस नेता ने कहा था कि सत्र बेहद आवश्यक है, क्योंकि सभी राज्यों से आने वाले तमाम सांसद अपने-अपने क्षेत्र में कोरोना संकट को लेकर उत्पन्न स्थिति के बारे में कुछ न कुछ कहना चाहते हैं। वे लोगों को कोरोना संकट से निजात दिलाने के लिए समाधान चाहते हैं। कांग्रेस के ‘नए मित्र’ शिवसेना के सांसद संजय राउत ने भी विशेष सत्र की मांग दोहराई थी। जब सरकार की ओर से यह आग्रह किया गया कि पूरा सरकारी तंत्र कोरोना की दूसरी लहर को काबू करने में जुटा है और संसद सत्र में लोगों का जुटना खतरे से खाली नहीं तो विपक्ष ने कई दिनों तक इस पर तीखी बयानबाजी की थी।

सत्र के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगाने वाला विपक्ष संसद में कामकाज एक दिन भी नहीं चलने दिया 

सत्र का आगाज हुए दो सप्ताह से ज्यादा का समय हो चुका है। जो विपक्ष कोरोना की दूसरी लहर में अप्रत्याशित संकटों के बीच सत्र के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगा रहा था उसने अब तक एक दिन भी कामकाज चलने नहीं दिया है। सत्र के पहले दिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में विपक्षी दलों के नेताओं को कोरोना के खिलाफ चल रही लड़ाई, सरकार के उपायों और भविष्य की तैयारियों का ब्योरा देने के लिए एक विशेष बैठक का आमंत्रण दिया तो कांग्रेस सहित कुछ और दलों के नेताओं ने कहा कि जब सत्र शुरू हो गया है तो अलग से बैठक क्यों? जो कहना है सरकार को संसद के पटल पर ही कहना चाहिए। इससे ही साबित हो गया था कि विपक्ष संसद सत्र को लेकर कितना गंभीर है? जबकि कोरोना पर सर्वदलीय बैठक का सुझाव भी कांग्रेस की तरफ से ही आया था।

संसद में हंगामा: राज्यसभा में एक मंत्री के हाथ से छीनकर कागज फाड़े गए

यह गंभीरता तब काफूर हो गई, जब पहले सप्ताह में ही ‘विद्वानों का सदन’ कहे जाने वाले राज्यसभा में एक वरिष्ठ मंत्री के हाथ से छीनकर कागज फाड़े गए। लोकसभा में तो स्थिति यहां तक पहुंच गई कि विपक्षी सदस्य अध्यक्ष पर कागज के टुकड़े फेंकने लगे। गैलरी में बैठे पत्रकारों की ओर भी कागज फाड़कर उछाले गए। वे सदन की कार्यवाही का ब्योरा नोट करने वाले अधिकारियों को भी प्रताड़ित करने से नहीं चूके।

पेगासस जासूसी कांड पर सरकार के मंत्री दे चुके दोनों सदनों में बयान

इन तमाम नाटकीय स्थितियों के लिए विपक्ष कथित पेगासस जासूसी कांड का सहारा ले रहा है। इस विवाद पर सरकार के संबंधित मंत्री दोनों सदनों में बयान दे चुके हैं। मुमकिन है विपक्ष उनके बयान से संतुष्ट न हुआ हो। अगर ऐसा था तो सबसे उत्तम फोरम राज्यसभा है, जहां नियमों के मुताबिक किसी भी मंत्री के बयान पर स्पष्टीकरण पूछने का प्रविधान है, लेकिन वहां तो विपक्ष का फोकस मंत्री के बयान को हंगामे में दबाने और फिर उनके हाथ से कागज छीनने में था।

विपक्ष की एकता का दावा खोखला

विपक्ष के अब तक रवैये से कुछ अहम सवाल खड़े होते हैं। क्या कोरोना पर संसद का आपात सत्र बुलाना सिर्फ सरकार का ध्यान भटकाने का पैंतरा था? अगर मंशा चर्चा की थी तो विपक्ष चर्चा के अलावा बाकी सब कुछ क्यों कर रहा है? क्या विपक्ष केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते देख बहस के उलटा पड़ने की आशंका से यू-टर्न ले रहा है या विपक्ष को डर है कि विस्तृत चर्चा हुई तो उसके मुख्यमंत्रियों की कलई खुल जाएगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी एकता का दम भर रहे नेता डर रहे हैं कि बिंदुवार चर्चा से यह कथित एकता तार-तार हो जाएगी? हालांकि विपक्ष की एकता का दावा कितना खोखला है, यह आए दिन उजागर हो रहा है। जब कांग्रेस बैठक बुलाती है तो तृणमूल के सांसद गायब रहते हैं और जब तृणमूल नेता क्षेत्रीय दलों से मिलते हैं तो कांग्रेस कन्नी काट लेती है।

विपक्ष कोरोना महामारी से लड़ने के बजाय सरकार का काम कर रहा बाधित

वास्तविकता यह है कि कोरोना के संकट काल में संकट के समाधान का हिस्सा बनने के बजाय कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दल सियासी व्यवधान का किस्सा गढ़ रहे हैं। वे एकजुट होकर इस महामारी से लड़ने के बजाय सरकार का काम बाधित कर रहे हैं। भयंकर बीमारी के बीच विशेष सत्र बुलाने का शिगूफा छेड़ने वाले अब संसद को एक ऐसे हवा-हवाई मुद्दे पर ठप किए बैठे हैं, जिस पर आम भारतीयों का न तो कोई ध्यान है और न ही दिलचस्पी। इससे पहले भी जनता के मूड को समझे बगैर इधर-उधर के मुद्दों पर बवाल करने की कीमत विपक्ष चुका चुका है। इस बार भी उसका यही हश्र होगा।

सरकार कोरोना महामारी, किसान, महंगाई जैसे मुद्दों पर चर्चा को तैयार

सरकार बार-बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि वह दोनों सदनों के नियमों, प्रविधानों तथा चेयरमैन एवं स्पीकर के दिशा-निर्देशों के तहत कोरोना महामारी, किसान, महंगाई और बाढ़ आदि तमाम ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा को तैयार है। कथित पेगासस जासूसी मामले पर भी सरकार ने बिना समय गंवाए संसद में बयान दे दिया, लेकिन कांग्रेस विपक्ष का ‘स्वयंभू चौधरी’ बनने की चतुराई में लगी है। कांग्रेस अपनी नकारात्मक सोच को संपूर्ण विपक्ष का फैसला बताकर उन विपक्षी दलों की सकारात्मक सोच को भी बंधक बनाना चाहती है, जो सदन में चर्चा और कार्य करने के पक्ष में हैं।

[ लेखक केंद्रीय मंत्री हैं ]

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