स्वाधीनता के 75 साल पूरे होने के बाद भी देश में एक समग्र संस्कृति नीति नहीं, जानिए क्या है इसके पीछे का प्रमुख कारण

कई राज्यों में संस्कृति नीति के नाम पर अलग अलग नियम आदि मिलते हैं पर वहां भी एक समग्र संस्कृति नीति की आवश्यकता है। हमारे पूरे देश की संस्कृति एक है। उस एक संस्कृति के विविध रूप हैं जो प्रदेशों और इलाकों में लक्षित किए जा सकते हैं।

Vinay Kumar TiwariSun, 25 Jul 2021 07:00 AM (IST)
संस्कृति को लेकर गंभीरता से विचार किया जाए और देशभर की एक संस्कृति नीति बनाई जाए।

नई दिल्ली, [अनंत विजय]। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संस्कृति को लेकर एक नई पहल की है। खबरों के मुताबिक संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव ने उनके सामने प्रदेश की प्रस्तावित संस्कृति नीति के प्रमुख बिंदुओं को रखा। प्रस्तावित संस्कृति नीति के बारे में योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को विषय से जुड़े विशेषज्ञों से बातचीत कर इसको तैयार करने का निर्देश दिया है। यह तो एक राज्य की बात है लेकिन अब समय आ गया है कि संस्कृति को लेकर गंभीरता से विचार किया जाए और देशभर की एक संस्कृति नीति बनाई जाए।

कई राज्यों में संस्कृति नीति के नाम पर अलग अलग नियम आदि मिलते हैं, पर वहां भी एक समग्र संस्कृति नीति की आवश्यकता है। हमारे पूरे देश की संस्कृति एक है। उस एक संस्कृति के विविध रूप हैं जो अलग अलग राज्यों से लेकर अलग प्रदेशों और इलाकों में लक्षित किए जा सकते हैं। स्वाधीनता के पचहत्तर साल पूरे होने जा रहे हैं और इतना समय बीत जाने के बाद भी देश में एक समग्र संस्कृति नीति नहीं है। समग्र संस्कृति नीति के अभाव में राज्यों से लेकर केंद्रीय स्तर पर अलग अलग संस्थाएं कार्यरत हैं। ऐसा लगता है कि जब जरूरत हुई तो संस्कृति से जुड़ी एक संस्था बना दी गई। इन संस्थाओं के कामों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करने पर कई विसंगतियां दिखती हैं।

सबसे बड़ी विसंगति तो यही है कि एक ही काम को अलग अलग संस्थाएं कर रही हैं। दिल्ली में केंद्र सरकार की संस्कृति से जुड़ी कई संस्थाएं काम करती हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, साहित्य अकादमी, नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र,गांधी स्मृति और दर्शन समिति, राष्ट्रीय संग्रहालय आदि हैं। इनके अलावा अगर हम संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी अन्य संस्थाओं को देखें तो इसमें सबसे बड़ा है क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र। पूरे देश में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र हैं। बुद्ध अध्ययन से जुड़ी चार संस्थाएं हैं। पांच पुस्तकालय हैं, सात संग्रहालय भी हैं।

उपरोक्त संस्थाओं के कामकाज पर नजर डालें तो एक ही काम अलग अलग संस्थाएं कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जो काम कर रही हैं उसमें से कुछ काम संगीत नाटक अकादमी भी कर रही है। नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट और ललित कला अकादमी के काम भी कई बार एक जैसे होते हैं। ये सब संस्थाएं जो काम कर रही हैं उनमें से कई काम क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी कर रहे हैं। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की असलियत तो कोरोना महामारी के दौरान खुल गई। उनके पास संबंधित इलाकों के कलाकारों की कोई सूची तक नहीं है।

पूर्व संस्कृति मंत्री लगातार ये कहते रहे कि कोरोना महामारी से प्रभावित कलाकारों की मदद के लिए क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र सूची तैयार कर रहे हैं। पर मदद तो दूर की बात आजतक सूची की जानकारी भी ज्ञात नहीं हो सकी। किसी भी कलाकार से बात करने पर पता चलता है कि इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों में कितना भ्रष्टाचार है और अगर सही तरीके से जांच हो जाए तो समूचा सच सामने आ जाएगा। ये सांस्कृतिक केंद्र जिन उद्देश्यों से बनाए गए थे वो अब पुनर्विचार की मांग करते हैं।

इसके अलावा राज्यों में कई तरह की अकादमियां हैं जो संस्कृति संरक्षण और उसको समृद्ध करने के काम में लगी हैं। मध्य प्रदेश में भी कला साहित्य और संगीत से जुड़ी कई संस्थाएं हैं।

मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी, आदिवासी लोक कला और बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय, साहित्य अकादमी भोपाल, कालिदास संस्कृत अकादमी, भारत भवन आदि। इन सबके क्रियाकलापों पर नजर डालने से कई बार एक ही तरह के काम कई संस्थाएं करती नजर आती हैं। इसी तरह से बिहार संगीत नाटक अकादमी, बिहार ललित कला अकादमी, भारतीय नृत्य कला मंदिर के अलावा ढेर सारी भाषाई अकादमियां हैं। इन दो राज्यों के के अलावा अन्य राज्यों का सांस्कृतिक परिदृश्य भी लगभग ऐसा ही है।

दरअसल कांग्रेस के लंबे शासनकाल के दौरान अपने लोगों को पद और प्रतिष्ठा देने-दिलाने के चक्कर में संस्थान खुलते चले गए। तर्क दिया गया कि विकेन्द्रीकरण से काम सुगमता से होगा लेकिन हुआ इसके उलट। कला-संस्कृति के प्रशासन के विकेन्द्रकरण ने अराजकता को बढ़ावा दिया। अब तो स्थिति ये है कि कला संस्कृति से जुड़ी ज्यादातर संस्थाएं आयोजन में लग गई हैं। ज्यादातर जगहों पर ठोस काम नहीं हो पा रहा है। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य कला और संस्कृति से जुड़ी ज्यादातर संस्थाएं इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में तब्दील हो गई हैं। वो आयोजन करके ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं।

वर्तमान परिदृश्य में अब यह बेहद आवश्यक हो गया है कि पूरे देश के लिए एक समग्र संस्कृति नीति बने और उसके आधार पर संस्थाओं का पुनर्गठन हो। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहल होनी चाहिए। नीति आयोग इस बारे में संस्कृति के जानकारों, प्रशासकों के साथ मंथन करे और इस संबंध में सरकार को अपना सुझाव भेजें। बेहतर हो कि एक राष्ट्रीय कला केंद्र बने और उसके अंतर्गत अलग अलग विधाओं और क्षेत्रों की शाखाओं का गठन हो। प्रशासनिक कमान एक जगह रहने से कामों में दोहराव से बचा जा सकेगा, ठोस काम हो सकेगा और करदाताओं के पैसे की बर्बादी रुकेगी।

इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सभी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का विलय हो जाना चाहिए ताकि एक समग्र नीति पर लोककलाओं से लेकर अन्य कलाओं को समृद्ध करने का कार्य आरंभ हो। ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, कथक केंद्र को भी प्रस्तावित राष्ट्रीय कला केंद्र का हिस्सा बना देना चाहिए। इन संस्थाओं में लगभग एक जैसे काम होते हैं। उनको कला केंद्र का हिस्सा बनाकर सीमित स्वायत्ता देने पर भी विचार किया जा सकता है ताकि वो अपने स्तर पर कामों को प्रस्तावित कर सकें लेकिन प्रशासन का एकीकृत कमांड हो।

जितने भी संग्रहालय हैं उनको किसी एक संस्था के अधीन करके उसका प्रशासनिक दायित्व नियोजित किया जा सकता है। इनको देखनेवाली संस्था का दायित्व हो कि वो समग्र संस्कृति नीति के अनुसार इनके कामकाज को तय करे और फिर उसका उचित क्रियान्यवन सुनिश्चित करे। इसी तरह से नाटक और नाट्य प्रशिक्षण से जुड़ी संस्थाओं को पुनर्गठित करके उसको ज्यादा मजबूती प्रदान की जा सकती है। नृत्य आदि रूपकंर कला से जुड़ी सभी संस्थाओं को भी कला केंद्र में समाहित करके नया और क्रियाशील स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। सूचना और प्रसाऱण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत विभिन्न संस्थाओं के पुनर्गठन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। उसी मॉडल पर संस्कृति मंत्रालय में भी काम किया जा सकता है लेकिन यहां के लिए आवश्यक ये होगा कि पहले एक समग्र संस्कृति नीति बने। ये नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को भी आसान कर सकती है।

नई शिक्षा नीति ये मानती है कि कला के माध्यम से संस्कृति का प्रसार हो सकता है और इसके लिए उसमें कई बिंदु सुझाए गए हैं। शिक्षा नीति में संविधान में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी के गठन का भी प्रस्ताव है। इसको साहित्य अकादमी के कार्यक्षेत्र का विस्तार करके आसानी से किया जा सकता है। भाषा और उससे जुड़े विषयों की संस्थाओं को साहित्य अकादमी के अंतर्गत लाकर बेहतर तरीके से काम हो सकता है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार संस्कृति मंत्रालय में एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री पदस्थापित किए गए हैं। इससे इस बात का संकेत तो मिलता ही है कि प्रधानमंत्री का फोकस संस्कृति की ओर है।

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