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भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों से संरक्षित माफिया संस्कृति सभ्य समाज के खिलाफ, लोकतंत्र और विकास विरोधी भी

[ संजय गुप्त ]: कुख्यात अपराधी विकास दुबे के मामले में जिसका अंदेशा था वही हुआ। उसे मुठभेड़ में मार गिराया गया। यह ठीक है कि उसके आतंक से पीड़ित-प्रताड़ित लोगों के साथ अन्य तमाम भी खुश हैं, लेकिन क्या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में माफिया तत्वों के सफाए का यही उचित तरीका है? कहीं विकास दुबे इसलिए तो नहीं मारा गया कि वह नेता-नौकरशाह-माफिया गठजोड़ के राज न उगल दे?

आठ पुलिस वालों की हत्या के पहले तक विकास दुबे को कोई जानता तक नहीं था

जो भी हो, विकास दुबे और उसके साथियों की ओर से आठ पुलिस वालों की हत्या के पहले तक उसे कोई नहीं जानता था, जबकि उसकी माफिया की छवि करीब 20 साल पहले तभी बन गई थी जब उसने थाने में घुसकर हत्या की थी। आश्चर्यजनक रूप से वह इस मामले से बरी हो गया। इसके बाद इलाके में उसकी तूती बोलने लगी और वह सभी राजनीतिक दलों के नेताओं का खुला संरक्षण पाने लगा। इसी बल पर वह लंबे समय तक अपने गांव का प्रधान और जिला पंचायत सदस्य रहा। उसकी पत्नी ने भी सपा के समर्थन से जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा। उसे केवल विभिन्न दलों के नेताओं का ही समर्थन नहीं मिला, बल्कि भ्रष्ट पुलिस वाले भी उसके संरक्षक बने।

पुलिस टीम पर विकास दुबे और उसके साथियों ने हमला किया, जिसमें आठ पुलिस कर्मी बलिदान हो गए

बीते दिनों उसे यह सूचना कुछ पुलिस वालों ने ही दी कि पुलिस की एक टीम उसके घर आ रही है। इसी पुलिस टीम पर विकास दुबे और उसके साथियों ने घात लगाकर हमला किया, जिसमें डिप्टी एसपी समेत आठ पुलिस कर्मी बलिदान हो गए।

माफिया बन गए विकास दुबे को पुलिस अधिकारियों का समर्थन हासिल था

यह स्पष्ट है कि माफिया बन गए विकास दुबे को उच्च स्तर के पुलिस अधिकारियों का भी समर्थन हासिल था, क्योंकि उसका नाम न तो गैंगस्टर की सूची में शामिल हो पाया और न ही भू माफिया की सूची में। यह तब था जब उस पर हत्या के साथ जमीन कब्जाने के भी तमाम संगीन आरोप थे। वह केवल खूंखार हत्यारा ही नहीं, भू माफिया भी था। इलाके के लोग उसके आतंक से त्रस्त थे, फिर भी वह जेल से बाहर था। आखिर बिना संरक्षण के यह कैसे संभव है? इसी संरक्षण के दम पर वह इतनी बड़ी वारदात अंजाम देकर कानपुर से फरीदाबाद और फिर वहां से उज्जैन जाने में सफल रहा।

पुलिस का खुफिया तंत्र निष्प्रभावी रहा और उसके मददगार उसे उज्जैन पहुंचाने में सफल रहे

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि पुलिस का खुफिया तंत्र निष्प्रभावी रहा और उसके मददगार उसे फरीदाबाद, उज्जैन पहुंचाने में सफल रहे? वहां से गिरफ्तार कर लाए जाते समय वह एनकाउंटर में मारा गया। पुलिस एनकाउंटर नई बात नहीं हैं। देश में आए दिन एनकाउंटर होते रहते हैं।

एनकाउंटर की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, एनकाउंटर त्वरित न्याय का विकल्प नहीं हो सकता

चूंकि एनकाउंटर में बड़े और शातिर अपराधी मारे जाते हैं इसलिए उनके आतंक से त्रस्त लोगों को सुकून मिलता है और पुलिस का भी सिरदर्द कम होता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इससे अपराधियों का मनोबल टूटता है। यदि ऐसा होता तो दुबे का माफिया के रूप में उभार ही क्यों होता? एनकाउंटर त्वरित न्याय का विकल्प नहीं हो सकता। न्याय का तकाजा है कि अपराधी न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा पाएं, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा और इसी कारण एनकाउंटर की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

एनकाउंटर की बड़ी वजह: कुख्यात बदमाशों के खिलाफ सुबूत नहीं मिलते

एनकाउंटर की बड़ी वजह यह है कि आम तौर पर कुख्यात बदमाशों के खिलाफ सुबूत नहीं मिलते, लेकिन इसके लिए पुलिस की कार्यप्रणाली के साथ कानूनी तौर-तरीके और खासकर लचर भारतीय दंड संहिता (आइपीसी), साक्ष्य अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) जिम्मेदार है। क्या यह किसी से छिपा है कि इन संहिताओं की कमजोरी का लाभ अपराधी और माफिया तत्व उठा रहे हैं? आखिर इनमें सुधार में देरी क्यों?

विकास दुबे ने थाने में की मंत्री की हत्या, पुलिस वालों ने उसके खिलाफ नहीं दी गवाही

हम इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि विकास दुबे ने थाने में पुलिस वालों की मौजूदगी में मंत्री की हत्या की, लेकिन उनमें से किसी ने उसके खिलाफ गवाही नहीं दी। क्या इन पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी? कायदे से तो तत्कालीन सरकार को विकास दुबे को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ अपील करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

पुलिस और नेताओं की दिलचस्पी विकास दुबे को बचाने में रही

कोई भी समझ सकता है कि शासन-प्रशासन की ओर से यह अनदेखी इसीलिए हुई, क्योंकि संबंधित पुलिस वालों के साथ-साथ नेताओं की भी दिलचस्पी विकास दुबे को बचाने में रही। ऐसी दिलचस्पी के मामले केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, अन्य राज्यों में भी देखने को मिलते हैं और इसीलिए देश भर में किस्म-किस्म के माफिया सक्रिय बने रहते हैं।

राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण ही माफिया संस्कृति पनप रही

राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण ही माफिया संस्कृति पनप रही है। यह संस्कृति सभ्य समाज के खिलाफ ही नहीं, लोकतंत्र और विकास विरोधी भी है। देश में कई हिस्सों में अपेक्षित विकास न हो पाने की एक बड़ी वजह कानून एवं व्यवस्था की खराब हालत ही है। ऐसे इलाकों में उद्योग-धंधे लगाने वालों को सबसे पहले वहां सक्रिय माफिया की उगाही का सामना करना पड़ता है।

माफिया तत्वों के खिलाफ कार्रवाई होने के बजाय संरक्षण मिलता है

चूंकि इस उगाही से भ्रष्ट नेता और नौकरशाह भी हिस्सा पाते हैं इसलिए माफिया तत्वों के खिलाफ कार्रवाई होने के बजाय उन्हें संरक्षण मिलता है। यह संरक्षण पाकर माफिया तत्व जमीन कब्जाते हैं, कालाबाजारी में लिप्त होते हैं, विरोधियों की हत्या करते हैं और अपहरण एवं लूट का भी काम करते हैं। अधिकतर अवैध कॉलोनियां भी उनकी ओर से बसाई जाती हैं, जो दबंग या अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं? ज्यादातर ऐसे ही तत्व नेताओं के लिए भीड़ जुटाने का काम करते हैं।

माफिया छवि वाले या फिर संगीन मामलों के आरोपी विधानमंडलों में नजर आ रहे हैं

समय के साथ इन्हीं तत्वों के बीच से कुछ खुद को ठेकेदार, शराब व्यवसायी या फिर बिल्डर के रूप में तब्दील कर लेते हैं। अब तो वे पंचायत प्रमुख और यहां तक कि विधायक, सांसद भी बनने लगे हैं। आज देश में तमाम माफिया छवि वाले या फिर संगीन मामलों के आरोपी विधानमंडलों में नजर आ रहे हैं। आखिर देश में बालू, शराब, वन उपज आदि के अधिकतर ठेके माफिया किस्म के लोग ही क्यों पाते हैं?

भ्रष्ट नेता और नौकरशाह माफियागीरी को बढ़ावा देने में अपना हित समझते हैं

चूंकि भ्रष्ट नेता और नौकरशाहों को ऐसे तत्वों को संरक्षण देकर खुद कमाई का मौका मिलता है तो वे माफियागीरी को बढ़ावा देने में ही अपना हित समझते हैं। इस संस्कृति को समाप्त करने के लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि कारगर नियम-कानून भी चाहिए। जिन धंधों में नकदी और कालेधन की भूमिका साफ दिखती है उनमें सुधार करके भी माफिया संस्कृति पर लगाम लगाई जा सकती है।

योगी सरकार माफिया तत्वों के खिलाफ गंभीर

यह अच्छा है कि योगी सरकार माफिया तत्वों के खिलाफ गंभीर है और वह दुबे सरीखे कुख्यात अपराधियों की संपत्ति जब्त करने के कठोर कदम उठा रही है, लेकिन जरूरत सक्षम नियम-कानूनों की भी है ताकि देश में कहीं भी भ्रष्ट नेताओं-नौकरशाहों से संरक्षित कोई अपराधी शासन की निगाह से बचने न पाए।

[ लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संंपादक हैं ]

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