राजनीति के आगे मशाल लेकर चलता साहित्य, आम आदमी की बने आवाज

यदि राजनीति मनुष्य की समस्याओं से जान-बूझकर आंखें मूंदे है तब साहित्य तो उनकी बात को आगे बढ़ा सकता है। ऐसा लगता है कि तमाम रचनाएं किसी फैक्ट्री में तैयार हो रही हैं। जहां इस राजनेता या उस राजनेता को देवता साबित करने की होड़ लगी रहती है।

Manish PandeySat, 09 Oct 2021 08:27 AM (IST)
इन दिनों राजनीति के पीछे रचनात्मकता दौड़ लगाती है

 [क्षमा शर्मा] कहा तो यह जाता है कि साहित्य राजनीति के आगे मशाल लेकर चलता है यानी राजनीति को राह दिखाता है। जहां राजनीति डगमगाए, वहां उसका तारणहार बनता है, लेकिन अर्से से महसूस हो रहा है कि इन दिनों राजनीति के पीछे रचनात्मकता दौड़ लगाती है। राजनीति अपने-अपने वोटों के जुगाड़ के लिए जो विमर्श तय कर देती है, सब उसी के पीछे दौड़ लेते हैं। वे साहित्य में भी अपनी जगह बना लेते हैं। इससे होता यह है कि जिसे नयापन या मौलिकता कहते हैं, वह गायब हो जाती है। इंटरनेट मीडिया के इस युग में जब दो-चार सौ पृष्ठ की पुस्तक पढ़ने के लिए बहुत धैर्य चाहिए, तब ऐसे में बहुत-सी रचनाएं ऐसी नजर आती हैं, जिनमें इन दिनों के चालू विमर्शो के आधार आप शुरू से ही देख सकते हैं। जब शुरुआत से ही पता चल जाए कि हार-जीत लिंग, धर्म, जाति के आधार पर तय होने लगे तो ऐसे में उन्हें पढ़ने की दिलचस्पी नहीं जगती। विमर्शवादी अक्सर हाय बचाओ चिल्ताते आते हैं, अपने प्रति सहानुभूति जगाते हैं और समाज में अपना स्थान बनाते हैं, लेकिन जिस सहानुभूति की लहर से उन्होंने लोगों के मन में जगह बनाई होती है, उसी को पीटते हैं। वे असहमत होने के अधिकार की मांग करते हैं, लेकिन उनसे अगर आप जरा सा असहमत हुए तो वे आपको हर तरह से लांछित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। पक्ष-विपक्ष की राजनीति ने इस तरह के स्टीरियोटाइप बना दिए हैं कि अगर आप इनसे हटकर कुछ लिखना चाहें तो लिख ही नहीं सकते। हद तो यह है कि आजकल किसी के सरनेम से उसके लिखे की अच्छाई-बुराई तय कर दी जाती है। इंटरनेट मीडिया का भी इसमें भारी योगदान है। यह चलन किसी भी लिहाज से सही नहीं।

क्या किसी जेंडर, जाति और धर्म भर से किसी की अच्छाई-बुराई तय हो सकती है? अच्छाई-बुराई, झूठ-सच मनुष्य की सहज प्रकृति है। इसीलिए हर जाति-धर्म, लिंग में अच्छे-बुरे हो सकते हैं, लेकिन किसी को देवत्व और किसी को जन्म के आधार पर खलनायक की उपाधि आखिर रचनात्मकता का क्या भला करती है? विमर्शो ने वर्गो को बिल्कुल भुला दिया है। हम जानते हैं कि गरीब और साधनहीन की न कोई जाति होती है और न ही धर्म। वह बस गरीब होता है और संसार से दुत्कार ही पाता है। कुछ फामरूले तय कर लिए गए हैं। यदि उस फ्रेम में रचना है तो उसे बिना पढ़े ही मात्र सुनने के आधार पर कई बार महान कहा जा सकता है। इस संदर्भ में पिछली सदी का आठवां और नौवां दशक याद आता है। उन दिनों अच्छी कहानी, कविता, नाटक और फिल्म आदि की पहचान इस रूप में थी कि हर हाल में मेहनतकश वर्ग की जीत होनी चाहिए। उस दौर में यदि इससे इतर कोई रचना लिखी जाती थी तो उसे बेकार मान लिया जाता था।

दिलचस्प यह है कि रचनाओं में तो हर हाल में मेहनतकश वर्ग जीतता रहा, लेकिन जमीनी हकीकत में उलटा हुआ। पिछली सदी के अंतिम दशक से निजीकरण की जो लहर चली, उसने जमीनी हकीकत को इस तरह से बदला कि मेहनतकश वर्ग के मामूली अधिकार तक न बचे। काम के निश्चित घंटे, जिन्हें मेहनतकश वर्ग ने काफी संघर्षो और बलिदान के बाद पाया था, उनका कहीं अता-पता नहीं है। न ही अब पक्की नौकरियां बची हैं। इसीलिए आज उस तरह की रचनाएं अगर कोई लिखे भी, तो कहा जा सकता है कि वे समाज में जो हो रहा है, राजनीति जो कर रही है, उससे कोसों दूर हैं। अफसोस यह भी है कि इस तरह के सवालों को बिल्कुल भुला दिया गया है।

पहले मेहनतकश वर्गो के अधिकार जब छीने जाते थे तो उसे शोषण कहा जाता था, अब इन्हें सुधार कहा जाता है। हां नाम जरूर सब जनसेवा का लेते हैं। एक अजीब सी बात पिछली सदी के अंतिम दशक में यह चली कि जो लोग गांवों के बारे में लिखते हैं, वे महान होते हैं और जो शहरों के बारे में वे बस यों ही। जैसे शहरों में न तो गरीब होते हैं, न उनकी कोई मुश्किलें। अब तो 21वीं सदी के इस दौर में और यहां तक कि पिछले ही साल हमने ऐसे लाखों गरीबों को महानगरों से अपने-अपने गांवों की तरफ दौड़ते देखा था। इसके अलावा मध्यवर्ग के जो लोग जैसे-तैसे पढ़ते-लिखते हैं, नौकरी पाते हैं, अपना घर-परिवार चलाते हैं, नौकरी पर लटकती तलवार को हर वक्त ङोलते हैं, सरकारों को टैक्स देते हैं और सरकारें इसी टैक्स से अपने वोटों के लिए न जाने क्या-क्या करती हैं, मुफ्त बहुत कुछ बांटती हैं, मुआवजे लुटाती हैं, उनकी जेब पर हमेशा कैंची चलाती रहती हैं।

इस मध्यवर्ग की जैसे कोई समस्या ही नहीं होती। ऐसा कैसे मान लिया गया है कि यह वर्ग निकम्मा ही नहीं होता, बल्कि चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होता है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत होता है। कम से कम साहित्य में तो इनकी आवाजें भी सुनाई देनी चाहिए, क्योंकि यदि राजनीति मनुष्य की समस्याओं से जान-बूझकर आंखें मूंदे है तो साहित्य और रचनाएं तो इनकी बात कह सकते हैं। तभी वे सच्ची मशाल भी बन सकते हैं। चर्चित होने के जो बहुत सरल से नुस्खे निकाल लिए गए हैं, जहां बहुत से पात्र हिंदी फिल्मों के चालू नुस्खों की तरह नजर आते हैं, उनसे कैसे बचा जाए, यह भी सोचने की बात है। वरना तो रचनात्मकता इसी तरह राजनीतिज्ञों द्वारा तय किए गए बोझ से कराहती रहेगी। नेता शायद ही इसे बचा पाएंगे। कहीं अब भी तो ऐसा नहीं होगा कि जो लोग रचनाओं में जीत रहे हैं, भविष्य उनके खिलाफ खड़ा हो। कई बार तो ऐसा लगता है कि तमाम रचनाएं किसी फैक्ट्री में तैयार हो रही हैं। जहां इस राजनेता या उस राजनेता को देवता साबित करने की होड़ लगी रहती है।

(लेखिका साहित्यकार हैं)

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