राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगी भाषाई कड़ी: एनईपी अन्य राज्यों की भाषा-संस्कृति सीखने का देगा अवसर

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधान अन्य राज्यों की भाषा-संस्कृति सीखने का अवसर देंगे।

चीन से पार पाने के लिए जरूरी है कि इसकी भाषा-संस्कृति को हम भलीभांति जानें। ऐसे में भाषाई नीतिकारों को सुधार करते हुए चीनी भाषा मंदारिन को भी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जोड़ लेना चाहिए। सुझावों को अपनाना लाभकारी होगा।

Publish Date:Fri, 27 Nov 2020 11:14 PM (IST) Author: Bhupendra Singh

[ प्रो. निरंजन कुमार ]: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संरक्षण और शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के मार्गदर्शन में बनी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में एक दूरदर्शी विजन पत्र है। चाहे रोजगार का प्रश्न हो या सामाजिक न्याय का, शोध-अनुसंधान का विषय हो या भारतीय भाषाओं का, एनईपी की दूरगामी सिफारिशों के क्रियान्वयन की दिशा में मंथन शुरू हो गया है। भाषाओं के लिए भी एनईपी में कई अहम सिफारिशें हैं, पर साथ ही कुछ मामलों में पुर्निवचार की भी दरकार है।

भारतीय भाषाओं पर जोर देना नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की बड़ी विशेषता

भारतीय भाषाओं पर जोर एनईपी की एक बड़ी विशेषता है। इसके मूलभूत सिद्धांतों में ही ‘बहुभाषिकता और अध्ययन-अध्यापन में भाषा की शक्ति को प्रोत्साहन’ देना शामिल है। इसी सिद्धांत के मद्देनजर स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में ‘भारतीय भाषाओं के अध्यापन’ के साथ-साथ ‘भारतीय भाषाओं में अध्यापन’ पर बल दिया गया है। इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण अनुशंसा है कि पांचवीं तक की पढ़ाई मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा में होगी, जिसे आठवीं तक भी बढ़ाया जा सकता है। यह शैक्षणिक मनोविज्ञान के इस सिद्धांत के अनुरूप है कि मातृभाषा में सीखना आसान होता है। दुनिया के विकसित देशों में स्कूली शिक्षा से लेकर उच्चतर शिक्षा मातृभाषा या स्थानीय भाषा में ही होती है। आम जनता की भाषिक स्थिति को समझते हुए एनईपी भी उच्चतर शिक्षा के पाठ्यक्रमों को भारतीय भाषाओं में अथवा द्विभाषी रूप से पढ़ाए जाने की वकालत करती है। एनईपी में विभिन्न भाषाओं की अकादमी स्थापना का भी प्रावधान है। उपरोक्त बिंदु भारतीय भाषाओं तथा संस्कृति दोनों की मजबूती की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र का भी उल्लेख है

भारतीय भाषाओं एवं बहुभाषिकता पर जोर देते हुए एनईपी में त्रिभाषा सूत्र का भी उल्लेख है, लेकिन प्रस्तावित त्रिभाषा सूत्र पूर्ववर्ती त्रिभाषा सूत्र से थोड़ा भिन्न है। पूर्व में हिंदी प्रदेशों में स्कूली स्तर पर अंग्रेजी, हिंदी एवं एक ‘अन्य भारतीय भाषा’ और गैर-हिंदी भाषी प्रदेशों में अंग्रेजी, उस राज्य की प्रमुख क्षेत्रीय भाषा और हिंदी पढ़ाने का प्रावधान था, पर तमिलनाडु आदि राज्यों में इस पर विवाद के बाद थोड़ा लचीला रुख अपनाते हुए अब कम से कम दो भारतीय भाषाएं पढ़ाई जाएंगी। हालांकि यहां किसी भी भाषा का उल्लेख नहीं है। व्यावहारिक रूप में होगा यह कि अधिकांश गैर-हिंदी राज्यों में अंग्रेजी के अलावा उस राज्य की क्षेत्रीय भाषा और अन्य भारतीय भाषा के रूप में कोई एक भाषा अपनाई जाएगी।

हिंदी भाषी लोग अन्य भारतीय भाषाएं नहीं सीखते, यह राष्ट्रीय एकता के लिए ठीक नहीं 

अधिक संभावना है कि यह तीसरी भाषा सामान्यतया हिंदी ही होगी। हिंदी प्रदेशों में अंग्रेजी, हिंदी और एक अन्य भारतीय भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ाई जाएगी जैसा कि अभी भी हो रहा है, लेकिन यह स्थिति उचित नहीं कि हिंदी भाषी राज्यों के छात्र हिंदी प्रदेशों की भाषाएं सीखने को कभी अग्रसर ही न हों। इससे तमिलनाडु आदि राज्यों का यह आरोप कायम रहेगा कि हिंदी भाषी लोग हिंदी से इतर अन्य भारतीय भाषाएं नहीं सीखते। यह राष्ट्रीय एकता की भावना के लिए ठीक नहीं। त्रिभाषा नीति में दोनों भारतीय भाषाओं में केवल ‘आधुनिक भारतीय भाषाएं’ ही होनी चाहिए। तब यह होगा कि हिंदीतर राज्यों में संपर्क भाषा और संघ सरकार की राजभाषा हिंदी स्वाभाविक रूप से प्रथम विकल्प रहेगी ही, उधर हिंदी प्रदेश संस्कृत की जगह हिंदीतर राज्यों की कोई भाषा अपनाएंगे। एनईपी-1968, एनईपी-1986 आदि के त्रिभाषा फॉर्मूले में यही सोच थी कि हिंदी भाषी राज्य तीसरी भाषा के रूप में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं खासतौर से द्रविड़ भाषा परिवार की कोई भाषा सीखेंगे। अतीत में हिंदी प्रदेशों में तीसरी भाषा के रूप में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को न पढ़ाने का एक कारण इनके शिक्षकों की समस्या भी थी, पर मौजूदा तकनीकी दौर में इस समस्या का हल बहुत सरल हो गया है।

ऑनलाइन शिक्षण में भाषाओं का पठन-पाठन कठिन नहीं होगा 

ऑनलाइन शिक्षण में इन भाषाओं का पठन-पाठन कठिन नहीं होगा। इसमें शिक्षा मंत्रालय की वेबसाइट ‘स्वयम’ और टेलीविजन चैनल ‘स्वयंप्रभा’ भी मददगार हो सकते हैं। एनईपी के आधारभूत सिद्धांतों में ‘अध्ययन-अध्यापन और भाषा संबंधी बाधाओं को दूर करने में तकनीक के यथासंभव उपयोग’ की वकालत की गई है। इस कदम से हमारे हिंदी प्रदेशों के नौनिहालों को अन्य राज्यों की भाषा-संस्कृति सीखने का मौका मिलेगा ही, यह राष्ट्रीय एकता के भाव को भी बहुत मजबूत करेगा। इसके अलावा हिंदीतर भाषियों के इस भय का निराकरण भी हो सकेगा कि उनकी भाषा लुप्त होती जाएगी और हिंदी का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा। इससे संकीर्ण राजनेताओं को भाषाई राजनीति भड़काने का मौका भी नहीं मिल पाएगा।

भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी संस्कृत का ज्ञान आवश्यक

रही बात संस्कृत की तो समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी संस्कृत का ज्ञान भारतीय संस्कृति को समझने के लिए नि:संदेह आवश्यक है। एनईपी के अध्याय चार में उल्लिखित है कि स्कूलों में न केवल छठी क्लास से शुरू कर कम से कम दो साल के लिए संस्कृत या शास्त्रीय भाषाओं का अध्ययन कराया जाएगा, बल्कि उच्चतर शिक्षा में भी संस्कृत के महत्व को पहचाना गया है। भाषा संबंधी एक अन्य प्रावधान जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है, वह विदेशी भाषाओं के अध्ययन से जुड़ा है। एनईपी में कहा गया है कि छात्रों में एक वैश्विक दृष्टि विकसित करने के लिए माध्यमिक स्तर पर विदेशी भाषाओं का भी अध्ययन कराया जाएगा, लेकिन समस्या यह है कि इसमें चीन की भाषा मंदारिन को छोड़ दिया गया है।

'अपने दोस्तों को करीब और दुश्मनों को और भी ज्यादा करीब रखें’

राष्ट्रहित में हमें चीनी कूटनीतिज्ञ सुन जू की ही इस नीति को नहीं भूलना चाहिए कि ‘अपने दोस्तों को करीब और दुश्मनों को और भी ज्यादा करीब रखें’। अर्थात शत्रु से निपटना हो तो उसके बारे में हर जानकारी रखो यानी उसके समाज, संस्कृति और सामूहिक मानस की ठीक-ठाक समझ होनी चाहिए।

चीनी भाषा मंदारिन को भी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जोड़ लेना चाहिए

ध्यातव्य है कि अमेरिका में जब 11 सितंबर, 2001 को आतंकवादियों ने हमला किया था और उनका खौफ दुनिया में शुरू हो गया था तो अचानक से अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अरबी भाषा की पढ़ाई पर जोर दिया जाने लगा। उसी तरह चीन से पार पाने के लिए जरूरी है कि इसकी भाषा-संस्कृति को हम भलीभांति जानें। ऐसे में भाषाई नीतिकारों को सुधार करते हुए चीनी भाषा मंदारिन को भी इसमें जोड़ लेना चाहिए। जाहिर है एनईपी के अमल में भाषा संबंधी उपरोक्त सुझावों को अपनाना लाभकारी होगा, क्योंकि यह तात्कालिक भावनाओं से बढ़कर राष्ट्रहित का सवाल है।

( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं )

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