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सेक्युलरिज्म के ताबूत में आखिरी कील: सेक्युलरिज्म के ढोंग का सटीक उदाहरण हैं इंडियन सेक्युलर फ्रंट बनाने वाले सिद्दीकी

अब्बास सिद्दीकी को लेकर कांग्रेस में छिड़ी रार।

सेक्युलरिज्म किस तरह ढोंग और छल-कपट का पर्याय बन चुका है इसका ताजा और सटीक उदाहरण हैं अब्बास सिद्दीकी। वह सांप्रदायिक राजनीति भी कर रहे और ठसक के साथ अपने दल को इंडियन सेक्युलर फ्रंट भी कह रहे हैं।

Bhupendra SinghWed, 03 Mar 2021 01:02 AM (IST)

[ राजीव सचान ]: किसी कांटेदार झाड़ का नाम बरगद रख देने से वह बरगद नहीं हो जाता, लेकिन राजनीति में इसी तरह के काम किए जाते हैं। हैरत यह है कि कुछ लोग ऐसा प्रचारित करने के लिए आगे भी आ जाते हैं कि हां जी, वह झाड़ ही बरगद है। पश्चिम बंगाल में यह तबसे देखने को मिल रहा है, जबसे हुगली स्थित फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने इंडियन सेक्युलर फ्रंट नामक राजनीतिक दल का गठन किया है। सबसे पहले अब्बास सिद्दीकी पर असदुद्दीन ओवैसी ने डोरे डाले। वही ओवैसी जो मीडिया के एक हिस्से और खासकर अंग्रेजी मीडिया की नजर में सेक्युलर लीडर हैं। हालांकि उनके दल का नाम ही मजहबी तेवर वाला यानी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन है, फिर भी वह अपने सीने पर सेक्युलर होने का तमगा लगाए घूमते हैं। उनकी खासियत यह है कि वह देश के उन्हीं इलाकों से चुनाव लड़ते हैं, जहां मुस्लिम आबादी अधिक होती है। किसी कारण उनकी अब्बास सिद्दीकी से बात नहीं बनी। माना जाता है कि इसके बाद अब्बास सिद्दीकी को अपने पाले में लाने की कोशिश ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने भी की, लेकिन ज्यादा सीटें मांगने के कारण बात नहीं बनी।

अब्बास सिद्दीकी को लेकर कांग्रेस में छिड़ी रार

एक समय अब्बास सिद्दीकी तृणमूल कांग्रेस के खास हुआ करते थे। पता नहीं क्यों वह खास से आम हो गए, लेकिन यह सबको पता है कि खुद को सबसे अव्वल दर्जे का सेक्युलर कहने वाले वाम दलों से उनकी बात बन गई। चूंकि कांग्रेस ने बंगाल में पहले ही वाम दलों से मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया था, इसलिए उसने भी इंडियन सेक्युलर फ्रंट से हाथ मिला लिया। अब इसे लेकर कांग्रेस में रार छिड़ी है। कांग्रेस का एक गुट इंडियन सेक्युलर फ्रंट को सेक्युलर मानने को तैयार नहीं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व तो इस पर मुहर लगा चुका है और उसे चुनौती देने का कोई मतलब नहीं। यह सनद रहे कि एक समय आंध्र प्रदेश में मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन और कांग्रेस एक साथ ही थे। मजलिस ने 2012 में हैदराबाद में चारमीनार के निकट एक मंदिर के जीर्णोद्धार से खफा होकर कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था।

सेक्युलर बताने वाला इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग पर कांग्रेस का भरोसा

यह भी सनद रहे कि केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे यानी यूडीएफ का ही एक घटक है और राहुल गांधी जिस वायनाड से लोकसभा चुनाव जीते, वहां मुस्लिम लीग का अच्छा-खासा दखल है। यह जिन्ना की उसी मुस्लिम लीग का अवशेष है, जिसने देश का विभाजन कराया था। विभाजन के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के जो नेता भारत में रह गए, उन्होंने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नाम से अपनी नई राजनीतिक दुकान खोल ली और खुद को सेक्युलर बताने लगे। कांग्रेस ने इस पर भरोसा कर लिया। यह भरोसा आज तक कायम है।

केरल के वामपंथी दल मुस्लिम लीग को सेक्युलर नहीं मानते

केरल के वामपंथी दल मुस्लिम लीग को सेक्युलर नहीं मानते, लेकिन किसी को कोई मुगालता पालने की जरूरत नहीं, क्योंकि तमिलनाडु में वे कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। यह तो पहले से ही जगजाहिर है कि केरल में जो कांग्रेस वाम दलों के खिलाफ खड़ी है, वही बंगाल में उनके साथ है। हां तो बात हो रही थी अब्बास सिद्दीकी की। इन दिनों वह सेक्युलरिज्म का गाना खूब जोर से गाते हुए ऐसी बातें कर रहे हैं कि उनका सेक्युलर फ्रंट मुसलमानों के साथ दलितों और आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ेगा। क्या किसी दरगाह का मौलाना ऐसा नहीं कर सकता? बिल्कुल कर सकता है। क्या वह सेक्युलर नहीं हो सकता? अवश्य हो सकता है, लेकिन तब नहीं जब वह किसी मुस्लिम के मंदिर चले जाने पर उसे काफिर और कौम का गद्दार करार दे। अब्बास सिद्दीकी ऐसा ही कर चुके हैं। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां को बेहया करार देते हुए उन्हें पेड़ से बांधकर पीटने की बात कही। उनका ‘गुनाह’ यह था कि वह एक मंदिर चली गई थीं।अब्बास ने इसी तरह कोलकाता के मेयर फरहाद हाकिम को भी कौम का गद्दार करार दिया, क्योंकि शिवरात्रि पर वह किसी मंदिर चले गए थे।

सांप्रदायिक शख्स सेक्युलरिज्म की आड़ लेकर लोगों की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहा

क्या मौलाना से नेता का चोला धारण करने के बाद उनके विचार बदल गए हैं? नहीं-बिल्कुल नहीं। उनका कहना है कि आखिर मंदिर जाने वाला मुसलमान कैसे हो सकता है? अब्बास सिद्दीकी की सलाह है कि चाहे नुसरत जहां हों या फरहाद हाकिम, इन दोनों को खुलकर कहना चाहिए कि वे मुसलमान नहीं हैं। चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन की मानें तो अब्बास ने फ्रांस के शिक्षक सैम्युल पैटी के कत्ल का समर्थन किया था और वह शरिया कानून के भी हामी हैं। पता नहीं, यह कितना सच है, लेकिन इन दिनों वह वीडियो वायरल है, जिसमें अब्बास सिद्दीकी यह कहते देखे-सुने जा सकते हैं कि अल्लाह कोई ऐसा वायरस भेजे कि हिंदुस्तान में 10-20-50 करोड़ लोग मारे जाएं। अब्बास के मुताबिक यह वीडियो उन्हें बदनाम करने की साजिश का हिस्सा है। हो सकता है कि ऐसा ही हो, लेकिन यह पहली बार नहीं है जब कोई घोर मजहबी और सांप्रदायिक शख्स सेक्युलरिज्म की आड़ लेकर लोगों की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहा हो। यह काम न जाने कब से हो रहा है और इसी कारण इस देश में सेक्युलरिज्म एक हेय शब्द बन गया है।

सेक्युलरिज्म का ढोंग: अब्बास सिद्दीकी सांप्रदायिक राजनीति कर रहे

सेक्युलरिज्म किस तरह ढोंग और छल-कपट का पर्याय बन चुका है, इसका ताजा और सटीक उदाहरण हैं अब्बास सिद्दीकी। वह सांप्रदायिक राजनीति भी कर रहे और ठसक के साथ अपने दल को इंडियन सेक्युलर फ्रंट भी कह रहे हैं। कांग्रेस और वाम दल बिना किसी शर्म-संकोच अब्बास सिद्दीकी को सेक्युलर होने का प्रमाण पत्र देने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। यह और कुछ नहीं, सेक्युलरिज्म के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम है।

( लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं ) 

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