असुरक्षा के शिकार कश्मीरी नेता: डीडीसी चुनावों में गुपकार गठजोड़ के खराब प्रदर्शन से हताश नेताओं का अनर्गल प्रलाप जारी

महबूबा और फारूक डीडीसी चुनावों में गुपकार गठजोड़ के निराशाजनक प्रदर्शन से मायूस।

जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरी सिंह ने समूची जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारतीय अधिराज्य में किया था लेकिन जम्मू-कश्मीर रियासत का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान ने अवैध रूप से हड़प रखा है। इन नेताओं को इन सब बातों को उठाते हुए पाकिस्तान का विरोध चाहिए।

Bhupendra SinghMon, 01 Mar 2021 01:22 AM (IST)

[ प्रो. रसाल सिंह ]: जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने एक बार फिर पाकिस्तान से बातचीत का राग अलापा है। ऐसा न करने पर उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की ‘भविष्यवाणी’ भी कर दी है। इससे ठीक पहले पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती भी यह गैरजरूरी मशविरा दे चुकी हैं। ये वही लोग हैं, जो अतीत में जम्मू-कश्मीर के लिए ग्रेटर ऑटोनोमी और सेल्फ रूल का राग यदाकदा अलापते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान पोषित आतंकवादियों द्वारा भारतीय सैन्य बलों पर किए गए कायराना पुलवामा हमले के बाद से मोदी सरकार ने पाकिस्तान के साथ सांस्कृतिक और कूटनीतिक सहित सभी प्रकार के संबंध पूरी तरह समाप्त कर लिए थे।

पाक में लोकतंत्र सेना के शिकंजे में, नशे का कारोबार पाक की राजनीति और अर्थव्यवस्था के आधार

वास्तव में पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र है। वहां लोकतंत्र सेना के शिकंजे में है। चीनी खैरात, आतंक और नशे के कारोबार ही आज उसकी राजनीति और अर्थव्यवस्था के आधार हैं। ऐसी बदहाली और बेचारगी के शिकार पाकिस्तान से भारत को डराने की कोशिश इन नेताओं के मानसिक दिवालियेपन और हताशा की पराकाष्ठा है। ये लोग नए भारत की शक्ति और सामर्थ्य को अनदेखा कर रहे हैं। आज भारत कूटनीति, रणनीति और अर्थनीति में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। पैंगोंग और चुशूल इलाकों से चीन का पीछे हटना उसके हृदय परिवर्तन का नहीं, बल्कि भारत की सामरिक और कूटनीतिक सक्षमता का परिणाम है। क्वाड जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन ने चीन को भयभीत किया है। इसमें भारत के अलावा अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं।

महबूबा और फारूक डीडीसी चुनावों में गुपकार गठजोड़ के निराशाजनक प्रदर्शन से मायूस

दरअसल महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला द्वारा की जा रही पाकिस्तान के साथ बातचीत की वकालत की मंशा कुछ और है। ये दोनों असल में जिला विकास परिषद यानी डीडीसी चुनावों में गुपकार गठजोड़ के निराशाजनक प्रदर्शन से हताश और मायूस हैं। इसी के साथ केंद्र सरकार द्वारा घोषित की गई जम्मू-कश्मीर की नई अधिवास नीति, भू-स्वामित्व नीति, आधिकारिक भाषा नीति, पर्यटन विकास नीति और औद्योगिक नीति आदि ने इनकी नींद उड़ा दी है।

रोशनी एक्ट घोटाले की जांच भी महबूबा और फारूक की चिंता बढ़ा रही

उधर उच्च न्यायालय की देखरेख में आगे बढ़ रही रोशनी एक्ट घोटाले की जांच भी इनकी चिंता बढ़ा रही है। इन बदली हुई परिस्थितियों में लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर पर राज करने वाले इन दोनों ‘राजनीतिक राजघरानों’ को अपने अप्रासंगिक होने का डर सता रहा है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की समस्या की समाप्ति के लिए पाकिस्तान से बातचीत का सुझाव और सिफारिश उसी निराशा और बौखलाहट का परिणाम है। यह मशविरा उनके द्वारा एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश है। एक तरफ ये आतंकी हिंसा के शिकार जम्मू-कश्मीर की जनता के लिए चिंतित दिखकर उसके रक्षक और हिमायती बने रहना चाहते हैं। वहीं भारतवासियों और भारत सरकार को भी अपने देशप्रेम और देश-हितैषी होने के बारे में भ्रमित करना चाहते हैं। इस सबसे बढ़कर वे पाकिस्तान की हमदर्दी और साथ चाहते हैं, ताकि उससे मदद मिलती रहे। पाकिस्तान हवाला आदि माध्यमों से देश-विदेश में अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस की भी ‘मदद’ करता रहा है। पाकिस्तानी कालेधन की मुफ्तखोरी ने हुर्रियत कांफ्रेंस को मरणासन्न कर दिया है।

महबूबा और फारूक जम्मू-कश्मीर को विवादित मुद्दा बताकर अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहते हैं

लगता है कि अब नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी आत्मघात की उसी राह पर चल निकली हैं। महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला की असल मंशा यह है कि वे पाकिस्तान को ‘हितधारक’ बनाकर और जम्मू-कश्मीर को विवादित मुद्दा बताकर उसका अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहते हैं। इन नेताओं को अभी भी जम्मू-कश्मीर में पांच अगस्त, 2019 से पहले वाली स्थिति के बहाल होने की आस है, जो वास्तव में संभव नहीं दिखती। आतंकवाद भी यहां अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। कुछ छिटपुट आतंकी घटनाएं हो रही हैं, जो दीपक के बुझने से पहले भभकने जैसी ही हैं। पिछले डेढ़ साल में हम कश्मीरी नेताओं और उनके नेक इरादों और देश-प्रेम से परिचित हो चुके हैं। इन नेताओं की विश्वसनीयता और बयान संदिग्ध हैं। इन नेताओं को यह जानने और मानने की जरूरत है कि विश्वसनीयता का संकट किसी भी संबंध और संवाद को पलीता लगा देता है। नीयत का दोष नीति की नियति निर्धारित कर देता है। यही गुपकार गठजोड़ के मामले में भी हुआ है।

महबूबा और फारूक को विश्वसनीयता बहाली की फिक्र करना चाहिए 

इन नेताओं को जम्मू-कश्मीर में पूर्वस्थिति कायम करने की मुहिम चलाने के बजाय अपनी लगातार क्षीण होती विश्वसनीयता बहाल करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अपनी विश्वसनीयता बहाली की फिक्र करते हुए उन्हें जम्मू-कश्मीर नहीं, बल्कि गुलाम कश्मीर को भारत में शामिल करने के बारे में अपने सुझाव देने चाहिए। गुलाम कश्मीर के बाशिंदों पर जुल्म हो रहे हैं। वहां मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन जारी है। पाकिस्तान ने जबरन उसे अपना प्रांत घोषित करके चुनाव का नाटक किया है।

महाराजा हरी सिंह ने समूची जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारतीय अधिराज्य में किया था

यह सब 26 अक्टूबर, 1947 के अधिमिलन पत्र का सरासर उल्लंघन है। इस अधिमिलन पत्र के माध्यम से जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरी सिंह ने समूची जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारतीय अधिराज्य में किया था, लेकिन जम्मू-कश्मीर रियासत का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान ने अवैध रूप से हड़प रखा है। इन नेताओं को इन सब बातों को उठाते हुए पाकिस्तान का विरोध चाहिए। अधिमिलन पत्र का सम्मान करते हुए पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गए जम्मू-कश्मीर के शेषभाग की भी यथाशीघ्र भारत में शामिल करने की परियोजना में भागीदारी सुनिश्चित करके अपनी साख बनानी चाहिए। उन्हें यह संदेश देना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के शेष भाग की प्राप्ति के लिए संपूर्ण भारत एकमत है। यह संदेश ही उनके देशप्रेम का सच्चा और मुखर प्रमाण होगा।

( लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता, छात्र कल्याण हैं )

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