भारत की अनदेखी करने वाले इतिहास का पुनर्लेखन जरूरी, मुख्यधारा के लेखन में तथ्यों के बजाय प्रोपेगेंडा ज्यादा है

इतिहास के कालक्रम में भारत की राजनीतिक और भौगोलिक विविधता की अनदेखी है।

आज आवश्यकता है कि भारत के इतिहास लेखन को गंभीरता से लिया जाए। हम चाहे जितना प्राचीन सभ्यता होने का दंभ भरें लेकिन हकीकत यह है कि इसकी प्राचीनता को सिद्ध करने के लिए पुरातत्व और अन्य साक्ष्यों का अभाव है।

Bhupendra SinghSat, 27 Feb 2021 02:13 AM (IST)

[ अभिनव प्रकाश ]: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में अपनी बहराइच रैली में भारत के इतिहास लेखन को सुधारने का महत्वपूर्ण मुद्दा यह कहकर उठाया कि देश का इतिहास वह नहीं है, जो भारत को गुलाम बनाने और गुलामी की मानसिकता रखने वालों ने लिखा। इसी मौके पर प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि महाराजा सुहेलदेव को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे। आज भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की अत्यंत ही आवश्यकता है, क्योंकि मुख्यधारा का भारतीय इतिहास लेखन बहुत ही संकीर्ण और तथ्यों के बजाय प्रोपेगेंडा पर ज्यादा टिका हुआ है, लेकिन इतिहास के पुनर्लेखन में छह महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। इतिहास लेखन के साथ पहली परेशानी परिप्रेक्ष्य की है। इतिहास को जनमानस के दृष्टिकोण से लिखा जाना चाहिए, न कि शासकों के। यह एक त्रासदी है कि भारत के इतिहास को विदेशी राजवंशों के इतिहास के रूप में लिखा गया और यहां के लोग मात्र फुटनोट्स में रह गए। विशेष रूप से मध्ययुगीन युग इतिहास तुर्क, अफगान, मुगलों आदि की राजनीति और युद्धों के बारे में है, न कि उनके विरुद्ध भारतीयों के प्रतिरोध के बारे में।

दूसरा मुद्दा: इतिहास के कालक्रम में भारत की राजनीतिक और भौगोलिक विविधता की अनदेखी है

दूसरा मुद्दा इतिहास के कालक्रम का है, जो हड़प्पा युग से लेकर वैदिक युग और फिर मौर्यवंश के अधीन प्रथम साम्राज्य के उदय तक आता है और फिर गुप्त साम्राज्य और हर्षवर्धन से होते हुए दिल्ली सल्तनत, मुगलों और अंग्रेजों तक पहुंच जाता है। इसमें भारत की राजनीतिक और भौगोलिक विविधता की अनदेखी है तथा उत्तर भारत का दबदबा है। दक्षिण में चोल, सातवाहनों और यहां तक कि विजयनगर साम्राज्य को काफी हद तक अनदेखा किया गया है। इतिहास में चालुक्यों, गुर्जर-प्रतिहारों, कश्मीरी राजवंशों, काकतीय, राष्ट्रकूटों, पाल साम्राज्य, ओडिशा के गंगा और असम के अहोमों का भी ज्यादा उल्लेख नहीं है। इन राजवंशों और साम्राज्यों ने सदियों तक यूरोपीय देशों से बड़े क्षेत्रों पर शासन किया, लेकिन विडंबना देखिए कि अधिकतर भारतीय इनका नाम तक नहीं जानते। पाठ्यपुस्तकों में पूर्वोत्तर के इतिहास का उल्लेख न होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

तीसरा मुद्दा: इतिहास लेखन में दलित-आदिवासी जातियों और जनजातियों के इतिहास का अभाव

इतिहास लेखन में दलित-आदिवासी जातियों और जनजातियों के इतिहास का अभाव तीसरा मुद्दा है। अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां भारतीय आबादी का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा हैं और किसी भी इतिहास लेखन को बिना उनकी उपस्थिति के प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। शूद्र और यहां तक कि दलित जातियों से आने वाले शासकों की समृद्ध पंक्ति भी पाठ्यपुस्तकों में अनुपस्थिति है। राजा सुहेलदेव जैसे राजाओं का भी मुख्यधारा के इतिहास में कोई स्थान नहीं है। आदिवासी समाज, राजनीति, आध्यात्मिक परंपराओं, आदिवासी राज्यों और संस्कृति के बारे में छात्र शायद ही कुछ पढ़ते हों।

चौथी समस्या: भारत का इतिहास बेहद कमजोर धरातल पर आधारित है

चौथी समस्या यह है कि भारत का इतिहास न केवल त्रुटिपूर्ण परिप्रेक्ष्य से लिखा गया है, बल्कि वह बेहद कमजोर धरातल पर आधारित है। भारतीय इतिहास लेखन में वैचारिक बहसें और विचारधारा की लड़ाई अधिक हैं और पुरातत्व, तथ्य एवं डाटा बहुत कम हैं। हम संस्कृत, तमिल, कन्नड़, पाली और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों के सैकड़ों ग्रंथों के आधिकारिक अनुवाद करने में भी विफल रहे हैं।

पांचवां मुद्दा: इतिहास केवल राजनीतिक इतिहास से कहीं अधिक होता है

पांचवां मुद्दा यह है कि इतिहास केवल राजनीतिक इतिहास से कहीं अधिक होता है। इतिहास लेखन में पर्यावरणीय इतिहास, सामाजिक इतिहास, आर्थिक इतिहास, प्रौद्योगिकी का इतिहास और ज्ञान, कला एवं साहित्य, उत्पादन प्रक्रियाओं, उद्योग आदि विषयों को अधिक से अधिक वरीयता देने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए हम जानते हैं कि प्रतिहारों ने एक शक्तिशाली सेना के साथ एक मजबूत और समृद्ध साम्राज्य का निर्माण किया और लगभग तीन सौ वर्षों तक भारत की सीमाओं का बचाव किया। इसके साथ उन्होंने एक उल्लेखनीय काम शानदार जल प्रबंधन और सिंचाई प्रणाली के निर्माण के रूप में किया। इसके चलते उन्होंने पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी उप-महाद्वीप के शुष्क क्षेत्रों में भी एक समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्य बनाया।

छठी खामी: भारत के हजारोंं वर्षों के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अनदेखी

इतिहास लेखन में छठी खामी भारत के हजारोंं वर्षों के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अनदेखी है। भारत की समृद्ध समुद्री परंपराएं, दुनिया भर में भारत के विचारों और दर्शन का प्रसार और भारत द्वारा आयातित विभिन्न प्रभावों का इतिहास लेखन में अभाव है। मानव सभ्यता चाहरदीवारी में घिरी रहकर विकसित नहीं होती। वास्तव में दुनिया के साथ संबंध किसी भी देश और सभ्यता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और यह भारत के साथ और भी अधिक है, जिसने हिंद महासागर क्षेत्र और मध्य एशिया में सामाजिक-राजनीतिक एवं आर्थिक विकास पर गहरा प्रभाव डाला और स्वयं भी उनके प्रभाव से लाभान्वित हुआ। दुनिया का पहला अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक बंदरगाह गुजरात के लोथल में बना, जहां से चार हजार वर्ष पहले भारतीय जहाज अरब, ईरान, अफ्रीका और बेबीलोन की ओर रवाना होते थे, न केवल सामान, बल्कि लोगों और विचारों के साथ। हड़प्पावासियों की सभ्यता एक समृद्ध व्यापारिक सभ्यता थी। दो हजार साल से भी पहले ओड़िया नाविक दक्षिण पूर्व एशिया के समुद्र में व्यापार कर रहे थे। इन व्यापारिक संबंधों के कारण भारत में दक्षिण पूर्व एशिया, पश्चिमी एशिया और मध्य एशिया के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की समृद्ध परंपरा का विकास हुआ।

आज भारत के इतिहास लेखन को गंभीरता से लेने की आवश्यकता

आज आवश्यकता है कि भारत के इतिहास लेखन को गंभीरता से लिया जाए। इसके लिए सर्वप्रथम पुरातत्व अनुसंधान में बड़े स्तर पर निवेश करना होगा। हम चाहे जितना प्राचीन सभ्यता होने का दंभ भरें, लेकिन हकीकत यह है कि इसकी प्राचीनता को सिद्ध करने के लिए पुरातत्व और अन्य साक्ष्यों का अभाव है। प्रत्यक्ष तथ्यों के आधार पर भारतीय इतिहास चीन के बराबर भी नहीं पहुंचता, मिस्र और मेसोपोटामिया को तो भूल ही जाएं। चीन ने 1990 के बाद पुरातत्व और इतिहास अनुसंधान में अरबों डॉलर का निवेश किया। इससे वह अपने इतिहास को कई हजार वर्ष पीछे तक सिद्ध करने में सफल रहा। भारत में भी इसकी आवश्यकता है, न कि पुराने संकीर्ण नेहरूवादी इतिहास लेखन और वामपंथी प्रोपेगेंडा को किसी नई संकीर्णता और प्रोपेगेंडा से बदलने की।

( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )

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