ऊंचे दाम वाली फसलों को बढ़ावा देने की जरूरत, एमएसपी के बिना भी बढ़ सकती है किसानों की आय

जब समर्थन मूल्य अधिक होते हैं तो किसान विशेष फसलों का अधिक उत्पादन करते हैं जैसे वर्तमान में गेहूं और धान की खेती अधिक की जा रही है। इससे इन फसलों की बाजार में आपूर्ति बढ़ती है। उससे उनका दाम गिरता है।

Neel RajputTue, 30 Nov 2021 08:09 AM (IST)
समर्थन मूल्य से परे देखने का समय

भरत झुनझुनवाला। सरकार और किसान दोनों ही चाहते हैं कि किसानों की आय शीघ्र ही दोगुनी हो जाए। किसान समझते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को कानूनी दायरे में लाने से उनकी आय बढ़ेगी, जबकि सरकार समझती है कि इससे देश पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा, साथ ही पर्यावरण को भी क्षति पहुंचेगी। जब समर्थन मूल्य अधिक होते हैं तो किसान विशेष फसलों का अधिक उत्पादन करते हैं, जैसे वर्तमान में गेहूं और धान की खेती अधिक की जा रही है। इससे इन फसलों की बाजार में आपूर्ति बढ़ती है। उससे उनका दाम गिरता है।

सामान्य स्थिति में दाम गिरने से किसान इन फसलों का उत्पादन कम करते और दूसरी फसलों का उत्पादन बढ़ाते। बाजार में गेहूं और धान की आपूर्ति कम हो जाती और कीमतों को लेकर पुन: संतुलन बन जाता। चूंकि किसानों के एक वर्ग को समर्थन मूल्य का बड़ा सहारा है इसलिए वे चाहते हैं कि समर्थन मूल्य बनाए रखना चाहिए जिससे वे उत्पादन भी बढ़ाएं और ऊंचे दाम पाएं। ऐसी स्थिति में यदि उत्पादन अधिक बढ़ता है और दाम गिरते हैं तो सरकार को इन फसलों को ऊंचे दाम पर खरीदकर घरेलू बाजार में या विदेशों में सस्ते दाम पर बेचना पड़ेगा। स्वाभाविक है कि इसका बोझ सरकार पर पड़ेगा। इस दृष्टि से न्यूनतम समर्थन मूल्य को हटाना सही है। जब किसान धान का अधिक उत्पादन करते हैं तो उसमें पानी की बहुत खपत होती है। इसी कारण पंजाब और हरियाणा में भूमिगत जल स्तर गिरता जा रहा है। इससे किसानों के लिए दीर्घकालिक समस्या उत्पन्न हो जाएगी। इसलिए समर्थन मूल्य बढ़ाने से भले ही कुछ किसानों की आय बढ़े, लेकिन यह पर्यावरण और समग्र अर्थव्यवस्था के हित में नहीं।

बिना समर्थन मूल्य के भी किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए करना यह होगा कि ऊंचे दाम वाली फसलों को बढ़ावा दिया जाए। जैसे आज केरल में काली मिर्च, कर्नाटक में रेशम और सुपाड़ी पर जोर है और बिहार में पान की खेती होती है। वहीं महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में आम से आमदनी होती है। इसलिए जिन क्षेत्रों में उच्च कीमत की फसलों का उत्पादन होता है वहां समर्थन मूल्य की मांग नहीं होती है, क्योंकि उन्हें इन फसलों से पर्याप्त आय हो रही है। इसी क्रम में ट्यूनीशिया में जैतून, फ्रांस में अंगूर और नीदरलैंड में ट्यलिप के फूलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है, जिसमें कार्यरत लोगों को रोजाना 10,000 रुपये तक मिल रहे हैं। इसलिए सरकार को देश के प्रत्येक क्षेत्र के अनुकूल ऊंचे दाम वाली फसलों पर अनुसंधान करना चाहिए और किसानों को उन्हें अपनाना चाहिए।

हमारे पास कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक 12 महीने हर प्रकार की जलवायु उपलब्ध है। जैसे सर्दियों में हम गुलाब के फूलों की खेती दक्षिण में कर सकते हैं और गर्मियों में उत्तर के पर्वतीय इलाकों में।

बिना समर्थन मूल्य के किसानों की आय बढ़ाने का दूसरा उपाय है कि किसान को नकदी हस्तांतरण योजना का विस्तार किया जाए। यदि जरूरतमंद पात्र किसानों को 50 हजार रुपये वार्षिक नकदी प्रदान की जाए तो देश पर 1.5 लाख करोड़ रुपये का ही भार पड़ेगा, परंतु इससे जो लाभ होगा उसे देखते हुए इसे वहन किया जा सकता है। इसलिए सरकार को समर्थन मूल्य की समाप्ति के साथ-साथ ऊंची कीमत वाली कृषि फसलों और नकद हस्तांतरण पर ध्यान देना चाहिए।

इस नीति पर आगे बढ़ने में पहली बाधा है कि देश की कृषि प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों में रिसर्च से जुड़ी नौकरशाही उदासीन है। दूसरा व्यवधान भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआइ के अधिकारियों का है, जिन्हें एमएसपी को हटाना उचित नहीं लगता, क्योंकि उसके दम पर ही उनकी नौकरी टिकी है। तीसरा व्यवधान सार्वजनिक वितरण प्रणाली की नौकरशाही है। यह खुद इस व्यवस्था से लाभान्वित होती है। सरकार को खाद, पानी और बिजली का बाजार मूल्य वसूल करना चाहिए। इससे फसलों की उत्पादन लागत में वृद्धि होगी और वह वृद्धि शहरी उपभोक्ता को वहन करनी पड़ेगी। इन दोनों समस्याओं का उपाय है कि आम आदमी को नकदी हस्तांतरित की जाए, जिससे सार्वजनिक वितरण का प्रपंच ही समाप्त हो जाए और आम आदमी बाजार भाव पर खाद्यान्न खरीद सके।

जब खाद, पानी और बिजली का उचित मूल्य वसूला जाएगा तो किसान इन संसाधनों का किफायत से उपयोग करेंगे। समर्थन मूल्य के कारण अधिक उत्पादित हुई फसल का जब निर्यात होता है तो उसके साथ हम अपनी बिजली और पानी को चावल और गेहूं में पैक करके उसका निर्यात कर देते हैं। इस घुमावदार रास्ते से किसान की आय सुनिश्चित करने के लिए हम अपने अमूल्य संसाधनों की भी बलि दे देते हैं। अब विषय रह जाता है खाद्यान्न सुरक्षा का। पिछली सदी के सातवें दशक के दौरान देश में भयंकर सूखा पड़ा था। अपनी जनता का पेट भरने के लिए हमें अमेरिका से घटिया किस्म का गेहूं मंगाना पड़ा था। उसी समय सार्वजनिक वितरण प्रणाली की नींव रखी गई थी। ऐसे में यदि हम समर्थन मूल्य समाप्त करते हैं तो संभव है कि किसी विशेष वर्ष में गेहूं और धान का उत्पादन कम रह जाए और हमारे समक्ष खाद्य सुरक्षा की समस्या पुन: आ जाए। इसका यही उपाय है कि सरकार एफसीआइ को खाद्यान्नों के मूल्य संतुलित रखने का जिम्मा सौंप दे।

एफसीआइ को चाहिए कि जब किसी फसल का उत्पादन अधिक हो तो उसे खरीदकर भंडारण करे और जब उत्पादन कम हो तो उसे बेचे। इससे उत्पादन की अधिकता और आपूर्ति की न्यूनता, दोनों को संतुलित किया जा सकता है। जब किसी फसल का उत्पादन बढ़ जाए तो निगम उसका निर्यात करे और जब उत्पादन घट जाए तो उसका आयात करे। इससे हम अपनी खाद्य सुरक्षा को भी बनाए रख सकते हैं तो इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, एफसीआइ और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जरूरत नहीं रह जाएगी। निष्कर्ष है कि सरकार सर्वप्रथम रिसर्च नौकरशाही को दुरुस्त करे। उससे उन फसलों को प्रोत्साहन देने को कहे जिनमें किसान को अधिक मूल्य मिल सकते हैं।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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