वैचारिक स्तर पर हो जिहादी आतंकवाद वाली विचारधारा का मुकाबला

किसी समुदाय की कट्टरता के खिलाफ लड़ाई को बल तब मिलेगा जब खुद उनके बीच के लोग उसके खिलाफ आवाज उठाएंगे। मजहबी कट्टरता के खिलाफ अलख जगाना इसलिए आवश्यक है क्योंकि मौजूदा माहौल में एक समाज की कट्टरता के जवाब में दूसरे समाज की कट्टरता बढ़ रही है।

Monika MinalWed, 13 Oct 2021 01:17 AM (IST)
वैचारिक स्तर पर हो जिहादी आतंकवाद वाली विचारधारा का मुकाबला

[राजीव सचान]। कश्मीर के एक सरकारी स्कूल में पहचान पत्र देखकर हिंदू-सिख शिक्षक की हत्या पहली ऐसी घटना नहीं, जिसमें लोगों को उनके मत-मजहब के आधार पर निशाना बनाया गया हो। कश्मीर में यही काम 1990 के आसपास भी किया गया था और इसी कारण वहां से बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को जान बचाकर भागना पड़ा था। इस तरह की घटनाएं दुनिया के अन्य देशों में भी होती रहती हैं। कुछ वर्ष पहले ढाका के एक रेस्त्रां में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने चुन-चुनकर गैर मुसलमानों को मारा था। इनमें एक भारतीय युवती तारिषि जैन भी थी। इसके पहले नैरोबी के एक माल में जा घुसे आतंकियों ने पहचान पत्र देखकर गैर मुसलमानों को मारा था। दुर्योग से इस आतंकी हमले में भी दो गैर मुस्लिम भारतीय शामिल मारे गए थे। गैर मुसलमानों को चुन-चुनकर मारने का यह काम इराक-सीरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान में भी रह-रह कर होता रहता है। इसके पीछे जिहादी संगठनों की यह जहरीली सोच है कि अन्य किसी को जीने-रहने का अधिकार नहीं। आतंकवाद के खिलाफ छेड़े गए लंबे युद्ध के बावजूद इस सोच पर लगाम नहीं लग सकी और अब अफगानिस्तान में तालिबान के काबिज होने के बाद तो उसके फिर से बेलगाम होने का खतरा पैदा हो गया है।

इस बात को एक लंबे अर्से से महसूस किया जा रहा है कि जिहादी आतंकवाद जिस विचारधारा की उपज है, उससे केवल हथियार के बल पर नहीं निपटा जा सकता। इसका सामना विचार के स्तर पर भी करना होगा। यह बात जितनी आतंकवाद के मामले में लागू होती है, उतनी ही धार्मिक कट्टरता के मामले में भी। धार्मिक कट्टरता ही अतिवाद को खाद-पानी देने का काम करती है। दुनिया में जहां-जहां यह कट्टरता फलती-फूलती है, वहां-वहां अतिवाद-आतंकवाद के सिर उठाने का खतरा पैदा हो जाता है। किसी समूह-समुदाय की कट्टरता के खिलाफ लड़ाई को तब बल मिलता है, जब खुद उनके बीच के लोग उसके खिलाफ आवाज उठाते हैं। दुनिया भर में इस तरह की आवाज उठाने वाले हैं, लेकिन उन्हें जैसा सहयोग, समर्थन और संरक्षण मिलना चाहिए, वैसा नहीं मिल पा रहा है। यह काम इसलिए और मुश्किल हो गया है, क्योंकि खुद को लेफ्ट लिबरल कहने वाले अतिवाद और आतंकवाद को अपने अलग ही चश्मे से देखते हैं। जब दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी अबू बकर बगदादी मारा गया तो वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा- 48 साल का धार्मिक विद्वान मारा गया। तालिबान के अफगानिस्तान पर काबिज होने के पहले न्यूयार्क टाइम्स ने ईनामी आतंकी सरगना सिराजुद्दीन हक्कानी का लेख छापकर उसका महिमामंडन किया। ऐसे माहौल में मजहबी कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाने वालों का काम और मुश्किल हो गया है। इन मुश्किलों के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है। उनकी संख्या बढ़ती चली जा रही है। इसमें सभी मत-मजहब के लोग हैं। इनमें कोई खुद को मुक्तचिंतक कहता है, कोई नास्तिक, कोई मानवता का सिपाही, कोई एक्स मुस्लिम या एग्नोस्टिक। इसके अलावा विज्ञान को ही आज का ईश्वर और सभी मत-मजहबों को मानव निर्मित बताने वाले भी हैं।

मतभेदों के बाद भी इनका लक्ष्य एक ही है- मजहबी कट्टरता, अतिवाद, आतंकवाद के साथ धार्मिक अंधविश्वासों और कुरीतियों पर प्रहार। इन्हें इनके यू ट्यूब चैनल पर हजारों लोग देखते-सुनते और संवाद करते हैं। अच्छी बात यह है कि इनमें भारतीय भी हैं। एक समय उनकी संख्या उंगलियों पर गिने जान लायक थी, लेकिन बीते कुछ समय से उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इन्हें भारत के साथ-साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश के साथ उन सब देशों के लोग सुनते हैं, जहां लोग हिंदी-ऊर्दू समझते हैं। इन्हें और खासकर तर्कशील भारत (Tarksheel Bharat), जफर हेरेटिक (Ex-Muslim Zafar Heretic), डिस्टोपिया टू रीजन (Dystopia to Reason ), सचवाला (Sachwala AASK), साहिल (Indian ExMuslim Sahil), यास्मीन खान (Ex Muslim Yasmin Khan), आजाद ग्राउंड (Azaad Ground exmuslim), एपोस्टेट इमाम (Apostate Imam) आदि को हजारों लोग सुनते ही नहीं, बहस भी करते हैं। इनमें से साहिल तो एक समय दीन की दावत देने का काम करते थे। खुद कट्टरता से बाहर आने के बाद वह दूसरों को कट्टर बनने से रोक रहे हैं और तमाम कुतर्कों के बीच बड़े धैर्य से यह बताते हैं कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। अरबी भाषा के जानकार सचवाला तर्कों और तथ्यों के साथ यह बताते हैं कि मजहबी कट्टरता किस तरह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा है। आजाद ग्राउंड अपने यू ट्यूब चैनल के जरिये सभी को अपनी बात कहने का मंच उपलब्ध कराते हैं। ये और इनके जैसे अन्य अनेक लोग वह अलख जगा रहे हैं, जो बहुत पहले हमारे राजनीतिक एवं सामाजिक नेतृत्व को जगानी चाहिए थी।

मजहबी कट्टरता के खिलाफ अलख जगाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि मौजूदा माहौल में एक समाज की कट्टरता के जवाब में दूसरे समाज की कट्टरता बढ़ रही है और सार्थक संवाद के बजाय आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला कायम हो जाता है। जहरीले चिंतन से जूझने वाले इस सिलिसले को भी तोड़ रहे हैं। उनकी बातें असर कर रही हैं और लोग कट्टरता से विमुख हो रहे हैं, लेकिन इनका काम आसान नहीं, क्योंकि इन्हें अपनी पहचान छिपाकर रखनी होती है। बावजूद इसके तथ्य यह है कि देश और दुनिया में लोग मजहबी कट्टरता से बाहर आ रहे हैं और कुछ तो मजहब ही छोड़ दे रहे हैं। प्यू रिसर्च के हालिया सर्वेक्षण के अनुसार भारत में छह प्रतिशत मुस्लिम किसी खुदा पर यकीन नहीं करते। जहां अन्य मत-मजहब वाले यह कहने के लिए स्वतंत्र हैं कि उन्हें ईश्वर पर यकीन नहीं और उन्होंने अपना मत छोड़ दिया है, वहीं मुस्लिम ऐसा कहने से डरते हैं। यदि इस डर के बाद भी कुछ लोग यह कहने का साहस कर पा रहे हैं तो यह एक बड़ी बात है। समाज के साथ संस्थाओं और सरकारों को इनके पीछे खड़ा होना चाहिए।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

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